रायपुर, 3 अप्रैल 2025। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को यह अधिकार दिया है कि वह अनुसूचित जनजाति आयोग (Chhattisgarh State Scheduled Tribes Commission) के अध्यक्ष और सदस्यों को बिना किसी नोटिस, कारण या सुनवाई के हटा सकती है। कोर्ट ने इस फैसले में सरकार की ‘प्लीजर डॉक्ट्रिन’ (Doctrine of Pleasure) नीति को सही ठहराया।
क्या है मामला?
भानु प्रताप सिंह, गणेश ध्रुव और अमृत लाल टोप्पो को 16 जुलाई 2021 को छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग में क्रमशः अध्यक्ष और सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया था। इनकी नियुक्ति छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग (संशोधन) अधिनियम, 2020 के तहत की गई थी, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि इनकी नियुक्ति “राज्य सरकार की इच्छा पर निर्भर” होगी।

2023 के विधानसभा चुनावों के बाद सरकार बदलने पर 15 दिसंबर 2023 को राज्य सरकार ने आदेश जारी कर सभी “राजनीतिक नियुक्तियों” को समाप्त कर दिया। इसके तहत इन तीनों की सेवाएं भी उसी दिन समाप्त कर दी गईं।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें
याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में इस फैसले को चुनौती देते हुए कहा कि उन्हें हटाना मनमाना फैसला है और यह छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग अधिनियम, 2020 की धारा 4(3) का उल्लंघन करता है, जिसमें निष्कासन से पहले सुनवाई का प्रावधान है।
हाईकोर्ट का फैसला
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि धारा 4(1) के तहत सरकार को नियुक्ति और निष्कासन का पूर्ण अधिकार है और यह ‘डॉक्ट्रिन ऑफ प्लीजर’ के तहत आता है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों (B.P. Singhal v. Union of India, Om Narain Agrawal v. Nagar Palika Shahjahanpur) का हवाला देते हुए कहा कि नामित पदों पर नियुक्ति प्रतिस्पर्धात्मक चयन प्रक्रिया के तहत नहीं होती, इसलिए इनकी सेवा राज्य सरकार की इच्छा पर निर्भर होती है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हटाए गए सदस्यों के खिलाफ कोई व्यक्तिगत आरोप नहीं था और न ही यह आदेश किसी नकारात्मक टिप्पणी के साथ जारी किया गया था। यह सिर्फ चुनाव के बाद सरकार की नीति के तहत लिया गया निर्णय था।
फैसले का असर
इस फैसले से स्पष्ट हो गया है कि राज्य सरकार को आयोगों और अन्य नामित पदों पर अपने विवेक से नियुक्ति और हटाने का अधिकार प्राप्त है। यह निर्णय अन्य नामित पदों पर भी लागू हो सकता है, जिससे भविष्य में ऐसी नियुक्तियों पर असर पड़ सकता है।
