Suicide Abetment Case में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कोरबा निवासी आरोपी को आत्महत्या के लिए उकसाने (IPC की धारा 306) का दोषी करार दिया है। न्यायालय ने माना कि किसी महिला को लगातार प्रताड़ित करना, शादी के लिए दबाव बनाना और जान से मारने की धमकी देना आत्महत्या के लिए उकसाने की श्रेणी में आ सकता है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने वर्ष 2019 में सत्र न्यायालय द्वारा दिए गए बरी करने के आदेश को पलट दिया।
Suicide Abetment Case: क्या है पूरा मामला?
यह मामला कोरबा जिले के करतला थाना क्षेत्र के नोनबिर्रा गांव का है। अभियोजन के अनुसार, 30 जनवरी 2018 को एक युवती ने अपने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी।
मामले की जांच के दौरान आरोप लगाया गया कि गांव निवासी मोहम्मद सेराज (25 वर्ष) लगातार युवती पर शादी करने का दबाव बना रहा था। युवती के इनकार करने पर उसने कथित रूप से उसे और उसकी मां को जान से मारने की धमकी दी। लगातार मानसिक प्रताड़ना के कारण युवती ने आत्महत्या जैसा कदम उठाया।
जांच के बाद अप्रैल 2018 में आरोपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर मामला अदालत में पेश किया गया।
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ट्रायल कोर्ट ने क्यों किया था आरोपी को बरी?
कोरबा सत्र न्यायालय ने जनवरी 2019 में आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था।
सत्र न्यायालय का मानना था कि कथित सुसाइड नोट की लिखावट की पुष्टि के लिए हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट पेश नहीं की गई। साथ ही अदालत ने प्रत्यक्ष रूप से आत्महत्या के लिए उकसाने वाले पर्याप्त साक्ष्य नहीं होने का हवाला दिया।
इसके बाद राज्य सरकार ने वर्ष 2020 में इस फैसले को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनौती दी।
Suicide Abetment Case में हाईकोर्ट ने क्यों पलटा फैसला?
जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने 17 जुलाई 2026 को सुनाए फैसले में कहा कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी की थी।
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से मृतका की मां रुकमणी गुप्ता की गवाही को विश्वसनीय माना। अदालत ने कहा कि उनकी गवाही पूरी सुनवाई के दौरान एक जैसी रही और उसमें कोई महत्वपूर्ण विरोधाभास नहीं पाया गया।
इसके अलावा मेडिकल रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि कथित प्रताड़ना के कारण मृतका और उसकी मां पहले भी आत्महत्या का प्रयास कर चुकी थीं। अदालत ने इसे मानसिक उत्पीड़न के महत्वपूर्ण प्रमाण के रूप में स्वीकार किया।
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हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट पर हाईकोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि हर मामले में हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की राय अनिवार्य नहीं होती।
अदालत ने कहा कि यदि प्रताड़ना, धमकी और मानसिक उत्पीड़न के विश्वसनीय मौखिक एवं परिस्थितिजन्य साक्ष्य उपलब्ध हों, तो केवल हैंडराइटिंग रिपोर्ट के अभाव में पूरे मामले को खारिज नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने माना कि उपलब्ध साक्ष्य आरोपी के खिलाफ पर्याप्त हैं और आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध प्रथम दृष्टया सिद्ध होता है।
अब आगे क्या होगा?
हाईकोर्ट ने आरोपी मोहम्मद सेराज को 27 जुलाई 2026 को अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया है। इसी दिन सजा की अवधि (Quantum of Sentence) पर सुनवाई होगी।
सजा तय होने के बाद अदालत यह निर्धारित करेगी कि आरोपी को धारा 306 के तहत कितनी अवधि का कारावास और अन्य दंड दिया जाएगा।
धारा 306 IPC क्या कहती है?
भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 आत्महत्या के लिए उकसाने (Abetment of Suicide) से संबंधित है। यदि किसी व्यक्ति को लगातार प्रताड़ित कर, धमकाकर या मानसिक रूप से इस स्थिति में पहुंचा दिया जाए कि वह आत्महत्या कर ले, तो दोष सिद्ध होने पर आरोपी को कानून के तहत दंडित किया जा सकता है।
इस मामले में हाईकोर्ट ने माना कि लगातार मानसिक उत्पीड़न और धमकी केवल व्यक्तिगत विवाद नहीं थे, बल्कि उन्होंने पीड़िता पर गंभीर मानसिक प्रभाव डाला।
Suicide Abetment Case में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि लगातार मानसिक प्रताड़ना, धमकी और शादी के लिए दबाव जैसी परिस्थितियों को अदालत गंभीरता से देखती है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि विश्वसनीय गवाह और अन्य साक्ष्य मौजूद हों तो केवल हैंडराइटिंग विशेषज्ञ की रिपोर्ट के अभाव में आरोपी को राहत नहीं दी जा सकती। अब इस मामले में सभी की नजर आरोपी की सजा पर होने वाली अगली सुनवाई पर रहेगी।
