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Chhattisgarh High Court का बड़ा फैसला

Chhattisgarh High Court ने रायपुर की एक निजी धार्मिक संस्था द्वारा महिला को तलाकशुदा घोषित करने वाले आदेश को कानूनी प्रभाव से रहित कर दिया है। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि निजी धार्मिक निकाय कानून के तहत स्थापित अदालत की तरह वैवाहिक स्थिति या कानूनी अधिकारों का बाध्यकारी निर्धारण नहीं कर सकते।

यह फैसला रायपुर निवासी 38 वर्षीय निरोश अब्बासी की याचिका पर 7 सितंबर 2026 को सुनाया गया। याचिका में उन्होंने इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट द्वारा 18 जनवरी 2022 को जारी उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें उनके पति से तलाकशुदा घोषित किया गया था।

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रायपुर की शरिया संस्था के आदेश पर सवाल

मामला उस समय सामने आया जब निरोश अब्बासी ने रायपुर स्थित Idara-E-Shariya Islami Court के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। रिकॉर्ड के मुताबिक इस संस्था ने खुद को कानूनी न्यायालय के रूप में नहीं, बल्कि धार्मिक और सलाहकारी संस्था के रूप में बताया था।

अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या ऐसी निजी धार्मिक संस्था किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति को कानूनी रूप से बदल सकती है और उसके तलाक को अदालत के आदेश की तरह प्रभावी बना सकती है।

Chhattisgarh High Court ने क्या कहा?

Chhattisgarh High Court ने कहा कि Darul Qaza या इसी तरह के निजी धार्मिक मंच धार्मिक राय, सलाह या मत दे सकते हैं, लेकिन उनके निर्णय कानून द्वारा स्थापित अदालत के आदेश के समान बाध्यकारी नहीं हो सकते।

अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी निजी संस्था द्वारा जारी फैसला, फतवा या धार्मिक घोषणा किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार, वैवाहिक स्थिति या कानूनी दायित्वों को अनिवार्य रूप से बदल नहीं सकती।

अदालत ने इसी आधार पर 18 जनवरी 2022 के विवादित आदेश को कानूनी प्रभाव से रहित माना। यह फैसला न्यायिक व्यवस्था और निजी धार्मिक संस्थाओं की भूमिका के बीच अंतर को स्पष्ट करता है।

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क्या था पूरा मामला?

याचिका के अनुसार निरोश अब्बासी के पहले पति का वर्ष 2015 में निधन हो गया था। इसके बाद उन्होंने वर्ष 2022 में मोहम्मद आबिद खान से विवाह किया। बाद में दंपती के बीच पारिवारिक परिस्थितियों और बच्चों के समायोजन को लेकर विवाद पैदा हुआ।

याचिका में अब्बासी ने आरोप लगाया कि उनके पति ने तलाक के संबंध में अलग-अलग तारीखों पर संचार भेजे थे। उन्होंने पति और ससुराल पक्ष पर कथित उत्पीड़न, क्रूरता और दुर्व्यवहार के आरोप भी लगाए थे।

महिला ने लगाए थे गंभीर आरोप

न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार अब्बासी ने 7 अक्टूबर 2021 को पुलिस में शिकायत दी थी। इसके बाद 1 नवंबर 2021 को महिला थाना, रायपुर में आईपीसी की धारा 498-A और 34 के तहत FIR दर्ज की गई थी।

इसी विवाद के बीच 18 जनवरी 2022 को रायपुर की इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट ने तलाक से संबंधित घोषणा जारी की। बाद में अब्बासी ने इस आदेश की कानूनी वैधता को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

Chhattisgarh High Court ने किस बात पर फैसला नहीं दिया?

इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हाईकोर्ट ने Talaq-e-Hasan की संवैधानिक वैधता पर फैसला नहीं किया। अदालत ने अपना निर्णय निजी धार्मिक संस्था के पास मौजूद कानूनी अधिकार और उसके आदेश की बाध्यकारी प्रकृति तक सीमित रखा।

इसलिए इस फैसले को हर प्रकार के धार्मिक तलाक पर हाईकोर्ट की अंतिम राय के रूप में देखना सही नहीं होगा। अदालत ने मुख्य रूप से यह निर्धारित किया कि निजी धार्मिक संस्था कानून द्वारा स्थापित न्यायालय का स्थान नहीं ले सकती।

फैसले का कानूनी महत्व

यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि भारत की न्यायिक व्यवस्था में वैवाहिक अधिकारों और कानूनी स्थिति का निर्धारण सक्षम न्यायिक या वैधानिक प्रक्रिया के तहत होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट भी पहले स्पष्ट कर चुका है कि Darul Qaza या फतवा जारी करने वाली संस्थाओं के निर्णय अपने आप में अदालत के आदेश की तरह बाध्यकारी नहीं होते। हाईकोर्ट के समक्ष भी इसी न्यायिक दृष्टांत का उल्लेख किया गया था।

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कोर्ट और धार्मिक संस्था की भूमिका में अंतर

धार्मिक संस्थाएं अपने समुदाय के सदस्यों को धार्मिक मार्गदर्शन या राय दे सकती हैं, लेकिन ऐसी राय को कानूनी आदेश के रूप में लागू नहीं किया जा सकता।

Chhattisgarh High Court के इस फैसले से यह अंतर और स्पष्ट हुआ है कि धार्मिक सलाह और कानूनन बाध्यकारी न्यायिक आदेश दो अलग-अलग चीजें हैं।

Chhattisgarh High Court का यह फैसला निजी शरिया संस्था के कानूनी अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने साफ किया कि धार्मिक या निजी निकाय किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति और कानूनी अधिकारों को अदालत की तरह बाध्यकारी रूप से निर्धारित नहीं कर सकते। साथ ही, अदालत ने Talaq-e-Hasan की संवैधानिक वैधता पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया। इसलिए इस निर्णय का मूल संदेश निजी धार्मिक संस्था के आदेश की कानूनी हैसियत और न्यायिक अधिकार क्षेत्र तक सीमित है।

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