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Compassionate Appointment: शादीशुदा बेटी को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Compassionate Appointment को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल शादीशुदा होने के आधार पर किसी बेटी को अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) से वंचित नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि विवाह होने मात्र से यह मान लेना कि बेटी अपने दिवंगत पिता पर आर्थिक रूप से निर्भर नहीं थी, कानून और संविधान की भावना के विपरीत है।

16 जुलाई को दिए गए इस फैसले में हाईकोर्ट ने बैंक ऑफ महाराष्ट्र द्वारा एक महिला का आवेदन खारिज करने के आदेश को रद्द कर दिया और बैंक को 30 दिनों के भीतर मामले पर नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया।

Compassionate Appointment मामला क्या था?

याचिकाकर्ता के पिता बैंक ऑफ महाराष्ट्र की रायपुर शाखा में डिप्टी मैनेजर के पद पर कार्यरत थे। सेवा के दौरान उनका निधन हो गया, जिसके बाद उनकी बेटी ने Compassionate Appointment के तहत नौकरी के लिए आवेदन किया।

हालांकि बैंक ने आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि महिला शादीशुदा है और इसलिए वह अपने पिता की नहीं, बल्कि अपने पति की आश्रित मानी जाएगी।

महिला की ओर से अदालत में दलील दी गई कि बैंक की अनुकंपा नियुक्ति नीति में केवल “पूर्ण रूप से आश्रित पुत्री” (Wholly Dependent Daughter) का उल्लेख है। कहीं भी यह नहीं कहा गया कि शादीशुदा बेटी आवेदन नहीं कर सकती।

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Compassionate Appointment पर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

शादी आर्थिक निर्भरता खत्म होने का प्रमाण नहीं

न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल ने कहा कि बैंक ने केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर यह मान लिया कि महिला अपने पति पर निर्भर है। यह धारणा कानूनी रूप से सही नहीं है।

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अपने आवेदन में स्पष्ट रूप से बताया था कि वह आर्थिक रूप से अपने पिता पर निर्भर थी और अपनी मां के भरण-पोषण में भी सहयोग कर रही थी। बैंक के पास इस दावे को गलत साबित करने का कोई ठोस साक्ष्य नहीं था।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा—

“आर्थिक निर्भरता एक तथ्य का प्रश्न है, जिसे केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर तय नहीं किया जा सकता।”


Compassionate Appointment पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला

हाईकोर्ट ने Kulsum Nisha v. State of Uttar Pradesh मामले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का भी उल्लेख किया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि केवल शादीशुदा होने के कारण बेटी को परिवार की परिभाषा से बाहर नहीं किया जा सकता। ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 में दिए गए समानता के अधिकार का उल्लंघन होगा।

हाईकोर्ट ने भी माना कि यदि शादीशुदा बेटा परिवार का हिस्सा माना जाता है, तो केवल विवाह के कारण बेटी को अलग मानना लैंगिक भेदभाव (Gender Stereotype) पर आधारित सोच है।


बैंक ऑफ महाराष्ट्र को क्या निर्देश दिए गए?

हाईकोर्ट ने बैंक ऑफ महाराष्ट्र के आवेदन निरस्त करने के आदेश को मनमाना और कानून के विपरीत बताते हुए रद्द कर दिया।

अदालत ने बैंक को निर्देश दिया कि—

  • महिला के आवेदन पर दोबारा विचार किया जाए।
  • सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ध्यान में रखा जाए।
  • 30 दिनों के भीतर नया निर्णय लिया जाए।

हालांकि अदालत ने सीधे नियुक्ति का आदेश नहीं दिया, बल्कि नियमों के अनुरूप नए सिरे से निर्णय लेने को कहा।


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Compassionate Appointment फैसले का क्या महत्व है?

यह फैसला उन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां सरकारी या बैंक कर्मचारियों की सेवा के दौरान मृत्यु होने पर अनुकंपा नियुक्ति का प्रश्न उठता है।

अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी महिला की वैवाहिक स्थिति को उसकी आर्थिक निर्भरता का अंतिम आधार नहीं माना जा सकता। प्रत्येक मामले में वास्तविक परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्णय लिया जाना चाहिए।

यह फैसला समानता के संवैधानिक सिद्धांतों और महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में भी अहम माना जा रहा है।


Compassionate Appointment को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि शादीशुदा बेटी को केवल विवाह के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। अब ऐसे मामलों में संबंधित संस्थानों को वैवाहिक स्थिति के बजाय वास्तविक आर्थिक निर्भरता और तथ्यों के आधार पर निर्णय लेना होगा।

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