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Chhattisgarh High Court का बड़ा फैसला

Chhattisgarh High Court ने एक वयस्क महिला को बड़ी कानूनी राहत देते हुए उसके खिलाफ Immoral Traffic (Prevention) Act, 1956 यानी ITPA के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी है। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में महिला के खिलाफ ऐसा कोई विशिष्ट कृत्य सामने नहीं आया, जिससे ITPA की धारा 3, 4, 5 और 7 के तहत लगाए गए अपराधों के आवश्यक तत्व पूरे होते हों।

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि उपलब्ध परिस्थितियों में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के Budhadev Karmaskar v. State of West Bengal मामले में दिए गए निर्देशों को भी ध्यान में रखा, जिनमें वयस्क और सहमति से सेक्स वर्क करने वाली महिलाओं को गिरफ्तारी, उत्पीड़न और प्रताड़ना से सुरक्षा देने की बात कही गई है।

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होटल रेड के बाद महिला पर दर्ज हुआ था केस

मामला रायपुर के Hotel Hayat में पुलिस की कार्रवाई से जुड़ा था। अभियोजन के अनुसार होटल में पुलिस ने छापेमारी की थी और बाद में याचिकाकर्ता महिला को मामले में आरोपी बनाया गया।

महिला ने अपनी मौजूदगी से ही इनकार किया था। उसका कहना था कि जब पुलिस ने होटल में छापा मारा, तब वह न तो वहां रह रही थी और न ही मौके पर मौजूद थी।

उसने आरोप लगाया कि बाद में उसे पुलिस स्टेशन बुलाया गया और गलत तरीके से मामले में फंसा दिया गया। उसे गिरफ्तार किया गया था और बाद में रायपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने जमानत पर रिहा कर दिया था।

महिला के अनुसार पुलिस ने चार्जशीट दाखिल नहीं करने का आश्वासन भी दिया था, लेकिन बाद में चार्जशीट पेश कर दी गई।

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Chhattisgarh High Court ने क्या पाया?

मामले में तेलिबांधा थाना, रायपुर में FIR नंबर 493/2022 दर्ज की गई थी। इसमें ITPA की धारा 3, 4, 5 और 7 के तहत आरोप लगाए गए थे।

इसके बाद Criminal Case No. 4121/2023 रायपुर के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के समक्ष लंबित था। महिला ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर FIR, चार्जशीट और आगे की आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की।

केवल सेक्स वर्कर होने का आरोप पर्याप्त नहीं

Chhattisgarh High Court ने जांच के दौरान एकत्र सामग्री और आरोपों की समीक्षा की। पीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता एक वयस्क महिला है और उसके खिलाफ ऐसा कोई स्वतंत्र तथा विशिष्ट कृत्य रिकॉर्ड पर नहीं है, जो संबंधित धाराओं के अपराध के आवश्यक तत्वों को पूरा करता हो।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी महिला का केवल कथित तौर पर सेक्स वर्कर होना अपने आप में उसके खिलाफ संबंधित आपराधिक धाराएं लगाने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता। अभियोजन को विशेष अपराध के आवश्यक तत्वों से संबंधित सामग्री दिखानी होगी।

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सुप्रीम कोर्ट के फैसले का लिया आधार

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Budhadev Karmaskar फैसले और 19 मई 2022 के निर्देशों को महत्वपूर्ण माना। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सेक्स वर्कर्स को कानून का समान संरक्षण मिलना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि आपराधिक कानून उम्र और सहमति के आधार पर समान रूप से लागू होना चाहिए। साथ ही स्वैच्छिक सेक्स वर्क को अपराध नहीं मानते हुए छापेमारी के दौरान सेक्स वर्कर्स को अनावश्यक गिरफ्तारी, उत्पीड़न या प्रताड़ना से बचाने के निर्देश दिए गए थे।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि ये निर्देश संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों का प्रयोग करते हुए जारी किए गए थे।

Prajwala मामले का भी उल्लेख

Chhattisgarh High Court ने बाद के सुप्रीम कोर्ट के Prajwala v. Union of India फैसले का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि स्वैच्छिक सेक्स वर्कर्स को छापेमारी के दौरान उत्पीड़न और प्रताड़ना से सुरक्षा देने का सिद्धांत वहां भी दोहराया गया है।

इन न्यायिक निर्देशों की रोशनी में हाईकोर्ट ने माना कि महिला की कथित स्थिति को अलग करके नहीं देखा जा सकता।

राज्य सरकार ने क्या दलील दी?

राज्य की ओर से याचिका का विरोध किया गया। अभियोजन ने कहा कि FIR कथित ITPA अपराधों से संबंधित सूचना के आधार पर दर्ज हुई थी और जांच के बाद चार्जशीट भी दाखिल की गई।

राज्य की दलील थी कि महिला की होटल में मौजूदगी और जांच में जुटाए गए साक्ष्यों की विश्वसनीयता जैसे सवालों का परीक्षण ट्रायल कोर्ट में होना चाहिए।

सरकार ने यह भी कहा कि महिला मुकदमे के दौरान अपनी रक्षा में ये दलीलें उठा सकती है। इसलिए इस स्तर पर धारा 482 CrPC के तहत हाईकोर्ट को कार्यवाही खत्म नहीं करनी चाहिए।

Chhattisgarh High Court ने FIR और चार्जशीट क्यों रद्द की?

पीठ ने उपलब्ध सामग्री का परीक्षण करने के बाद पाया कि महिला के खिलाफ आरोपित अपराधों के आवश्यक तत्वों को स्थापित करने वाला पर्याप्त विशिष्ट आधार नहीं है।

कोर्ट ने माना कि मौजूदा परिस्थितियों में कार्यवाही जारी रखने से कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा नहीं होगा और इससे उस तरह के उत्पीड़न की स्थिति पैदा हो सकती है, जिससे बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने विशेष निर्देश दिए हैं।

इस आधार पर हाईकोर्ट ने अपनी अंतर्निहित अधिकारिता का इस्तेमाल करते हुए याचिका स्वीकार कर ली।

अदालत ने FIR No. 493/2022, उससे संबंधित चार्जशीट और Criminal Case No. 4121/2023 को याचिकाकर्ता, जो मामले में आरोपी नंबर 3 थी, के संबंध में रद्द कर दिया।

25 जुलाई 2023 के अंतरिम आदेश का भी उल्लेख

मामला इससे पहले 25 जुलाई 2023 को भी हाईकोर्ट के सामने आया था। उस समय कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Budhadev Karmaskar फैसले के संदर्भ में आरोपों पर विचार करते हुए आगे की कार्यवाही पर रोक लगाई थी।

बाद में यह अंतरिम सुरक्षा जारी रही। अंतिम सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि परिस्थितियों में ऐसा कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं हुआ है, जिससे पहले की न्यायिक स्थिति से अलग निष्कर्ष निकालने की जरूरत पड़े।

Chhattisgarh High Court का यह फैसला वयस्क महिलाओं के कानूनी अधिकारों और ITPA के तहत आपराधिक कार्यवाही के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल किसी महिला के कथित सेक्स वर्कर होने का आरोप, बिना किसी विशिष्ट आपराधिक कृत्य के, संबंधित धाराओं के तहत मुकदमा जारी रखने का पर्याप्त आधार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के संरक्षण संबंधी निर्देशों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने महिला के खिलाफ FIR, चार्जशीट और लंबित आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।

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