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Bastar Leopard Rescue में 48 घंटे बाद सफलता

Bastar Leopard Rescue अभियान को बड़ी सफलता मिली है। छत्तीसगढ़ के बस्तर में करीब 48 घंटे तक चले अभियान के बाद कैमरा ट्रैप में एक मादा तेंदुआ अपने दोनों शावकों के पास लौटती दिखाई दी। इसके बाद वह दोनों शावकों को अपने साथ घने जंगल में ले गई।

बारिश, घने कोहरे, अंधेरे और दुर्गम पहाड़ी जंगलों के बीच वन विभाग की टीम लगातार निगरानी करती रही। इस अभियान का उद्देश्य शावकों को उनकी मां से मिलाना और उन्हें अनावश्यक मानवीय हस्तक्षेप से बचाना था।

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ग्रामीणों को मिला था तेंदुए का शावक

यह मामला 22 अगस्त 2026 को सामने आया, जब दरभा तहसील के छोटे गुड़रा क्षेत्र में ग्रामीणों को तेंदुए का एक शावक मिला। कुछ ग्रामीणों ने उसे बिल्ली का बच्चा समझकर उठा लिया था।

बाद में वन विभाग को इसकी जानकारी दी गई। वन विभाग की टीम ने रात करीब 11:20 बजे शावक को सुरक्षित कब्जे में लिया और उसे प्राकृतिक आवास में मां से मिलाने की योजना बनाई।

वन अधिकारियों के लिए यह केवल शावक को बचाने का मामला नहीं था। कोशिश थी कि मां और बच्चे के प्राकृतिक व्यवहार को प्रभावित किए बिना उन्हें फिर से एक साथ किया जाए।

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Bastar Leopard Rescue में दूसरा शावक भी मिला

ग्रामीणों की मदद से वन विभाग की टीम चित्रकोट रेंज के पहाड़ी जंगलों में पहुंची। भारी बारिश, घने कोहरे और अंधेरे के बीच टीम ने उस इलाके में कई घंटे तलाश की।

करीब सुबह 4 बजे शावक को उस स्थान के पास सुरक्षित जगह पर छोड़ा गया, जहां से वह मिला था। अधिकारियों को उम्मीद थी कि मादा तेंदुआ उसकी आवाज और गंध के जरिए उसे तलाश लेगी।

टीम सुरक्षित दूरी पर हट गई और मौके की निगरानी शुरू कर दी। लेकिन काफी समय तक मादा तेंदुए की कोई गतिविधि नजर नहीं आई।

इसके बाद वन विभाग ने ग्रामीणों की सहायता से आसपास के जंगल में तलाश का दायरा बढ़ाया। इसी दौरान टीम को एक दूसरा तेंदुआ शावक भी मिल गया।

दोनों शावकों को उनके प्राकृतिक आवास में सुरक्षित स्थान पर रखा गया। इसके बाद वन विभाग ने वहां हाई-रिजॉल्यूशन कैमरा ट्रैप लगाए।

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कैमरा ट्रैप ने खोला मां के लौटने का राज

वन विभाग ने शावकों की निगरानी के लिए तकनीक का सहारा लिया। कैमरा ट्रैप लगाने का उद्देश्य यह था कि वनकर्मी लगातार मौके पर मौजूद न रहें और मादा तेंदुए को इंसानों की मौजूदगी का अहसास न हो।

जगदलपुर के चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट्स स्टाइलो मंडावी के अनुसार टीम करीब 48 घंटे तक क्षेत्र में सतर्क रही। कर्मचारी लगातार जानवरों की गतिविधियों पर नजर रखते और कैमरा ट्रैप की फुटेज की जांच करते रहे।

आखिरकार सोमवार रात कैमरा ट्रैप में वह दृश्य कैद हुआ, जिसका वन विभाग को इंतजार था। फुटेज में मादा तेंदुआ दोनों शावकों के पास पहुंचती दिखाई दी।

कुछ देर उनके पास रहने के बाद मादा तेंदुआ दोनों शावकों को अपने साथ घने जंगल की ओर ले गई। इससे वन विभाग को पुष्टि हो गई कि दोनों शावक अपनी मां के साथ सुरक्षित रूप से लौट गए हैं।

प्राकृतिक आवास में मां से हुआ दोनों शावकों का मिलन

वन विभाग के मुताबिक, वन्यजीव बचाव अभियान में प्राथमिकता हमेशा संभव होने पर छोटे जानवरों को उनकी मां और प्राकृतिक आवास में वापस पहुंचाने की होती है।

ऐसे मामलों में लंबे समय तक मानव देखभाल में रखने के बजाय प्राकृतिक पुनर्मिलन को प्राथमिकता दी जाती है। इससे वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार को बनाए रखने में मदद मिलती है।

इस अभियान की सफलता इसी वजह से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। शावकों को सुरक्षित रखने के साथ-साथ वन विभाग ने मादा तेंदुए को उन्हें खुद खोजने और अपने साथ ले जाने का अवसर दिया।

Bastar Leopard Rescue में ग्रामीणों की अहम भूमिका

अभियान में स्थानीय ग्रामीणों और वन प्रबंधन समिति की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। ग्रामीणों ने शावक मिलने की सूचना देने के साथ जंगल में टीम को रास्ता दिखाने और दूसरे शावक का पता लगाने में सहयोग किया।

बस्तर DFO दीपेश कपिल ने बताया कि इस अभियान ने तेज फील्ड रिस्पॉन्स, आधुनिक तकनीक और स्थानीय समुदाय के सहयोग के महत्व को सामने रखा।

कैमरा ट्रैप की मदद से वन विभाग शावकों की गतिविधियों पर नजर रख सका, जबकि मौके पर इंसानी आवाजाही को न्यूनतम रखा गया। इससे मादा तेंदुए के वापस लौटने की संभावना बेहतर हुई।

Bastar Leopard Rescue ने दिया संरक्षण का संदेश

यह पूरा अभियान बताता है कि वन्यजीवों के रेस्क्यू में केवल तत्काल बचाव ही पर्याप्त नहीं होता। कई बार सबसे अच्छा संरक्षण उपाय जानवर को उसके प्राकृतिक परिवार और पर्यावरण में वापस पहुंचाना होता है।

स्थानीय लोगों की सूचना, वन विभाग की त्वरित कार्रवाई और कैमरा ट्रैप जैसी तकनीक के संयोजन ने इस अभियान को सफल बनाया।

Bastar Leopard Rescue अभियान की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि दोनों तेंदुआ शावक अपनी मां के साथ वापस जंगल में पहुंच गए। करीब 48 घंटे की लगातार निगरानी, कठिन मौसम, दुर्गम जंगल और कैमरा ट्रैप की मदद से वन विभाग ने प्राकृतिक पुनर्मिलन सुनिश्चित किया। यह घटना दिखाती है कि वन्यजीव संरक्षण में तकनीक, वनकर्मियों की सतर्कता और स्थानीय समुदाय का सहयोग मिलकर किस तरह प्रभावी परिणाम दे सकता है।

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