Chaitanya Baghel Bail मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक न्याय व्यवस्था और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि यदि किसी आरोपी को हाईकोर्ट से जमानत मिल चुकी है, तो उसे अंतिम माना जाना चाहिए और सामान्य परिस्थितियों में राज्यों की ओर से ऐसी जमानत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील नहीं की जानी चाहिए। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में उसे हाईकोर्ट के आदेश को लेकर गंभीर आपत्तियां (serious reservations) थीं।
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Chaitanya Baghel Bail मामले में क्या हुआ?
बुधवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने छत्तीसगढ़ सरकार की उस अपील का निपटारा किया, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पुत्र चैतन्य बघेल को हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत को चुनौती दी गई थी।
पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन भी शामिल थे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामलों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण न्यायपालिका की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। इसी सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट से मिली जमानत को अंतिम मानने की परंपरा को फिर से मजबूत करने की जरूरत है।
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Chaitanya Baghel Bail पर सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि 1980 के दशक में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश पी. एन. भगवती ने भी कहा था कि हाईकोर्ट के जमानत संबंधी आदेशों को अंतिम माना जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि पिछले दो दशकों में राज्यों द्वारा हाईकोर्ट की जमानत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। इससे सुप्रीम कोर्ट पर मामलों का अतिरिक्त बोझ बढ़ रहा है।
अदालत ने कहा कि लगभग हर दिन सुप्रीम कोर्ट की प्रत्येक पीठ के सामने ऐसे करीब 10 मामले आते हैं, जो चिंता का विषय है।
लंबे बेल आदेशों पर CJI सूर्यकांत की नाराजगी
Chaitanya Baghel Bail की सुनवाई के दौरान CJI ने हाईकोर्टों द्वारा दिए जा रहे लंबे जमानत आदेशों पर भी चिंता व्यक्त की।
उन्होंने कहा कि कई हाईकोर्ट जमानत देने या खारिज करने के आदेश 40 से 50 पन्नों में लिख रहे हैं। इससे मुकदमे के गुण-दोष (Merits) पर अनावश्यक चर्चा होती है, जिसका असर निष्पक्ष सुनवाई पर पड़ सकता है।
CJI ने कहा कि जमानत संबंधी आदेश सामान्यतः तीन से चार पन्नों से अधिक नहीं होने चाहिए।
न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में जमानत से जुड़े मामलों में प्राथमिकता उन मामलों को मिलनी चाहिए, जहां किसी व्यक्ति को जमानत नहीं मिली है और उसकी स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है।
उन्होंने कहा कि यदि जमानत रद्द करने की मांग की जाती है, तो अदालत को पीड़ितों के अधिकार, समाज के हित और आरोपी की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना होगा।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि UAPA और PMLA जैसे मामलों में 40-50 पन्नों के जमानत आदेश लिखने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है।
राज्यों की अपीलों पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई बार जांच एजेंसियां और अभियोजन पक्ष जमानत रद्द कराने पर अधिक जोर देते हैं, जबकि उनका मुख्य उद्देश्य निष्पक्ष जांच और मजबूत साक्ष्यों के आधार पर दोष सिद्ध करना होना चाहिए।
अदालत ने कहा कि यदि जांच और अभियोजन सही ढंग से कार्य करें, तो दोषियों को सजा दिलाना अधिक प्रभावी होगा। केवल जमानत रद्द कराने की कोशिश करना न्याय प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकता।
पीठ ने यह भी कहा कि कई मामलों में आरोपी बरी इसलिए नहीं होते कि वे निर्दोष हैं, बल्कि इसलिए कि जांच या अभियोजन में कमियां रह जाती हैं। ऐसे मामलों में जवाबदेही तय करना अधिक जरूरी है।
सॉलिसिटर जनरल और कपिल सिब्बल की दलीलें
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि Chaitanya Baghel Bail का मामला सामान्य नहीं है। उन्होंने अदालत को बताया कि इस मामले में न्यायाधीश और तत्कालीन छत्तीसगढ़ के महाधिवक्ता के बीच कथित व्हाट्सएप संदेशों से जुड़ा एक विशेष पहलू मौजूद है।
वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल जब चैतन्य बघेल की जमानत के पक्ष में दलील देने लगे, तो पीठ ने कहा कि वह इस मामले के तथ्यों पर चर्चा नहीं करना चाहती क्योंकि उसे हाईकोर्ट के आदेश को लेकर गंभीर आपत्तियां हैं।
Chaitanya Baghel Bail मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां केवल एक मामले तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे आपराधिक न्याय तंत्र के लिए महत्वपूर्ण संदेश देती हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत को सामान्यतः अंतिम माना जाना चाहिए और राज्यों को हर जमानत आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट नहीं पहुंचना चाहिए। साथ ही न्यायालय ने लंबी जमानत आदेशों, अभियोजन की जवाबदेही और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण पर भी महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने रखे हैं।
