Tribal Cultural Conclave: लाल किले से गूंजी जनजातीय अस्मिता और सांस्कृतिक गौरव

Tribal Cultural Conclave के दौरान देश की राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला मैदान में जनजातीय संस्कृति, परंपरा और सामाजिक चेतना का भव्य संगम देखने को मिला। भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर आयोजित इस राष्ट्रीय जनजाति सांस्कृतिक समागम में देशभर से हजारों जनजातीय प्रतिनिधि, युवा और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए।

जनजाति सुरक्षा मंच और जनजाति जागृति समिति की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे। वहीं Vishnu Deo Sai की उपस्थिति ने आयोजन को खास महत्व दिया।

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लाल किले में जनजातीय संस्कृति का भव्य आयोजन

दिल्ली के ऐतिहासिक Red Fort मैदान में आयोजित यह कार्यक्रम पारंपरिक वेशभूषा, लोक वाद्ययंत्रों और जनजातीय रंगों से सजा हुआ था।

कार्यक्रम में देश के अलग-अलग राज्यों से आए जनजातीय समुदायों ने अपनी सांस्कृतिक परंपराओं की झलक प्रस्तुत की। मांदर, ढोल और लोकधुनों की गूंज ने पूरे माहौल को उत्साह और ऊर्जा से भर दिया।

यह आयोजन सिर्फ सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं बल्कि जनजातीय पहचान और सांस्कृतिक संरक्षण का राष्ट्रीय संदेश बनकर सामने आया।

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Tribal Cultural Conclave में अमित शाह और CM साय की मौजूदगी

कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने जनजातीय समाज की भूमिका को देश की सांस्कृतिक धरोहर बताया।

वहीं मुख्यमंत्री Vishnu Deo Sai ने कहा कि जनजातीय समाज केवल प्रकृति का रक्षक नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा का सबसे प्राचीन और जीवंत स्वरूप है।

उन्होंने कहा कि सदियों से जनजातीय समाज जल, जंगल और जमीन की रक्षा करते हुए प्रकृति और मानव जीवन के बीच संतुलन बनाए हुए है।

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जनजातीय समाज को लेकर CM विष्णुदेव साय का बड़ा संदेश

मुख्यमंत्री ने कहा कि आज पूरी दुनिया पर्यावरण संकट का सामना कर रही है। ऐसे समय में जनजातीय जीवन दर्शन मानवता को टिकाऊ विकास का रास्ता दिखा सकता है।

उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज की संस्कृति और परंपराएं भारत की मूल चेतना का हिस्सा हैं। इन्हें संरक्षित करना पूरे देश की जिम्मेदारी है।

Tribal Cultural Conclave में सांस्कृतिक पहचान पर जोर

मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि जनजातीय समाज की अस्मिता और संवैधानिक अधिकारों को लेकर जागरूकता बढ़ रही है।

उन्होंने कहा कि जो लोग अपनी मूल जनजातीय परंपराओं और संस्कृति को छोड़ चुके हैं, उन्हें अनुसूचित जनजाति सूची में रखने के मुद्दे पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए।

हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि यह किसी समुदाय के विरोध में नहीं बल्कि जनजातीय अस्मिता और अधिकारों की रक्षा के लिए उठाई गई बात है।


छत्तीसगढ़ की जनजातीय पहचान पर क्या बोले मुख्यमंत्री

Chhattisgarh के मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य की पहचान उसकी समृद्ध जनजातीय संस्कृति से जुड़ी हुई है।

उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ में 42 प्रकार की जनजातियां निवास करती हैं और राज्य का लगभग 44 प्रतिशत हिस्सा वन क्षेत्र से आच्छादित है।

मुख्यमंत्री ने भगवान Birsa Munda और वीर नारायण सिंह को याद करते हुए कहा कि इन महानायकों ने अपनी संस्कृति और अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष और बलिदान दिया।


Tribal Cultural Conclave में आदि परब और बस्तर ओलंपिक का जिक्र

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि उनकी सरकार जनजातीय संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण के लिए लगातार काम कर रही है।

उन्होंने नया रायपुर में आयोजित ‘आदि परब’, बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजनों का जिक्र करते हुए कहा कि इन कार्यक्रमों के जरिए जनजातीय प्रतिभाओं को राष्ट्रीय मंच दिया जा रहा है।

जनजातीय युवाओं को मिल रहा मंच

सरकार का प्रयास है कि जनजातीय युवाओं को खेल, कला और संस्कृति के क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर मिले।

इन आयोजनों के जरिए स्थानीय प्रतिभाओं को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की कोशिश की जा रही है।

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जनजातीय भाषाओं और परंपराओं के संरक्षण पर जोर

मुख्यमंत्री ने कहा कि किसी भी समाज की संस्कृति उसकी भाषा से जीवित रहती है।

इसी उद्देश्य से राज्य सरकार गोंडी, हल्बी और सादरी जैसी जनजातीय भाषाओं में बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा देने की दिशा में विशेष पहल कर रही है।

इस कदम का उद्देश्य नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़कर रखना है।


देवगुड़ी और मातागुड़ी संरक्षण की पहल

मुख्यमंत्री ने बताया कि बस्तर से सरगुजा तक देवगुड़ी और मातागुड़ी जैसे पारंपरिक आस्था केंद्रों के संरक्षण और विकास का कार्य तेजी से किया जा रहा है।

सरकार का मानना है कि इन आस्था केंद्रों का संरक्षण जनजातीय सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी है।


सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने जीता दिल

कार्यक्रम के दौरान देशभर से आए जनजातीय कलाकारों ने लोकनृत्य, पारंपरिक संगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से भारत की समृद्ध जनजातीय विरासत की झलक पेश की।

लाल किला मैदान में दिनभर गूंजते पारंपरिक वाद्ययंत्रों और लोकधुनों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

Tribal Cultural Conclave बना राष्ट्रीय संदेश

यह समागम केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं बल्कि जनजातीय एकता, स्वाभिमान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सशक्त संदेश बनकर उभरा।


Tribal Cultural Conclave ने एक बार फिर यह साबित किया कि भारत की जनजातीय संस्कृति देश की सबसे प्राचीन और समृद्ध धरोहरों में से एक है।

दिल्ली के लाल किले से उठा यह संदेश केवल सांस्कृतिक गौरव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जनजातीय समाज की पहचान, अधिकार और एकता को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम बनकर सामने आया।

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