Mount Everest Summit: जांजगीर-चांपा की बेटी अमिता श्रीवास ने रचा इतिहास

Mount Everest Summit में छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले की बेटी और पर्वतारोही अमिता श्रीवास ने इतिहास रच दिया है। 22 मई 2026 को दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराकर उन्होंने पूरे प्रदेश का नाम रोशन किया।

8848.86 मीटर ऊंची इस दुर्गम चोटी पर पहुंचना किसी भी पर्वतारोही के लिए बेहद कठिन माना जाता है। लेकिन इस ऐतिहासिक उपलब्धि के तुरंत बाद अमिता की तबीयत गंभीर रूप से बिगड़ गई और उन्हें नेपाल के काठमांडू स्थित अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।

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Mount Everest Summit के बाद बिगड़ी तबीयत

एवरेस्ट समिट से लौटते समय अत्यधिक ठंड, ऑक्सीजन की भारी कमी और शारीरिक थकावट के कारण अमिता श्रीवास की हालत अचानक खराब हो गई।

गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्हें हेलिकॉप्टर से रेस्क्यू कर नेपाल की राजधानी Kathmandu लाया गया। वर्तमान में उनका इलाज नॉर्विक इंटरनेशनल हॉस्पिटल में चल रहा है।

डॉक्टरों के अनुसार अमिता गंभीर फ्रॉस्टबाइट और हाई एल्टीट्यूड से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही हैं।

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अमिता श्रीवास की कठिन एवरेस्ट यात्रा

अप्रैल में शुरू हुआ अभियान

अमिता श्रीवास की एवरेस्ट यात्रा अप्रैल 2026 के पहले सप्ताह में शुरू हुई थी। वे छत्तीसगढ़ से नेपाल पहुंचीं और वहां से दुनिया के सबसे खतरनाक एयरपोर्ट माने जाने वाले लुक्ला के लिए रवाना हुईं।

लुक्ला से उन्होंने पैदल ट्रेकिंग शुरू की और करीब 9 दिनों की कठिन यात्रा के बाद एवरेस्ट बेस कैंप पहुंचीं।

ऊंचाई के लिए शरीर को किया तैयार

यात्रा के दौरान अमिता नामचे बाजार और थ्यांगबोचे जैसे गांवों से होकर गुजरीं। इसका उद्देश्य शरीर को कम ऑक्सीजन और अधिक ऊंचाई के अनुकूल बनाना था।

Mount Everest Summit तक पहुंचने के लिए पर्वतारोहियों को लंबे समय तक कठिन परिस्थितियों में खुद को तैयार करना पड़ता है।

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करीब एक महीने तक कठिन ट्रेनिंग

एवरेस्ट बेस कैंप पहुंचने के बाद अमिता ने लगभग एक महीने तक कठिन ट्रेनिंग और रोटेशन पूरा किया।

उन्होंने कैंप-1, कैंप-2 और कैंप-3 तक कई बार चढ़ाई की ताकि शरीर बेहद कम ऑक्सीजन वाले वातावरण के अनुकूल हो सके।

खुंबू आइसफॉल को कई बार किया पार

अभियान के दौरान अमिता ने खतरनाक खुंबू आइसफॉल को भी कई बार पार किया। इसे माउंट एवरेस्ट अभियान का सबसे जोखिम भरा हिस्सा माना जाता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक यहां बर्फ की बड़ी-बड़ी दीवारें और ग्लेशियर किसी भी समय टूट सकते हैं।


डेथ जोन में कैसे पहुंचीं अमिता

मई के तीसरे सप्ताह में मौसम अनुकूल होने पर अमिता ने अंतिम समिट अभियान शुरू किया।

20 मई को वे साउथ कोल यानी कैंप-4 पहुंचीं, जिसे “डेथ जोन” कहा जाता है। यहां ऑक्सीजन सामान्य स्तर का केवल 33 प्रतिशत रह जाती है।

Mount Everest Summit का अंतिम संघर्ष

21 मई की रात कुछ घंटे आराम करने के बाद अमिता ने अंतिम चढ़ाई शुरू की।

कड़ाके की ठंड, बर्फीली हवाओं और अंधेरे के बीच आखिरकार 22 मई की सुबह उन्होंने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर कदम रखा और तिरंगा फहराकर इतिहास रच दिया।


फ्रॉस्टबाइट और ऑक्सीजन की कमी से हालत गंभीर

माउंट एवरेस्ट पर तापमान शून्य से 40 डिग्री नीचे तक पहुंच जाता है। ऐसी स्थिति में शरीर के अंग तेजी से सुन्न होने लगते हैं।

इसी कारण अमिता के शरीर पर फ्रॉस्टबाइट का असर हुआ। अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम लगातार उनकी निगरानी कर रही है।

विशेषज्ञ मेडिकल सुपरविजन में इलाज जारी

डॉक्टरों ने उन्हें विशेष मेडिकल सुपरविजन में रखा है। फिलहाल उनकी हालत स्थिर बताई जा रही है, लेकिन वे अभी भी जोखिम से बाहर नहीं हैं।

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मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने क्या कहा

Vishnu Deo Sai ने इस घटना को गंभीरता से लेते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अमिता के स्वास्थ्य की जानकारी साझा की।

मुख्यमंत्री ने कहा कि यह पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गर्व का क्षण है कि राज्य की बेटी ने विश्व की सर्वोच्च चोटी पर तिरंगा फहराया।

उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि काठमांडू स्थित अस्पताल से लगातार संपर्क बनाए रखें।


पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गर्व का क्षण

अमिता श्रीवास की यह उपलब्धि पूरे छत्तीसगढ़ के लिए प्रेरणा बन गई है।

जांजगीर-चांपा से निकलकर दुनिया की सबसे ऊंची चोटी तक पहुंचना यह साबित करता है कि कठिन मेहनत और मजबूत इरादों से कोई भी सपना पूरा किया जा सकता है।

Mount Everest Summit में मिली यह सफलता प्रदेश के युवाओं, खासकर बेटियों के लिए नई प्रेरणा बनकर उभरी है।


Mount Everest Summit में अमिता श्रीवास की सफलता ने छत्तीसगढ़ का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोशन कर दिया है। हालांकि एवरेस्ट फतह के बाद उनकी तबीयत बिगड़ना चिंता का विषय बना हुआ है।

पूरे प्रदेश की दुआएं उनके साथ हैं और लोग उनके जल्द स्वस्थ होने की कामना कर रहे हैं। अमिता की यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों को साहस, संघर्ष और देशभक्ति की प्रेरणा देती रहेगी।

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