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Maternity Leave Rights पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Maternity Leave Rights को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महिला कर्मचारियों के हित में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मिसकैरेज के दौरान लिया गया अवकाश बाद में हुई गर्भावस्था के मातृत्व अवकाश में समायोजित नहीं किया जा सकता। साथ ही केवल लीव बैलेंस कम होने के आधार पर किसी महिला कर्मचारी को मातृत्व लाभ से वंचित करना उचित नहीं है।

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) की अपील खारिज कर दी। इसके साथ ही सिंगल बेंच के उस फैसले को बरकरार रखा गया, जिसमें महिला कर्मचारी को राहत दी गई थी।

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Maternity Leave Rights में मिसकैरेज का अवकाश अलग

कोर्ट के फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मिसकैरेज के कारण लिया गया अवकाश और बाद की गर्भावस्था का मातृत्व अवकाश अलग-अलग परिस्थितियों से जुड़े हैं। इसलिए पहले लिए गए अवकाश को बाद के मातृत्व लाभ में समायोजित नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी माना कि मातृत्व लाभ केवल सामान्य छुट्टी की तरह नहीं है। यह महिला के स्वास्थ्य, सम्मान और कल्याण से जुड़ा महत्वपूर्ण अधिकार है।

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Maternity Leave Rights और लीव बैलेंस पर कोर्ट की अहम टिप्पणी

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी के लीव बैलेंस में कमी को आधार बनाकर मातृत्व लाभ रोकना उचित नहीं होगा। महिला कर्मचारी के मातृत्व से जुड़े अधिकारों पर तकनीकी आधार का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

अदालत का यह रुख महिला कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे मातृत्व अवकाश को केवल सामान्य सेवा अवकाश के नजरिए से देखने की प्रवृत्ति पर सवाल उठता है।

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क्या है पूरा मामला?

यह मामला फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के रायपुर जिला कार्यालय में असिस्टेंट ग्रेड-2 के पद पर कार्यरत किरण गौतम शर्मा से जुड़ा है।

वर्ष 2019 में किरण जुड़वा बच्चों की गर्भवती थीं। 25 अप्रैल 2019 को मेडिकल जटिलता के कारण एक भ्रूण का मिसकैरेज हो गया। वहीं, दूसरे भ्रूण की गर्भावस्था को डॉक्टरों ने हाई रिस्क बताया था।

डॉक्टरों ने उन्हें लंबे समय तक बेड रेस्ट की सलाह दी। इसके बाद 3 सितंबर 2019 को उन्होंने एक बच्ची को जन्म दिया।

68 दिनों के अवकाश पर हुआ विवाद

एफसीआई ने किरण के 68 दिनों के अवकाश को एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी लीव माना। इस अवधि का वेतन रोक दिया गया। इसके परिणामस्वरूप उनके वेतन से 80,254 रुपये की कटौती हुई।

इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा। सिंगल बेंच ने 13 मई 2026 को महिला कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाया और मिसकैरेज तथा मातृत्व अवकाश से जुड़े कुल 90 दिनों के लाभ देने का निर्देश दिया।

साथ ही वेतन से की गई कटौती को भी रद्द करने का आदेश दिया गया।

हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिया?

सिंगल बेंच के फैसले के खिलाफ एफसीआई ने डिवीजन बेंच में अपील दाखिल की। लेकिन चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की पीठ ने एफसीआई की अपील खारिज कर दी।

डिवीजन बेंच ने महिला कर्मचारी को दी गई राहत को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि मातृत्व लाभ को केवल तकनीकी आधार या लीव बैलेंस की कमी के कारण नहीं छीना जा सकता।

यह फैसला Maternity Leave Rights के संदर्भ में इसलिए अहम है क्योंकि अदालत ने महिला के स्वास्थ्य और कल्याण को मातृत्व लाभ की व्याख्या में महत्वपूर्ण माना है।

इलाज के खर्च पर भी दिया निर्देश

मामले में निजी अस्पताल में हुए इलाज के खर्च की प्रतिपूर्ति का मुद्दा भी सामने आया था। हालांकि हाईकोर्ट ने इस मामले में सीधे भुगतान का आदेश नहीं दिया।

अदालत ने संबंधित विभाग को इलाज से जुड़े दस्तावेजों की जांच करने और लागू नियमों के अनुसार नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया है।

इसका अर्थ है कि मेडिकल खर्च की प्रतिपूर्ति का अंतिम फैसला संबंधित विभाग दस्तावेजों और नियमों की जांच के बाद करेगा।

निष्कर्ष

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला Maternity Leave Rights के लिहाज से महत्वपूर्ण है। अदालत ने साफ किया कि मिसकैरेज के दौरान लिया गया अवकाश बाद की गर्भावस्था के मातृत्व अवकाश में समायोजित नहीं किया जा सकता। साथ ही केवल लीव बैलेंस की कमी के आधार पर मातृत्व लाभ रोकना उचित नहीं है। इस फैसले से महिला कर्मचारियों के स्वास्थ्य, सम्मान और मातृत्व अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण न्यायिक संदेश सामने आया है।

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