वक्फ संशोधन बिल के बाद केरल के मुनंबम में राजनीतिक भूकंप: 50 ईसाई परिवार बीजेपी में शामिल

केरल के एर्नाकुलम ज़िले के मुनंबम गांव में उस वक्त एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला जब संसद में वक्फ (संशोधन) विधेयक पारित होते ही गांव के 50 से अधिक निवासी, जो पहले कांग्रेस और माकपा (CPI(M)) के समर्थक थे, भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हो गए। यह सभी निवासी मुख्यतः ईसाई समुदाय से हैं और पिछले 175 दिनों से केरल वक्फ बोर्ड के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं

भूमि विवाद की जड़ें और वक्फ बोर्ड का दावा

मुनंबम के करीब 600 हिंदू और ईसाई परिवार 404 एकड़ ज़मीन पर वक्फ बोर्ड के दावे का विरोध कर रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने यह ज़मीन कानूनी रूप से फारूक कॉलेज से खरीदी थी और वर्षों से इस पर टैक्स भी अदा कर रहे हैं। विवाद की शुरुआत 1902 के एक पट्टे और 1950 में एक वक्फ दान से जुड़ी है। 2009 में निसार आयोग की रिपोर्ट के बाद इस भूमि को वक्फ संपत्ति घोषित किया गया, जिसके बाद 2019 से वक्फ बोर्ड ने भूमि कर स्वीकार करना बंद कर दिया।

बीजेपी ने बताया राजनीतिक बदलाव का संकेत

बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने वक्फ संशोधन विधेयक पारित होने के बाद मुनंबम का दौरा किया और आंदोलनकारी परिवारों से मुलाकात की। उन्होंने इस दिन को केरल की राजनीतिक इतिहास में “टर्निंग पॉइंट” बताया और कहा कि यह आंदोलन प्रधानमंत्री और संसद को ताकत देने वाला रहा। उन्होंने भरोसा दिलाया कि बीजेपी तब तक साथ खड़ी रहेगी जब तक गांव वालों को उनकी ज़मीन के अधिकार वापस नहीं मिलते।

चंद्रशेखर ने UDF और LDF पर निशाना साधते हुए कहा कि ये दल “तुष्टिकरण की राजनीति” में लगे हैं और मुनंबम जैसे गांवों को उनके हाल पर छोड़ दिया है।

चर्च का कांग्रेस और वामपंथियों पर हमला

दिलचस्प बात यह रही कि ईसाई समुदाय के प्रभावशाली मीडिया हाउस दीपिका ने भी कांग्रेस और माकपा की आलोचना की। उन्होंने वक्फ एक्ट की उन धाराओं को “जनविरोधी” बताया जिनके आधार पर बिना पुख्ता प्रमाण के जमीनों पर दावा किया जा सकता है। दीपिका ने विपक्षी दलों पर आरोप लगाया कि वे उत्तर भारत और मणिपुर में कथित ईसाई विरोधी घटनाओं का भय दिखाकर केरल के अल्पसंख्यकों को गुमराह कर रहे हैं।

भविष्य की राजनीति में बदलाव के संकेत

केरल लंबे समय से बीजेपी के लिए कठिन राज्य रहा है, लेकिन मुनंबम जैसे प्रकरण इस बात के संकेत हैं कि अगर कांग्रेस और वाम दलों ने अल्पसंख्यकों की ज़मीनी समस्याओं की अनदेखी की, तो राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। बीजेपी इस अवसर को केरल की राजनीति में घुसपैठ के रूप में देख रही है, विशेषकर उन अल्पसंख्यकों के बीच जिनके भूमि अधिकार खतरे में हैं।

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