CRPF Constable की छह महीने से अधिक की अनधिकृत अनुपस्थिति के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने सेवा से हटाने के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि अनुशासित सशस्त्र बल में तैनात कर्मचारी को ड्यूटी से लंबे समय तक गैरहाजिर रहने की छूट नहीं दी जा सकती।
न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी ने 9 सितंबर 2026 को राहुल सोपनराव हिंगणकर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता को विभागीय जांच में अपना पक्ष रखने के पर्याप्त अवसर दिए गए थे।
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CRPF Constable की छह महीने से ज्यादा अनुपस्थिति
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता को 25 मार्च 2009 को CRPF में कांस्टेबल के पद पर नियुक्त किया गया था। वह 219 बटालियन CRPF में तैनात था।
उसे 13 फरवरी 2017 से 14 मार्च 2017 तक एक महीने की मेडिकल छुट्टी मिली थी। छुट्टी खत्म होने के बाद उसने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए छह महीने की अतिरिक्त छुट्टी मांगी।
हालांकि, विभाग ने उसकी अतिरिक्त छुट्टी की मांग स्वीकार नहीं की और उसे ड्यूटी पर लौटने या CRPF अस्पताल, नागपुर में इलाज कराने का निर्देश दिया।
CRPF Constable ने क्या दलील दी?
याचिकाकर्ता का कहना था कि उसकी तबीयत खराब थी और वह एनीमिया, नॉन-इक्टेरिक हेपेटाइटिस तथा एंटेरिक फीवर जैसी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहा था।
उसने मेडिकल दस्तावेजों के आधार पर छह महीने के बेड रेस्ट का दावा किया। उसका यह भी कहना था कि वह 7 जून 2017 को ड्यूटी ज्वाइन करने पहुंचा था, लेकिन उसे ज्वाइन नहीं करने दिया गया।
दूसरी ओर, विभाग का कहना था कि छुट्टी समाप्त होने के बाद वह ड्यूटी पर नहीं लौटा और बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद उसने अधिकारियों की बात नहीं मानी।
मेडिकल दस्तावेजों पर भी उठे सवाल
कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत मेडिकल दस्तावेजों को विभाग ने संदिग्ध माना था। इन दस्तावेजों में छह महीने के लगातार मेडिकल रेस्ट की सिफारिश की गई थी और इन्हें उसकी स्वीकृत छुट्टी के अंतिम दिन तैयार किया गया था।
विभाग ने उसे CRPF अस्पताल, नागपुर में इलाज कराने का निर्देश भी दिया था, लेकिन वह वहां भी रिपोर्ट नहीं हुआ।
कोर्ट के अनुसार, 15 मार्च 2017 से उसकी अनुपस्थिति को अनधिकृत माना गया। इसके बाद भी वह लंबे समय तक ड्यूटी पर नहीं लौटा।
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CRPF Constable को किया गया था Absconder घोषित
लगातार अनुपस्थिति और विभागीय निर्देशों का पालन नहीं करने के बाद उसे ‘absconder’ घोषित किया गया। उसके खिलाफ वारंट भी जारी किया गया।
इसके बावजूद उसने विभागीय कार्रवाई में सक्रिय रूप से भाग नहीं लिया। विभागीय जांच के दौरान उसे कई अवसर दिए गए, लेकिन वह कार्यवाही में शामिल नहीं हुआ।
आखिरकार जून 2018 में उसे सेवा से हटा दिया गया। इसके खिलाफ उसकी अपील 2019 में खारिज हुई और बाद में उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
कोर्ट ने सेवा से हटाने को क्यों सही माना?
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विवेक कुमार अग्रवाल ने तर्क दिया कि विभागीय जांच और सेवा से हटाने के आदेश में उसे उचित सुनवाई का अवसर नहीं मिला। उनका कहना था कि इससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ।
वहीं CRPF की ओर से केंद्र सरकार की अधिवक्ता अनमोल शर्मा ने कहा कि कर्मचारी को बार-बार ड्यूटी पर लौटने और विभागीय जांच में हिस्सा लेने का अवसर दिया गया था।
हाईकोर्ट ने विभाग की दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि उपलब्ध परिस्थितियों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं हुआ।
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CRPF Constable मामले में हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सशस्त्र और अनुशासित बल के सदस्य से ड्यूटी के प्रति गंभीर जिम्मेदारी की अपेक्षा होती है। ऐसे मामलों में अनावश्यक नरमी से बल के अनुशासन और कामकाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
कोर्ट ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता की लगातार अनुपस्थिति, अधिकारियों के निर्देशों की अनदेखी और विभागीय जांच में भाग नहीं लेना गंभीर आचरण था।
इसलिए सेवा से हटाने की कार्रवाई को कोर्ट ने न तो अत्यधिक और न ही असंगत माना।
CRPF Constable मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला अनुशासित सशस्त्र बलों में ड्यूटी और जवाबदेही की गंभीरता को रेखांकित करता है। कोर्ट ने साफ किया कि लंबे समय तक अनधिकृत अनुपस्थिति और वरिष्ठ अधिकारियों के वैध निर्देशों की अनदेखी को हल्के में नहीं लिया जा सकता। मामले की परिस्थितियों में सेवा से हटाने की कार्रवाई को हाईकोर्ट ने उचित और अनुपातिक माना है।
