Guru Dhal Das के कांग्रेस में शामिल होने के बाद छत्तीसगढ़ की राजनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है। कैबिनेट मंत्री और भाजपा नेता गुरु खुशवंत साहेब के बड़े भाई गुरु ढाल दास साहेब ने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता ग्रहण कर ली है।
गुरु ढाल दास सतनामी समाज के प्रमुख धर्मगुरु बालदास के सबसे बड़े बेटे हैं। उनके कांग्रेस में शामिल होने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भूपेश बघेल ने इस राजनीतिक घटनाक्रम पर खुशी जताई है।
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Guru Dhal Das को भूपेश बघेल ने दिलाई सदस्यता
पोला तिहार के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान गुरु ढाल दास साहेब कांग्रेस में शामिल हुए। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उन्हें कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता दिलाई।
गुरु ढाल दास के पार्टी में आने को कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। इसकी वजह उनका सतनामी समाज से जुड़ा सामाजिक प्रभाव और उनका राजनीतिक रूप से प्रभावशाली परिवार है।
भूपेश बघेल ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए भी इस फैसले का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि गुरु ढाल दास के कांग्रेस में शामिल होने से पार्टी को मजबूती मिलेगी और कांग्रेस अपने सिद्धांतों के साथ आगे बढ़ेगी।
उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा, “शुरुआत हो चुकी है… सब मिलकर BJP को हटाएंगे।”
Guru Dhal Das ने कांग्रेस में शामिल होने पर क्या कहा?
कांग्रेस में शामिल होने के बाद गुरु ढाल दास साहेब ने कहा कि स्वतंत्र भारत में सभी लोग आजाद हैं और उन्होंने अब कांग्रेस का रास्ता चुना है।
उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस में शामिल होने से पहले उन्होंने अपने भाई गुरु खुशवंत साहेब और पिता गुरु बालदास से इस संबंध में कोई बातचीत नहीं की।
उनके इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में परिवार के भीतर अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।
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एक भाई BJP में, दूसरा कांग्रेस में
गुरु ढाल दास के कांग्रेस में शामिल होने का सबसे चर्चित पहलू यह है कि उनके छोटे भाई गुरु खुशवंत साहेब छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं और भाजपा के प्रमुख नेताओं में शामिल हैं।
इस तरह एक ही प्रभावशाली धार्मिक-सामाजिक परिवार के दो सदस्य अब अलग-अलग राजनीतिक दलों में नजर आएंगे। गुरु खुशवंत साहेब भाजपा सरकार में मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, जबकि गुरु ढाल दास ने कांग्रेस की सदस्यता ले ली है।
यह स्थिति छत्तीसगढ़ की राजनीति में परिवार और राजनीति के संबंध को लेकर भी चर्चा का विषय बन गई है।
सतनामी समाज और छत्तीसगढ़ की राजनीति
छत्तीसगढ़ की राजनीति में सतनामी समाज का महत्वपूर्ण सामाजिक प्रभाव माना जाता है। सतनामी संप्रदाय की स्थापना गुरु घासीदास ने की थी और राज्य में इस समुदाय की बड़ी सामाजिक मौजूदगी है।
छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जाति के लिए विधानसभा की 9 सीटें आरक्षित हैं। हालांकि, सतनामी समाज का प्रभाव केवल आरक्षित सीटों तक सीमित नहीं माना जाता और विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में समुदाय के मतदाताओं की राजनीतिक भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
इसी सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण गुरु ढाल दास का कांग्रेस में जाना राजनीतिक रूप से चर्चा में है। कांग्रेस इसे अपने संगठन और सामाजिक आधार को मजबूत करने के अवसर के रूप में देख सकती है।
कांग्रेस के लिए क्यों अहम है यह घटनाक्रम?
छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन प्रमुख सामाजिक समूहों और प्रभावशाली नेताओं के राजनीतिक रुख को लेकर गतिविधियां पहले से तेज दिखाई दे रही हैं।
Guru Dhal Das का कांग्रेस में शामिल होना इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उनका संबंध ऐसे परिवार से है जिसकी सतनामी समाज में मजबूत पहचान है। इसके अलावा उनके भाई का भाजपा सरकार में मंत्री होना इस घटनाक्रम को और ज्यादा राजनीतिक महत्व देता है।
हालांकि, किसी नेता के पार्टी बदलने से चुनावी परिणाम पर सीधा प्रभाव पड़ेगा, ऐसा अभी कहना जल्दबाजी होगी। इसका वास्तविक राजनीतिक असर आगामी चुनावों और जमीनी स्तर पर संगठन की सक्रियता के दौरान ही स्पष्ट होगा।
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सियासी समीकरणों पर नजर
गुरु ढाल दास के कांग्रेस में आने के बाद भाजपा और कांग्रेस दोनों की नजर सतनामी समाज के राजनीतिक रुझानों पर रह सकती है।
एक तरफ कांग्रेस इसे अपने पक्ष में सामाजिक समर्थन बढ़ाने के संकेत के तौर पर पेश कर सकती है, वहीं भाजपा अपने संगठन और सरकार के कामकाज के जरिए अपने समर्थक आधार को मजबूत करने की कोशिश करेगी।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा ध्यान गुरु खुशवंत साहेब की राजनीतिक भूमिका और परिवार के दोनों सदस्यों के अलग-अलग दलों में होने पर रहेगा।
Guru Dhal Das का कांग्रेस में शामिल होना छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम के तौर पर सामने आया है। एक ओर उनके भाई गुरु खुशवंत साहेब भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं, वहीं गुरु ढाल दास ने कांग्रेस का हाथ थामा है। सतनामी समाज में परिवार की सामाजिक पहचान को देखते हुए इस कदम पर राजनीतिक नजरें टिकना स्वाभाविक है। हालांकि, इसका वास्तविक चुनावी असर समय के साथ ही सामने आएगा।
