SBI की ताजा रिसर्च रिपोर्ट ने देशभर के अस्थायी श्रमिकों की स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भारतीय स्टेट बैंक द्वारा जारी इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत के लगभग एक चौथाई अस्थायी श्रमिकों को कानूनी न्यूनतम वेतन से कम भुगतान किया जा रहा है।
यह रिपोर्ट पीरियडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) 2025 के आंकड़ों पर आधारित है। रिपोर्ट में कई राज्यों में न्यूनतम वेतन कानून के कमजोर क्रियान्वयन की तस्वीर सामने आई है। खासतौर पर छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड जैसे राज्यों की स्थिति बेहद चिंताजनक बताई गई है।
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SBI रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ की स्थिति सबसे खराब
SBI की रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ में लगभग 70 प्रतिशत अस्थायी श्रमिकों को सरकार द्वारा तय न्यूनतम वेतन से कम मजदूरी मिल रही है। यह आंकड़ा देश में सबसे अधिक है।
रिपोर्ट बताती है कि राज्य के लाखों मजदूर आर्थिक सुरक्षा के बिना काम कर रहे हैं। न्यूनतम वेतन कानून होने के बावजूद बड़ी संख्या में श्रमिकों को उसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।
इसके बाद ओडिशा में 66 प्रतिशत और झारखंड में 65 प्रतिशत अस्थायी श्रमिकों को कम वेतन मिलने की बात सामने आई है।
मजदूरों के लिए बड़ा खतरा
कम वेतन मिलने का सीधा असर मजदूरों की जीवनशैली, स्वास्थ्य और बच्चों की शिक्षा पर पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राज्यों ने जल्द सख्त कदम नहीं उठाए तो असंगठित क्षेत्र में आर्थिक असमानता और बढ़ सकती है।
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महिला श्रमिकों पर ज्यादा असर
SBI रिपोर्ट में महिला श्रमिकों की स्थिति को भी गंभीर बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक कुल अस्थायी कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 25 प्रतिशत है, लेकिन कम वेतन पाने वाले श्रमिकों में उनकी हिस्सेदारी 45 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
इससे साफ होता है कि महिलाओं को पुरुषों की तुलना में अधिक आर्थिक भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीण और असंगठित क्षेत्रों में यह समस्या और अधिक गंभीर है।
महिलाओं की आय पर असर
कम वेतन मिलने के कारण महिला श्रमिक परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में संघर्ष कर रही हैं। इससे बच्चों की शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं पर भी नकारात्मक असर पड़ रहा है।
SBI रिपोर्ट में सामने आए अहम आंकड़े
रिपोर्ट के अनुसार देश के करीब 25 प्रतिशत अस्थायी श्रमिक कानूनी रूप से निर्धारित न्यूनतम वेतन से कम कमा रहे हैं।
यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि श्रम कानून सबसे कमजोर वर्ग तक सही तरीके से नहीं पहुंच पा रहे हैं। कई राज्यों में कानून तो मौजूद हैं, लेकिन उनका पालन कराने की व्यवस्था कमजोर बनी हुई है।
महाराष्ट्र और बंगाल भी पीछे
आर्थिक रूप से मजबूत माने जाने वाले महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी स्थिति संतोषजनक नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक इन राज्यों में लगभग एक-तिहाई अस्थायी श्रमिकों को तय न्यूनतम वेतन से कम भुगतान मिल रहा है।
पंजाब में करीब 37.19 प्रतिशत अस्थायी श्रमिक न्यूनतम वेतन के स्तर से नीचे कमाई कर रहे हैं।
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किन राज्यों में बेहतर है वेतन अनुपालन
जहां कई राज्यों में न्यूनतम वेतन कानून का उल्लंघन देखने को मिला, वहीं कुछ राज्यों ने बेहतर प्रदर्शन भी किया है।
तमिलनाडु में केवल 4.58 प्रतिशत श्रमिकों को न्यूनतम वेतन से कम भुगतान मिला। तेलंगाना में यह आंकड़ा सिर्फ 0.36 प्रतिशत रहा।
सबसे बड़ी बात यह है कि आंध्र प्रदेश में इस श्रेणी में कोई उल्लंघन दर्ज नहीं किया गया। इससे साफ है कि सख्त निगरानी और बेहतर प्रशासन से श्रमिकों को कानूनी अधिकार दिलाए जा सकते हैं।
राज्यों के बीच बड़ा अंतर
SBI रिपोर्ट बताती है कि अलग-अलग राज्यों में श्रम कानूनों के पालन में भारी असमानता है। कुछ राज्य प्रभावी मॉनिटरिंग और सख्त कार्रवाई के जरिए बेहतर परिणाम दे रहे हैं, जबकि कई राज्यों में मजदूर अब भी शोषण का शिकार हैं।
श्रम कानून लागू करने की मांग तेज
रिपोर्ट सामने आने के बाद श्रमिक संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने न्यूनतम वेतन अधिनियम को सख्ती से लागू करने की मांग तेज कर दी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य सरकारों को नियमित निरीक्षण, डिजिटल भुगतान व्यवस्था और शिकायत निवारण प्रणाली को मजबूत करना होगा। इससे मजदूरों को समय पर सही वेतन मिल सकेगा।
क्या कहती है रिपोर्ट?
रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि न्यूनतम वेतन कानून केवल कागजों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जब तक स्थानीय स्तर पर सख्त निगरानी नहीं होगी, तब तक श्रमिकों का आर्थिक शोषण जारी रहेगा।
SBI की यह रिपोर्ट देश के असंगठित श्रमिकों की वास्तविक स्थिति को सामने लाती है। खासकर छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में न्यूनतम वेतन कानून का कमजोर क्रियान्वयन गंभीर चिंता का विषय है।
यदि राज्य सरकारें समय रहते सख्त कदम नहीं उठाती हैं, तो लाखों श्रमिकों का आर्थिक भविष्य खतरे में पड़ सकता है। महिलाओं और अस्थायी मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा और उचित वेतन दिलाना अब सरकारों की सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।
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