Chhattisgarh Liquor Scam मामले में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के पूर्व आबकारी आयुक्त निरंजन दास को बड़ी राहत देते हुए जमानत दे दी। अदालत ने शराब नीति घोटाले से जुड़े मुख्य केस और मनी लॉन्ड्रिंग मामले दोनों में उन्हें बेल प्रदान की है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पांचोली की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि मामले के कई सह-आरोपी पहले से जमानत पर हैं और ट्रायल पूरा होने में लंबा समय लग सकता है।
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सुप्रीम कोर्ट से निरंजन दास को राहत
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि समान परिस्थितियों में अन्य आरोपितों को पहले ही जमानत मिल चुकी है। ऐसे में निरंजन दास को भी समान शर्तों के आधार पर राहत दी जा सकती है।
कोर्ट ने यह भी माना कि मुकदमे की प्रक्रिया लंबी चलेगी और आरोप तय होने के बाद सुनवाई पूरी होने में काफी समय लग सकता है।
निरंजन दास को सितंबर 2025 और दिसंबर 2025 में क्रमशः मुख्य मामले और मनी लॉन्ड्रिंग केस में गिरफ्तार किया गया था।
क्या है Chhattisgarh Liquor Scam
Chhattisgarh Liquor Scam राज्य के सबसे चर्चित आर्थिक और राजनीतिक मामलों में से एक बन चुका है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) के अनुसार यह कथित घोटाला 2019 से 2023 के बीच हुआ।
जांच एजेंसियों का आरोप है कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में शराब नीति के जरिए सरकारी दुकानों में अवैध शराब सप्लाई और कमीशन वसूली का नेटवर्क तैयार किया गया।
ईडी का दावा है कि इस पूरे मामले से सरकारी खजाने को करीब 2,883 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
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2883 करोड़ घोटाले का पूरा मामला
जांच एजेंसियों के मुताबिक शराब नीति में कथित बदलाव कर कुछ कारोबारियों और सिंडिकेट को फायदा पहुंचाया गया।
आरोप है कि सरकारी दुकानों में अवैध शराब बेची गई और उससे करोड़ों रुपये की अवैध कमाई की गई। जांच में राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर मिलीभगत की बात भी सामने आई है।
ईडी ने कोर्ट में कहा कि इस पूरे नेटवर्क के जरिए बड़े स्तर पर मनी लॉन्ड्रिंग की गई।
ED और EOW की जांच में क्या सामने आया
Chhattisgarh Liquor Scam की जांच दो एजेंसियां कर रही हैं। राज्य की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) आपराधिक पहलुओं की जांच कर रही है, जबकि ईडी मनी लॉन्ड्रिंग एंगल की जांच में जुटी हुई है।
जांच एजेंसियों ने निरंजन दास को इस कथित घोटाले का प्रमुख सूत्रधार बताया है। उन पर आरोप है कि उन्होंने शराब नीति तैयार करने में ऐसी भूमिका निभाई जिससे सह-आरोपियों को आर्थिक लाभ पहुंचा।
हालांकि बचाव पक्ष लगातार इन आरोपों को खारिज करता रहा है।
सह-आरोपियों को पहले ही मिल चुकी है जमानत
इस मामले में कई अन्य आरोपियों को पहले ही राहत मिल चुकी है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पूर्व उप सचिव सौम्या चौरसिया को भी जमानत दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इसी पहलू को महत्वपूर्ण माना और कहा कि समानता के सिद्धांत के तहत निरंजन दास को भी राहत दी जा सकती है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला आने वाले दिनों में अन्य आरोपियों के मामलों को भी प्रभावित कर सकता है।
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सुप्रीम कोर्ट ने क्या शर्तें लगाईं
कोर्ट ने जमानत देते समय कुछ अहम शर्तें भी लगाई हैं। आदेश के अनुसार निरंजन दास को छत्तीसगढ़ राज्य से बाहर रहना होगा।
वे केवल अदालत में पेशी या जांच में शामिल होने के लिए ही राज्य में प्रवेश कर सकेंगे।
हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि बाद में वे शर्तों में ढील की मांग कर सकते हैं।
Chhattisgarh Liquor Scam में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज
Chhattisgarh Liquor Scam को लेकर राज्य की राजनीति भी गर्म हो गई है। विपक्ष लगातार पूर्व कांग्रेस सरकार पर निशाना साधता रहा है।
दूसरी ओर कांग्रेस ने जांच एजेंसियों की कार्रवाई को राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित बताया है।
इस मामले ने छत्तीसगढ़ की राजनीति में बड़ा असर डाला है और आने वाले समय में यह मुद्दा फिर प्रमुखता से उठ सकता है।
कानूनी विशेषज्ञ क्या कहते हैं
कानूनी जानकारों के अनुसार जमानत मिलने का अर्थ यह नहीं है कि आरोपी दोषमुक्त हो गया है। यह केवल ट्रायल के दौरान अस्थायी राहत होती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अदालतें आमतौर पर लंबी सुनवाई, सह-आरोपियों की स्थिति और आरोपी के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए जमानत पर फैसला करती हैं।
Chhattisgarh Liquor Scam का प्रदेश पर प्रभाव
इस कथित घोटाले ने राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था और आबकारी नीति को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं।
विपक्ष इसे प्रदेश के सबसे बड़े आर्थिक घोटालों में से एक बता रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि जांच निष्पक्ष तरीके से आगे बढ़ रही है।
जनता के बीच भी यह मामला लगातार चर्चा में बना हुआ है।
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Chhattisgarh Liquor Scam मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व आबकारी आयुक्त निरंजन दास को जमानत दिए जाने से केस ने नया मोड़ ले लिया है। अदालत ने सह-आरोपियों को पहले मिली राहत और लंबी ट्रायल प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए यह फैसला सुनाया।
हालांकि 2,883 करोड़ रुपये के कथित घोटाले की जांच अभी जारी है और आने वाले समय में इस मामले में कई बड़े खुलासे हो सकते हैं। पूरे प्रदेश की नजर अब आगे की कानूनी प्रक्रिया पर टिकी हुई है।
