Durg Chaturmas के दौरान जय आनंद मधुकर रतन भवन, बांधा तालाब, दुर्ग में आयोजित धर्मसभा में संयम, त्याग और इच्छाओं पर नियंत्रण का संदेश दिया गया। राष्ट्रसंत डॉ. मणिभद्र मुनि जी महाराज ने कहा कि मनुष्य के जीवन का अंतिम और सर्वोच्च ध्येय मोक्ष है और मोक्ष ही जीवन की अंतिम मंजिल है।
उन्होंने कहा कि मोक्ष की प्राप्ति का सर्वोत्तम मार्ग महाव्रत है, लेकिन यह अत्यंत कठिन और दुष्कर साधना है। इसके लिए पूर्ण त्याग और संयम जरूरी है, जो हर व्यक्ति के लिए संभव नहीं होता। इसी कारण भगवान महावीर ने श्रावक-श्राविकाओं के लिए अपेक्षाकृत सरल मार्ग के रूप में 12 व्रतों का विधान बताया।
इनमें पांच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत शामिल हैं।
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Durg Chaturmas में दिग्व्रत का विशेष महत्व
धर्मसभा को संबोधित करते हुए राष्ट्रसंत डॉ. मणिभद्र मुनि ने अणुव्रतों में दिग्व्रत के विशेष महत्व को समझाया। उन्होंने कहा कि इसका मूल उद्देश्य मनुष्य की गतिविधियों और इच्छाओं की असीमित सीमा को नियंत्रित करना है।
उनके अनुसार, प्राचीन समय में विज्ञान आज की तरह विकसित नहीं था। इसलिए लोगों की जरूरतें और सुविधाएं भी अपेक्षाकृत सीमित थीं। वर्तमान समय में विज्ञान ने जीवन को आसान बनाने के लिए अनेक साधन उपलब्ध कराए हैं।
लेकिन सुविधाओं के विस्तार के साथ मनुष्य की इच्छाएं भी लगातार बढ़ रही हैं। जरूरत और लालच के बीच की सीमा कमजोर होने पर यही असीमित इच्छाएं जीवन में परेशानी का कारण बन सकती हैं।
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Durg Chaturmas का संदेश: सुविधा बढ़े तो संयम भी बढ़े
मुनि जी ने कहा कि केवल सुविधाओं का बढ़ना जीवन में सुख की गारंटी नहीं है। यदि सुविधाओं के साथ संयम नहीं बढ़ा, तो सुख देने वाले साधन भी दुख का कारण बन सकते हैं।
उन्होंने दिग्व्रत के माध्यम से सीमाओं में रहने और इच्छाओं को नियंत्रित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। धर्मसभा में मौजूद श्रद्धालुओं ने इस संदेश को आत्मसंयम और संतुलित जीवन से जोड़कर समझा।
Durg Chaturmas में भाव और भविष्य का संदेश
धर्मसभा को श्री पुनीत मुनि जी महाराज और साध्वी डॉक्टर सृजना श्री जी ने भी संबोधित किया। उन्होंने कहा कि मनुष्य के भावों का प्रभाव उसके जीवन पर पड़ता है।
उन्होंने संदेश दिया कि जैसा भाव होगा, वैसा ही प्रभाव प्राप्त होगा और जैसा स्वभाव होगा, वैसा ही भविष्य बनेगा। इसलिए जीवन में सकारात्मक सोच और अच्छे भाव बनाए रखना आवश्यक है।
उन्होंने नदी का उदाहरण देते हुए कहा कि लगातार बहते रहने से नदी की पवित्रता और निर्मलता बनी रहती है। इसके विपरीत स्थिर जल में समय के साथ गंदगी जमा होने लगती है।
इसी तरह मनुष्य को भी विचारों, भावनाओं और जीवनशैली में निरंतर शुद्धता और सकारात्मकता बनाए रखनी चाहिए।
दुर्ग में त्याग और तपस्या की श्रृंखला
Durg Chaturmas के दौरान जय आनंद मधुकर रतन भवन में त्याग और तपस्या की श्रृंखला जारी है। अनेक श्रावक-श्राविकाएं गुप्त रूप से तपस्या करते हुए धर्म आराधना में लीन हैं।
श्री टीकाराम जी, श्रीमती मंजू संचेती, श्रीमती खुशबू बाधमार, ऋषिका संचेती और कविता श्रीश्रीमाल सहित अनेक श्रद्धालु तपस्या कर रहे हैं। उनकी साधना धार्मिक समाज के लिए प्रेरणा का विषय बनी हुई है।
चातुर्मास में होने वाली ऐसी धार्मिक गतिविधियां श्रद्धालुओं को संयम, आत्मअनुशासन और आध्यात्मिक साधना की ओर प्रेरित कर रही हैं।
नवकार महामंत्र जप में शामिल हो रहे श्रद्धालु
चातुर्मास शुरू होने के बाद से प्रतिदिन दोपहर 2 बजे से 3 बजे तक नवकार महामंत्र जप अनुष्ठान किया जा रहा है। इसमें सैकड़ों श्रद्धालु भाग ले रहे हैं।
आज का नवकार महामंत्र जप श्रीमती प्रेमीबाई, रमेश जी, प्रकाश जी और निर्मल जी झाबक परिवार की ओर से आयोजित किया गया। वहीं अगले दिन का जाप श्रीमती स्वरूप देवी और जितेंद्र जी नाहर परिवार की ओर से आयोजित किया जा रहा है।
कार्यक्रम का कुशल संचालन मंत्री राकेश संचेती ने किया।
देशभर से दुर्ग पहुंच रहे गुरु भक्त
चातुर्मास के दौरान देश के अलग-अलग शहरों से श्रद्धालु गुरु दर्शन और धर्मलाभ के लिए दुर्ग पहुंच रहे हैं। इससे धार्मिक आयोजन में श्रद्धालुओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है।
बाहर से आने वाले गुरु भक्तों के लिए जय आनंद मधुकर रतन भवन, बांधा तालाब, दुर्ग में आवास और भोजन सहित अतिथि सत्कार की व्यवस्था की गई है।
श्रद्धालुओं के स्वागत और सेवा-सत्कार का संयोजन लगातार किया जा रहा है। चातुर्मास के धार्मिक आयोजनों के साथ यह सेवा गतिविधि भी आयोजन की विशेषता बनी हुई है।
Durg Chaturmas में आयोजित धर्मसभा ने आधुनिक जीवन में संयम, त्याग और इच्छाओं पर नियंत्रण का महत्वपूर्ण संदेश दिया। राष्ट्रसंत डॉ. मणिभद्र मुनि ने दिग्व्रत के माध्यम से सीमित इच्छाओं और संतुलित जीवन का महत्व समझाया। वहीं पुनीत मुनि जी और साध्वी डॉक्टर सृजना श्री जी ने सकारात्मक भाव और निरंतर आत्मशुद्धि पर जोर दिया। दुर्ग में चल रही तपस्या, नवकार महामंत्र जप और देशभर से पहुंच रहे श्रद्धालुओं की मौजूदगी चातुर्मास की आध्यात्मिक गतिविधियों को विशेष बना रही है।
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