Jagdalpur में भारी विरोध: धर्म स्वातंत्र्य बिल के खिलाफ 5 बड़े आरोप

Jagdalpur, जो बस्तर जिले का मुख्यालय है, 13 अप्रैल 2026 को एक ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन का गवाह बना। छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 के खिलाफ 30,000 से अधिक लोग यहाँ सड़कों पर उतरे।

बस्तर संभाग के सात जिलों से आए ईसाई आदिवासियों ने शांतिपूर्ण मार्च किया और इस कानून को तत्काल वापस लेने की माँग की। प्रदर्शनकारियों ने इसे “काला कानून” बताते हुए कहा कि यह धार्मिक अल्पसंख्यकों को परेशान करने का हथियार बन गया है।


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क्या है छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026?

छत्तीसगढ़ विधानसभा ने 19 मार्च 2026 को छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 को ध्वनिमत से पारित किया। यह विधेयक धोखाधड़ी, जबरदस्ती, लालच, विवाह या डिजिटल माध्यमों से किए जाने वाले धार्मिक धर्मांतरण पर प्रतिबंध लगाना चाहता है।

नया विधेयक छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम 1968 की जगह लेता है और “सामूहिक धर्मांतरण” के लिए 10 साल से लेकर आजीवन कारावास और न्यूनतम 25 लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान करता है।

विपक्ष ने इस विधेयक को “जल्दबाजी” में लाया गया बताया। विपक्ष के नेता चरण दास महंत ने कहा कि इसी तरह के कानून कई राज्यों में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन हैं और राज्य को न्यायिक फैसले का इंतज़ार करना चाहिए था।


Jagdalpur मार्च — कैसे हुआ आयोजन?

Jagdalpur में यह विशाल प्रदर्शन ईसाई एकता मंच (Esai Ekta Manch), बस्तर डिवीज़न ने आयोजित किया, जिसे विभिन्न मानवाधिकार संगठनों और कुछ राजनीतिक दलों का समर्थन मिला।

कार्यक्रम में पहले एक सार्वजनिक सभा हुई, उसके बाद शहर में एक मार्च निकाला गया। मार्च के अंत में बस्तर संभाग के संभागीय आयुक्त को एक ज्ञापन सौंपा गया, जो राज्यपाल, मुख्यमंत्री और गृहमंत्री के नाम था।

बस्तर संभाग के सात ज़िलों से आए हज़ारों आदिवासी ईसाइयों ने Jagdalpur की सड़कों पर एकजुट होकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया, जो इस क्षेत्र के इतिहास में अभूतपूर्व था।


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विधेयक पर संवैधानिक आपत्तियाँ

Jagdalpur की सभा में ईसाई एकता मंच के नेताओं ने विधेयक पर कई गंभीर संवैधानिक आपत्तियाँ उठाईं।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह विधेयक भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) और अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता) का सीधा उल्लंघन करता है।

प्रोग्रेसिव क्रिश्चियन अलायंस (PCA) ने इस विधेयक को “असंवैधानिक और अल्पसंख्यकों को परेशान करने के लिए बनाया गया भेदभावपूर्ण कानून” बताया।

PCA ने कहा, “यह विधेयक धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के बारे में नहीं है, बल्कि यह अल्पसंख्यक धर्मों — विशेषकर ईसाई धर्म — की वैध अभिव्यक्ति को व्यवस्थित रूप से प्रतिबंधित और आपराधिक बनाने के बारे में है।”

विधेयक में “लालच” और “अनुचित प्रभाव” जैसे शब्दों की अस्पष्ट परिभाषाएँ दी गई हैं, जिनका दुरुपयोग अल्पसंख्यकों के खिलाफ किया जा सकता है। धर्म परिवर्तन से 60 दिन पहले प्रशासन को सूचना देने की अनिवार्यता को निजता का उल्लंघन बताया गया है।


Jagdalpur और बस्तर में ईसाइयों पर अत्याचार की पृष्ठभूमि

Jagdalpur और पूरा बस्तर संभाग छत्तीसगढ़ में ईसाई उत्पीड़न की घटनाओं का केंद्र रहा है। छत्तीसगढ़ देश में ईसाइयों के खिलाफ हिंसा के मामले में दूसरे स्थान पर है।

अगस्त 2025 में भी Jagdalpur में एक विशाल विरोध प्रदर्शन हुआ था, जब बस्तर के ईसाई समुदाय ने एक आदिवासी ईसाई की कब्र को जबरन खोदने और एक स्थानीय चर्च की तोड़फोड़ के खिलाफ प्रदर्शन किया था।

प्रदर्शनकारियों ने Jagdalpur के मेला भाटा मैदान में एकत्रित होकर कलेक्टोरेट की ओर मार्च किया था, लेकिन पुलिस बैरिकेड ने उन्हें रोक लिया।

बस्तर में ईसाई आदिवासियों को गाँवों में दफनाने के अधिकार से वंचित किए जाने, सामाजिक बहिष्कार और शारीरिक हमलों जैसी घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं।


ज्ञापन में उठाई गई प्रमुख माँगें

Jagdalpur से बस्तर संभागीय आयुक्त को सौंपे गए ज्ञापन में कई ठोस माँगें रखी गईं:

1. विधेयक की वापसी: छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 को तत्काल रद्द किया जाए।

2. संवैधानिक अधिकारों की रक्षा: धर्म का पालन करने, उसे मानने और प्रचार करने के अधिकार की गारंटी दी जाए।

3. दफनाने के अधिकार: ईसाई आदिवासियों को गाँवों में अपने मृतकों को दफनाने का अधिकार सुनिश्चित किया जाए।

4. हिंसा पर रोक: आदिवासी ईसाइयों के खिलाफ सामाजिक बहिष्कार और हिंसा को रोका जाए।

5. न्यायिक समीक्षा: इस विधेयक को सुप्रीम कोर्ट की समीक्षा के लिए भेजा जाए।


छत्तीसगढ़ में अन्य विरोध प्रदर्शन

Jagdalpur का प्रदर्शन छत्तीसगढ़ में हो रहे विरोध की एक कड़ी मात्र है।

22 मार्च 2026 को रायपुर में एक मशाल जुलूस निकाला गया, जहाँ प्रदर्शनकारियों ने इस कानून को “काला कानून” बताया।

28 मार्च 2026 को नेशनल क्रिश्चियन फ्रंट, भारत मुक्ति मोर्चा और आदिवासी एकता परिषद के बैनर तले राज्य के सभी जिलों में रेलवे स्टेशन या निर्धारित स्थानों से कलेक्टोरेट तक मार्च आयोजित किए गए।

सूरजपुर और अन्य शहरों में भी ईसाई एकता मंच, भारत मुक्ति मोर्चा, राष्ट्रीय आदिवासी एकता परिषद और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग मोर्चा के बैनर तले प्रदर्शन हुए।


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सरकार का पक्ष — क्यों लाया गया यह कानून?

छत्तीसगढ़ सरकार का कहना है कि यह कानून संवेदनशील आदिवासी क्षेत्रों में धोखाधड़ी या जबरदस्ती से होने वाले धर्मांतरण को रोकने के लिए ज़रूरी है।

उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने विधानसभा में जवाब देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी विधायी कार्रवाइयों पर कोई रोक नहीं लगाई है और राज्य सरकार अवैध धर्मांतरण को रोकने के लिए कानून बनाने में सक्षम है।

नए विधेयक के तहत धोखाधड़ी, जबरदस्ती या डिजिटल माध्यमों से धर्म परिवर्तन कराने की कोशिश एक संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध होगी।

हालांकि विपक्ष और नागरिक समाज दोनों का कहना है कि इस कानून का दुरुपयोग मनमाने ढंग से किसी के खिलाफ भी किया जा सकता है।


Jagdalpur में 30,000 से अधिक लोगों का यह विशाल विरोध प्रदर्शन बस्तर और पूरे छत्तीसगढ़ में धार्मिक अल्पसंख्यकों की बढ़ती बेचैनी को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 को लेकर संवैधानिक सवाल और ज़मीनी डर दोनों गहरे हैं। Jagdalpur से उठी यह आवाज़ अब पूरे राज्य में गूंज रही है। इस मुद्दे का समाधान संवाद और संवैधानिक मूल्यों के सम्मान से ही संभव है, ताकि बस्तर के आदिवासी समाज में शांति और सामाजिक सद्भाव बना रहे।

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