Lok Sabha Speaker को लेकर संसद के बजट सत्र में बड़ा राजनीतिक टकराव देखने को मिल सकता है। लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया है। यह प्रस्ताव कांग्रेस के तीन सांसदों ने दिया और इसे 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन मिला। हालांकि शुरुआत में तृणमूल कांग्रेस ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए थे, लेकिन अब पार्टी ने भी विपक्ष का साथ देने का फैसला किया है। बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत के साथ ही इस प्रस्ताव पर बहस होने की संभावना है, जिससे संसद में माहौल गरम रहने वाला है।
Lok Sabha Speaker के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव क्यों
Lok Sabha Speaker के खिलाफ विपक्ष ने गंभीर आरोप लगाए हैं। विपक्ष का कहना है कि अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन की कार्यवाही में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया है।
कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद, कोडिकुन्निल सुरेश और मल्लू रवि ने इस प्रस्ताव का नोटिस दिया था। इसे 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन मिला। नोटिस में कहा गया कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं को कई बार सदन में बोलने का अवसर नहीं दिया गया।
इसके अलावा विपक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि आठ विपक्षी सांसदों को पूरे बजट सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया। साथ ही महिला सांसदों के खिलाफ भी निराधार आरोप लगाए गए।
संसदीय नियमों के अनुसार किसी भी अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए कम से कम दो सांसदों के हस्ताक्षर और 14 दिन का नोटिस जरूरी होता है। इसके अलावा सदन में कम से कम 50 सांसदों का समर्थन भी होना चाहिए।
यदि प्रस्ताव स्वीकार होता है तो लोकसभा में इस पर विस्तृत बहस होगी। नियम के अनुसार उस दौरान अध्यक्ष अपनी कुर्सी पर नहीं बैठते। ऐसी स्थिति में कार्यवाही का संचालन वरिष्ठ सांसद करते हैं।
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पहले भी आए हैं ऐसे प्रस्ताव
Lok Sabha Speaker के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव संसद के इतिहास में पहले भी कई बार लाया जा चुका है।
साल 1954 में पहली बार लोकसभा अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर के खिलाफ ऐसा प्रस्ताव लाया गया था। उस समय विपक्ष का नेतृत्व जेबी कृपलानी कर रहे थे। हालांकि वह प्रस्ताव मतदान में हार गया था।
इसके बाद 1966 में मधु लिमये ने तत्कालीन अध्यक्ष हुकुम सिंह के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया था। लेकिन पर्याप्त समर्थन न मिलने के कारण वह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया गया।
इसी तरह 1987 में सीपीएम नेता सोमनाथ चटर्जी ने तत्कालीन अध्यक्ष बलराम जाखड़ के खिलाफ प्रस्ताव दिया था। वह भी मतदान में हार गया था।
हाल ही में दिसंबर 2024 में राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के खिलाफ भी विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया था, लेकिन उसे स्वीकार नहीं किया गया।
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Key Facts
Lok Sabha Speaker विवाद की बड़ी बातें
- अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ 118 सांसदों ने अविश्वास प्रस्ताव दिया
- कांग्रेस के तीन सांसदों ने नोटिस दाखिल किया
- प्रस्ताव के लिए 14 दिन का नोटिस जरूरी होता है
- अध्यक्ष को हटाने के लिए 272 सांसदों का समर्थन चाहिए
- एनडीए के पास लोकसभा में 293 सांसदों का समर्थन
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
Lok Sabha Speaker के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भले ही संख्या के लिहाज से कमजोर दिख रहा हो, लेकिन इससे संसद में तीखी बहस होने की संभावना है।
वर्तमान लोकसभा में एनडीए के पास स्पष्ट बहुमत है। भाजपा के 240 सांसद हैं, जबकि जेडीयू के 16 और टीडीपी के 12 सांसद सरकार का समर्थन कर रहे हैं। इसके साथ अन्य सहयोगी दल भी एनडीए के साथ हैं।
दूसरी ओर विपक्ष के पास कुल 238 सांसद हैं। इनमें कांग्रेस के 99 सांसद शामिल हैं। समाजवादी पार्टी, डीएमके और तृणमूल कांग्रेस भी विपक्ष के साथ हैं।
संख्या बल को देखते हुए यह प्रस्ताव पारित होना मुश्किल माना जा रहा है। फिर भी विपक्ष इसे लोकतांत्रिक विरोध और राजनीतिक संदेश के रूप में देख रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस बहस के दौरान संसद में सरकार और विपक्ष के बीच तीखा राजनीतिक संघर्ष देखने को मिल सकता है।
Lok Sabha Speaker के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव संसद की राजनीति को गर्माने वाला मुद्दा बन गया है। भले ही विपक्ष के पास संख्या कम हो, लेकिन यह बहस लोकतांत्रिक व्यवस्था में जवाबदेही की एक अहम प्रक्रिया है। आने वाले दिनों में संसद में होने वाली चर्चा यह तय करेगी कि राजनीतिक माहौल किस दिशा में जाएगा। फिलहाल साफ है कि Lok Sabha Speaker का यह मुद्दा बजट सत्र का सबसे बड़ा राजनीतिक केंद्र बन सकता है।
