Udanti Sitanadi Tiger Reserve में एक चार वर्षीय बाघिन की मौजूदगी ने छत्तीसगढ़ के वन विभाग और वन्यजीव प्रेमियों के बीच नई उम्मीद जगा दी है। जनवरी 2026 में रिजर्व में पहुंची यह बाघिन भीषण गर्मी के महीनों में भी यहीं बनी रही, जिसे विशेषज्ञ सकारात्मक संकेत मान रहे हैं।
वन अधिकारियों का मानना है कि यदि कोई बाघिन गर्मियों के दौरान भी किसी क्षेत्र में रहना पसंद करती है, तो इसका अर्थ है कि वहां पानी, शिकार और सुरक्षित आवास जैसी मूलभूत आवश्यकताएं उपलब्ध हैं। यही वजह है कि Udanti Sitanadi Tiger Reserve एक बार फिर बाघों की स्थायी आबादी के लिए उपयुक्त साबित हो सकता है।
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Udanti Sitanadi Tiger Reserve के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह बाघिन
वन विभाग ने इस बाघिन का नाम ‘पहेली’ रखा है। इसका कारण यह है कि यह बाघिन भारत के आधिकारिक टाइगर डेटाबेस में दर्ज किसी भी बाघ से मेल नहीं खाती।
वन अधिकारियों के अनुसार बाघिन ने न केवल गर्मी का मौसम यहीं बिताया बल्कि हाथियों के झुंडों के साथ क्षेत्रीय संघर्षों का भी सामना किया। इसके बावजूद उसका रिजर्व में बने रहना संकेत देता है कि यह क्षेत्र उसके लिए अनुकूल है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह बाघिन यहां स्थायी रूप से बसती है और प्रजनन करती है, तो Udanti Sitanadi Tiger Reserve में बाघों की वापसी का नया अध्याय शुरू हो सकता है।
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बाघों की घटती संख्या का दर्दनाक इतिहास
कभी 18 बाघों का घर था यह रिजर्व
वर्ष 1998 में तत्कालीन उदंती वन्यजीव अभयारण्य में 18 बाघ मौजूद थे। लेकिन लगातार शिकार, आवास क्षरण और अन्य कारणों से 2006 तक उनकी संख्या घटकर केवल तीन रह गई।
इसी अवधि में छत्तीसगढ़ के राज्य पशु वन भैंसे की संख्या भी लगभग 80 से घटकर सिर्फ सात रह गई। वर्तमान में रिजर्व में केवल एक जंगली भैंसा बचा है।
अन्य वन्यजीवों की संख्या में भी गिरावट
केवल बाघ ही नहीं, बल्कि तेंदुआ, गौर, सांभर, नीलगाय, चीतल और जंगली सूअर जैसे वन्यजीवों की संख्या में भी वर्षों के दौरान भारी गिरावट दर्ज की गई।
वर्ष 2009 में उदंती और सीतानदी अभयारण्यों को मिलाकर 1,842.54 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में Udanti Sitanadi Tiger Reserve का गठन किया गया था। इसके बाद कुछ समय के लिए बाघों की संख्या बढ़कर आठ हुई, लेकिन 2023 तक यहां कोई स्थायी बाघ नहीं बचा।
रहस्यमयी बाघिन ‘पहेली’ ने बढ़ाई उम्मीद
अचनाकमार की ‘झुमरी’ जैसा बन सकता है उदाहरण
वन अधिकारियों को उम्मीद है कि यह बाघिन अचनाकमार टाइगर रिजर्व की प्रसिद्ध बाघिन ‘झुमरी’ की तरह साबित हो सकती है।
झुमरी ने अचनाकमार में बाघों की संख्या बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उसके आगमन और प्रजनन से वहां बाघों की आबादी में सुधार हुआ था।
अब Udanti Sitanadi Tiger Reserve में भी ऐसी ही उम्मीदें दिखाई दे रही हैं।
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Udanti Sitanadi Tiger Reserve में चल रहे संरक्षण कार्य
हाईटेक निगरानी व्यवस्था
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के उप संचालक वरुण जैन के अनुसार बाघिन की निगरानी के लिए नियमित फुट पेट्रोलिंग, कैमरा ट्रैप और थर्मल ड्रोन का उपयोग किया जा रहा है।
वन विभाग बाघिन को रेडियो कॉलर लगाने की भी योजना बना रहा है ताकि यदि वह ओडिशा या छत्तीसगढ़ के अन्य क्षेत्रों में जाए तो उसकी गतिविधियों पर नजर रखी जा सके।
घास के मैदान और जल स्रोत विकसित
रिजर्व में 500 हेक्टेयर से अधिक घास के मैदान विकसित किए जा रहे हैं। साथ ही वन्यजीवों के लिए नए जल स्रोत तैयार किए जा रहे हैं।
पिछले तीन से चार वर्षों में कोर और बफर क्षेत्र से लगभग 956 हेक्टेयर अतिक्रमित भूमि को मुक्त कराया गया है। यह कार्य 100 से अधिक गांवों की मौजूदगी के बावजूद पूरा किया गया।
बाघ और वन भैंसा संरक्षण की नई योजना
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) से मंजूरी मिलने के बाद मध्य प्रदेश से एक नर और दो मादा बाघों को Udanti Sitanadi Tiger Reserve में लाने की तैयारी चल रही है।
वन विभाग शिकार प्रजातियों की संख्या बढ़ाने पर विशेष ध्यान दे रहा है, क्योंकि NTCA ने इसे बाघ पुनर्वास के लिए महत्वपूर्ण शर्त बताया है।
इसके साथ ही वन भैंसों की आबादी बढ़ाने के प्रयास भी तेज किए गए हैं। असम से लाई गई तीन मादा जंगली भैंसों को जल्द ही रिजर्व में छोड़ा जाएगा।
Udanti Sitanadi Tiger Reserve के लिए बाघिन ‘पहेली’ का आगमन किसी नई शुरुआत से कम नहीं है। पिछले तीन दशकों में बाघों और अन्य वन्यजीवों की संख्या में भारी गिरावट देखने वाले इस रिजर्व के लिए यह एक सकारात्मक संकेत है। यदि संरक्षण प्रयास सफल रहते हैं और बाघिन यहां स्थायी रूप से बसती है, तो Udanti Sitanadi Tiger Reserve जल्द ही छत्तीसगढ़ में वन्यजीव संरक्षण की एक बड़ी सफलता की कहानी बन सकता है।
