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Transfer Order पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Transfer Order को चुनौती देने वाली नगर निगम कर्मचारी की याचिका छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई कर्मचारी अपनी पसंद की जगह पर पोस्टिंग पाने का दावा नहीं कर सकता। केवल पहले किसी स्थान पर पदस्थ रहने से उसी जगह दोबारा नियुक्ति पाने का अधिकार भी पैदा नहीं होता।

जस्टिस बिभू दत्ता गुरु ने 18 अगस्त 2026 को यह आदेश पारित किया। मामला भिलाई-चरौदा नगर निगम में पदस्थ असिस्टेंट ग्रेड-II कर्मचारी से जुड़ा था, जिसने नगरीय प्रशासन विभाग के 31 जुलाई के तबादला आदेश को चुनौती दी थी।

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Transfer Order के खिलाफ कर्मचारी ने क्यों लगाई याचिका?

कर्मचारी की नियुक्ति रायपुर में असिस्टेंट ग्रेड-III के पद पर हुई थी। सितंबर 2021 में उसका तबादला रिसाली किया गया, जहां बाद में उसे सरप्लस घोषित कर दिया गया।

इसके बाद सितंबर 2025 में उसे भिलाई-चरौदा नगर निगम भेजा गया। वहां भी कर्मचारी को सरप्लस घोषित कर दिया गया। इसके बाद उसने अपने मूल संस्थान रायपुर में वापस भेजे जाने की मांग की।

कर्मचारी का कहना था कि उसे रायपुर में वापस पदस्थ किया जाना चाहिए। जब उसकी ओर से दिए गए अभ्यावेदन पर समय पर निर्णय नहीं हुआ, तो उसने 2026 की शुरुआत में हाईकोर्ट का रुख किया।

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Transfer Order से पहले कोर्ट ने दिया था निर्देश

कर्मचारी की याचिका पर पहले हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को उसके अभ्यावेदन पर दो महीने के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया था। निर्धारित समय में कार्रवाई नहीं होने पर कर्मचारी ने अवमानना याचिका भी दायर की।

इसके बाद जुलाई 2026 में अधिकारियों ने कर्मचारी की बात सुनी। हालांकि, उसकी मांग के अनुसार रायपुर भेजने के बजाय नगरीय प्रशासन विभाग ने 31 जुलाई को उसे राजनांदगांव नगर निगम स्थानांतरित कर दिया।

यही Transfer Order बाद में हाईकोर्ट के सामने चुनौती का विषय बना।

कर्मचारी ने Transfer Order पर क्या दलील दी?

कर्मचारी की ओर से अधिवक्ता उत्तम पांडे ने दलील दी कि बार-बार तबादला किए जाने से यह संकेत मिलता है कि कर्मचारी के मामले पर वस्तुनिष्ठ तरीके से विचार नहीं किया गया।

बचाव पक्ष की ओर से यह भी कहा गया कि कर्मचारी को बार-बार एक स्थान से दूसरे स्थान भेजने के बजाय उसकी सेवाओं के लिए प्रतिनियुक्ति जैसे विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए था।

वहीं राज्य की ओर से अधिवक्ता अपूर्वा निगम ने दलील दी कि कर्मचारी को सरप्लस घोषित किए जाने के बाद स्वयं ने स्थानांतरण की मांग की थी। इसलिए प्रशासन ने उपलब्ध परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लिया।

Transfer Order पर हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने कर्मचारी की दलीलों को स्वीकार नहीं किया और तबादला आदेश रद्द करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि स्थानांतरण प्रशासनिक आवश्यकता का विषय है।

कोर्ट ने यह भी माना कि किसी सरप्लस कर्मचारी को किसी विशेष पद या स्थान पर समायोजित करना प्रशासनिक निर्णय के दायरे में आता है। कर्मचारी अपनी पसंद की जगह पर पोस्टिंग का दावा नहीं कर सकता।

पहले की पोस्टिंग से नहीं बनता अधिकार

अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी का पहले किसी विशेष स्थान पर पदस्थ होना उसे भविष्य में उसी स्थान पर पोस्टिंग पाने का कानूनी अधिकार नहीं देता।

इस आधार पर कोर्ट ने कर्मचारी की याचिका को मेरिट से रहित मानते हुए खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के उन पूर्व फैसलों का भी हवाला दिया गया, जिनमें तबादले को प्रशासनिक आवश्यकता से जुड़ा विषय माना गया है।

भारत का सर्वोच्च न्यायालय पर न्यायिक फैसलों और अदालत से संबंधित आधिकारिक जानकारी उपलब्ध है। वहीं छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की वेबसाइट पर राज्य की उच्च न्यायपालिका से संबंधित आधिकारिक जानकारी देखी जा सकती है।

प्रशासनिक तबादलों को लेकर क्या है संदेश?

इस फैसले से सरकारी और स्थानीय निकाय कर्मचारियों के तबादलों से जुड़े मामलों में प्रशासनिक अधिकार की स्थिति एक बार फिर स्पष्ट होती है। कर्मचारी अपनी पसंद की जगह पर नियुक्ति की मांग कर सकता है, लेकिन केवल पसंद के आधार पर उस स्थान पर पोस्टिंग उसका अधिकार नहीं बन जाती।

वहीं प्रशासन को भी तबादला करते समय नियमों और प्रशासनिक जरूरतों के अनुरूप निर्णय लेना होता है। इस मामले में हाईकोर्ट ने उपलब्ध तथ्यों के आधार पर विभाग के निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार किया।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह Transfer Order फैसला सरकारी कर्मचारियों की पसंदीदा पोस्टिंग को लेकर महत्वपूर्ण संदेश देता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पहले किसी स्थान पर पदस्थ रहना उसी जगह दोबारा पोस्टिंग का अधिकार नहीं देता। सरप्लस कर्मचारी को कहां समायोजित किया जाए, यह प्रशासनिक आवश्यकता और उपलब्ध पदों के आधार पर तय किया जा सकता है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने कर्मचारी की याचिका खारिज कर दी।

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