आज मोबाइल फोन, स्मार्ट टीवी और ओटीटी प्लेटफॉर्म हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन एक दौर ऐसा भी था, जब टेलीविजन देखना किसी जादू से कम नहीं था। छत्तीसगढ़ के गांवों में शाम होते ही लोग बरगद के पेड़ के नीचे इकट्ठा होते थे। सामने लकड़ी के शटर वाला ब्लैक एंड व्हाइट टीवी रखा रहता था और आसपास के गांवों से भी लोग कार्यक्रम देखने पहुंचते थे।
Raipur Doordarshan का सफर इसी बदलते दौर की याद दिलाता है। उपग्रह के जरिए गांवों तक शिक्षा और जानकारी पहुंचाने के प्रयोग से शुरू हुई यह यात्रा आज डिजिटल प्रसारण, यूट्यूब और ओटीटी तक पहुंच चुकी है। रायपुर दूरदर्शन के 50 साल के सफर की चर्चा के बीच पुराने दर्शक उस दौर को याद कर रहे हैं, जब टीवी पूरे गांव के लिए मनोरंजन और जानकारी का सबसे बड़ा माध्यम हुआ करता था।
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Raipur Doordarshan: जब टीवी को कहते थे जादुई बक्सा
1970 के दशक में गांवों में टीवी होना अपने आप में बड़ी बात थी। जिन घरों में टेलीविजन होता था, वहां शाम को आसपास के लोग कार्यक्रम देखने पहुंच जाते थे। कई जगह बरगद के पेड़ के नीचे सामूहिक रूप से टीवी देखने की व्यवस्था होती थी।
भाटापारा के तरेंगा सहित कई गांवों में टेलीविजन को लेकर खास उत्साह था। लकड़ी के शटर वाले ब्लैक एंड व्हाइट टीवी को लोग जादुई बक्सा कहते थे। कार्यक्रम शुरू होने से पहले कुछ लोग टीवी के सामने अगरबत्ती जलाकर पूजा भी करते थे।
बाद में घरों की छतों पर यागी एंटीना लगाए जाने लगे। सिग्नल ठीक करने के लिए कोई छत पर एंटीना घुमाता था और नीचे बैठा व्यक्ति आवाज लगाता था, ‘आया क्या? अब साफ दिख रहा है!’ उस समय टीवी देखना केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि पूरे गांव का सामूहिक अनुभव था।
SITE प्रयोग से गांवों तक पहुंची शिक्षा
Raipur Doordarshan की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए 1975-76 के सैटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलीविजन एक्सपेरिमेंट (SITE) को जानना जरूरी है।
भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई का मानना था कि अंतरिक्ष तकनीक का इस्तेमाल आम लोगों, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए होना चाहिए। इसी सोच के तहत इसरो और अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के सहयोग से SITE प्रयोग शुरू हुआ।
यह प्रयोग 1 अगस्त 1975 से 31 जुलाई 1976 तक चला। इसमें अमेरिकी ATS-6 उपग्रह का इस्तेमाल किया गया। इसके माध्यम से छह राज्यों के करीब 2,400 गांवों तक शैक्षणिक और विकास से जुड़े कार्यक्रम पहुंचाए गए।
इन कार्यक्रमों में खेती-किसानी, स्वास्थ्य, स्वच्छता और शिक्षा से संबंधित जानकारियां दी जाती थीं। रायपुर भी इस शैक्षणिक प्रसारण और कार्यक्रम निर्माण से जुड़े प्रमुख केंद्रों में शामिल रहा।
Raipur Doordarshan ने छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को दी पहचान
दूरदर्शन ने केवल समाचार और मनोरंजन ही नहीं दिखाया, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोककला और परंपराओं को भी लोगों तक पहुंचाया।
स्थानीय कलाकारों को टीवी पर अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला। पंडवानी गायिका तीजन बाई, भरथरी गायिका सुरुजबाई खांडे और लोककलाकार झाड़ूराम देवांगन जैसे कलाकारों की प्रस्तुतियों को दर्शकों तक पहुंचाया गया।
‘भुइयां के गोठ’ और ‘बस्तर अंचल से’ जैसे कार्यक्रमों में छत्तीसगढ़ की ग्रामीण संस्कृति, जनजातीय जीवन, ढोकरा कला और स्थानीय परंपराओं को जगह मिली।
इन कार्यक्रमों के माध्यम से प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान राज्य की सीमाओं से बाहर भी पहुंची। जिन कलाकारों की प्रस्तुतियां पहले स्थानीय आयोजनों तक सीमित थीं, उन्हें टेलीविजन के जरिए व्यापक दर्शक मिले।
Raipur Doordarshan के सफर के पांच बड़े पड़ाव
रायपुर दूरदर्शन का विकास अलग-अलग तकनीकी और प्रसारण चरणों से होकर गुजरा है।
1. वर्ष 1975-76: SITE प्रयोग
उपग्रह के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों तक शैक्षणिक कार्यक्रम पहुंचाने का ऐतिहासिक प्रयोग हुआ। रायपुर इस प्रसारण व्यवस्था से जुड़ा रहा।
2. वर्ष 1977: रायपुर दूरदर्शन केंद्र की शुरुआत
प्रसार भारती की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, रायपुर दूरदर्शन केंद्र को 1977 में 1 किलोवाट हाई पावर ट्रांसमीटर के साथ शुरू किया गया था। यह SITE के बाद ग्रामीण प्रसारण की निरंतरता से जुड़ा महत्वपूर्ण कदम था।
3. वर्ष 1998: स्थानीय प्रसारण का विस्तार
रायपुर केंद्र ने 17 अगस्त 1998 से 90 मिनट का स्थानीय प्रसारण शुरू किया। इससे क्षेत्रीय कार्यक्रमों को नियमित रूप से प्रसारित करने का अवसर मिला।
4. वर्ष 2000: छत्तीसगढ़ राज्य गठन
1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना। इस ऐतिहासिक अवसर का प्रसारण भी दूरदर्शन के माध्यम से लोगों तक पहुंचा।
5. डिजिटल दौर: यूट्यूब और OTT
समय के साथ प्रसारण तकनीक बदली। अब डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से दर्शक अपनी सुविधा के अनुसार कार्यक्रम देख सकते हैं। प्रसार भारती के WAVES ओटीटी प्लेटफॉर्म और यूट्यूब जैसे माध्यमों ने प्रसारण की पहुंच को और व्यापक बनाया है।
ब्लैक एंड व्हाइट टीवी से डिजिटल दुनिया तक बदली तस्वीर
एक समय था जब गांव के कुछ लोग मिलकर एक टीवी पर कार्यक्रम देखते थे। आज वही प्रसारण मोबाइल फोन की स्क्रीन पर उपलब्ध है। अब दर्शकों को कार्यक्रम देखने के लिए किसी निश्चित समय या स्थान पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
हालांकि तकनीक बदल गई है, लेकिन दूरदर्शन की ऐतिहासिक भूमिका आज भी महत्वपूर्ण है। इसने ग्रामीण भारत तक शिक्षा, जानकारी और मनोरंजन पहुंचाने में योगदान दिया। छत्तीसगढ़ के कलाकारों और स्थानीय संस्कृति को पहचान दिलाने में भी इसकी भूमिका याद की जाती है।
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Raipur Doordarshan का सफर केवल एक प्रसारण केंद्र की कहानी नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ में बदलती तकनीक, लोकसंस्कृति और सामाजिक जीवन की यादगार यात्रा है। बरगद के पेड़ के नीचे एक टीवी के सामने जुटने वाले गांव के लोगों से लेकर आज मोबाइल पर कार्यक्रम देखने वाली पीढ़ी तक, इस यात्रा ने कई बदलाव देखे हैं। टीवी का आकार और प्रसारण का माध्यम जरूर बदल गया, लेकिन लोगों तक जानकारी और संस्कृति पहुंचाने का उद्देश्य आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
