Chhattisgarh High Court ने चार MBBS स्नातकों को बड़ी राहत देते हुए उनके अनिवार्य दो वर्षीय सरकारी सेवा बांड को निरस्त कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि राज्य सरकार निर्धारित समय सीमा के भीतर नियुक्ति आदेश जारी करने में विफल रही, इसलिए कानून के अनुसार बांड स्वतः समाप्त माना जाएगा।
यह मामला बीजापुर और नारायणपुर जैसे नक्सल प्रभावित जिलों में अनिवार्य सेवा से जुड़ा था, जहां डॉक्टरों की नियुक्ति की जानी थी।
Chhattisgarh High Court का अहम फैसला
गुरुवार को न्यायमूर्ति Amitendra Kishore Prasad की एकल पीठ ने अपने आदेश में कहा कि राज्य सरकार ने कानून द्वारा निर्धारित छह महीने की समयसीमा के भीतर नियुक्ति आदेश जारी नहीं किए।
अदालत ने कहा कि छत्तीसगढ़ मेडिकल, डेंटल और फिजियोथेरेपी स्नातक प्रवेश नियम, 2025 के नियम 10(vi) के अनुसार यदि छह महीने के भीतर नियुक्ति नहीं दी जाती है, तो सेवा बांड स्वतः समाप्त हो जाता है।
इस आधार पर Chhattisgarh High Court ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाया।
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क्या था MBBS सेवा बांड विवाद?
चारों याचिकाकर्ताओं ने वर्ष 2024 में Chhattisgarh Institute of Medical Sciences से MBBS की पढ़ाई पूरी की थी।
इसके बाद उन्होंने मई 2025 में अपनी अनिवार्य रोटेटिंग इंटर्नशिप भी पूरी कर ली थी।
कॉलेज में प्रवेश के समय उन्होंने राज्य सरकार के साथ एक सेवा बांड पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत उन्हें MBBS पूरा करने के बाद दो वर्षों तक सरकारी सेवा देनी थी।
हालांकि, उनका दावा था कि नियमों के अनुसार सरकार को MBBS और इंटर्नशिप पूरी होने के छह महीने के भीतर नियुक्ति आदेश जारी करना अनिवार्य था।
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Chhattisgarh High Court ने क्या कहा?
छह महीने की समयसीमा को बताया अनिवार्य
Chhattisgarh High Court ने अपने फैसले में कहा कि संबंधित नियमों में निर्धारित छह महीने की अवधि केवल औपचारिकता नहीं बल्कि अनिवार्य प्रावधान है।
अदालत ने कहा कि जब तक निर्धारित समय के भीतर नियुक्ति नहीं दी जाती, तब तक सेवा बांड लागू नहीं रह सकता।
न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि कानून के संचालन से बांड स्वतः समाप्त हो चुका था।
नियुक्ति आदेश को बताया अमान्य
राज्य सरकार ने दिसंबर 2025 में काउंसलिंग प्रक्रिया शुरू की और 24 दिसंबर 2025 को नियुक्ति आदेश जारी किए।
इन आदेशों के तहत डॉक्टरों को बीजापुर और नारायणपुर के स्वास्थ्य केंद्रों में पदस्थ किया गया था।
लेकिन Chhattisgarh High Court ने कहा कि यह नियुक्ति आदेश निर्धारित समयसीमा समाप्त होने के बाद जारी किए गए थे, इसलिए इनका कोई कानूनी महत्व नहीं है।
राज्य सरकार का पक्ष क्या था?
राज्य सरकार ने अदालत में दलील दी कि याचिकाकर्ता अपनी स्वेच्छा से स्वीकार की गई जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश कर रहे हैं।
सरकार का कहना था कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में रियायती शिक्षा प्रदान की जाती है और बदले में छात्रों को ग्रामीण एवं दूरस्थ क्षेत्रों में सेवा देना आवश्यक है।
सरकार ने यह भी तर्क दिया कि डॉक्टरों ने काउंसलिंग प्रक्रिया में भाग लिया था, इसलिए वे नियुक्ति स्वीकार करने के लिए बाध्य थे।
इसके अलावा सरकार ने कहा कि सेवा नहीं देने की स्थिति में सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों को 25 लाख रुपये और आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को 20 लाख रुपये बांड राशि के रूप में जमा करनी होगी।
डॉक्टरों को कैसे मिली राहत?
याचिकाकर्ताओं की मुख्य दलील
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता Ashutosh Mishra ने अदालत में कहा कि नियमों के तहत छह महीने के भीतर नियुक्ति अनिवार्य थी।
चूंकि नवंबर 2025 तक कोई नियुक्ति आदेश जारी नहीं किया गया, इसलिए बांड स्वतः समाप्त हो गया।
अदालत ने इस दलील को स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ताओं को राहत प्रदान की।
इसके साथ ही उनके MBBS डिग्री दस्तावेज जारी करने और नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) देने का रास्ता भी साफ हो गया।
फैसले का स्वास्थ्य व्यवस्था पर असर
यह फैसला राज्य सरकार की बांड आधारित सेवा नीति के क्रियान्वयन पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।
विशेष रूप से नक्सल प्रभावित और दूरस्थ क्षेत्रों में डॉक्टरों की उपलब्धता पहले से ही एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नियुक्ति प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं की जाती है, तो भविष्य में ऐसे और मामले अदालतों तक पहुंच सकते हैं।
आगे क्या हो सकता है?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार राज्य सरकार इस फैसले को उच्च स्तर पर चुनौती देने पर विचार कर सकती है।
साथ ही भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिए नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक समयबद्ध और पारदर्शी बनाने की आवश्यकता होगी।
यह फैसला उन हजारों मेडिकल छात्रों के लिए भी महत्वपूर्ण है जो सरकारी सेवा बांड व्यवस्था के तहत पढ़ाई कर रहे हैं।
Chhattisgarh High Court का यह फैसला राज्य की मेडिकल सेवा बांड नीति से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल बन सकता है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि सरकार निर्धारित समयसीमा के भीतर नियुक्ति आदेश जारी नहीं करती है, तो सेवा बांड स्वतः समाप्त माना जाएगा। इस फैसले से चार MBBS डॉक्टरों को राहत मिली है, वहीं भविष्य में Chhattisgarh High Court के इस आदेश का प्रभाव अन्य समान मामलों पर भी पड़ सकता है।
