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Chhattisgarh HC का बड़ा फैसला

Chhattisgarh HC ने करीब एक दशक पुराने रिश्वत मामले में शिक्षा विभाग के कर्मचारी मुरली प्रसाद चौधरी को बरी कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार के अपराध में कथित रिश्वत की मांग को उचित संदेह से परे साबित करना जरूरी है। केवल आरोपी के पास से दागी नोट बरामद होने के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।

बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की एकल पीठ के न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी ने 18 सितंबर 2026 को यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने 2017 में विशेष अदालत द्वारा दी गई सजा को रद्द करते हुए आरोपी को संबंधित आरोपों से बरी कर दिया।

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Chhattisgarh HC के सामने क्या था मामला?

मुरली प्रसाद चौधरी वर्ष 2014 में सूरजपुर जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में अकाउंटेंट के पद पर पदस्थ थे। मामला एक स्कूल की मान्यता से जुड़ा था, जिसे मां सरस्वती शिक्षा समिति संचालित करती थी।

अभियोजन के अनुसार समिति के अध्यक्ष-सह-प्रबंधक मोहित राम राजवाड़े ने स्कूल की मान्यता के सिलसिले में DEO कार्यालय का संपर्क किया था। आरोप था कि 20 जून 2014 को चौधरी ने कथित तौर पर ₹15,000 की रिश्वत मांगी और तत्काल ₹5,000 देने को कहा। अभियोजन के मुताबिक ₹4,900 दिए गए थे।

इसके बाद राजवाड़े ने 21 जून 2014 को एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) में शिकायत दर्ज कराई। जांच के दौरान बातचीत रिकॉर्ड कराई गई और अभियोजन ने दावा किया कि कथित रकम घटकर ₹8,000 हो गई थी।

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ट्रैप में ₹8 हजार की बरामदगी

शिकायत और कथित बातचीत के आधार पर ACB ने 30 जून 2014 को ट्रैप कार्रवाई की। अभियोजन का कहना था कि चौधरी ने शिकायतकर्ता से ₹8,000 लिए, नोट गिने और उन्हें अपनी पैंट की बाईं जेब में रख लिया।

इसके बाद ACB ने उन्हें पकड़ लिया और कथित तौर पर रकम बरामद की। जांच पूरी होने के बाद चार्जशीट दाखिल की गई और विशेष अदालत ने 2017 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की संबंधित धाराओं के तहत चौधरी को दोषी ठहराया था।

बचाव पक्ष ने क्या दलील दी?

हाई कोर्ट में चौधरी की ओर से अधिवक्ता आशुतोष त्रिवेदी ने तर्क दिया कि भ्रष्टाचार के आरोप को साबित करने के लिए रिश्वत की मांग और स्वीकार करने, दोनों का प्रमाण जरूरी है।

बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता राजवाड़े और एक अन्य गवाह कुंवर साय अपने बयानों में अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं कर पाए। इसलिए केवल कथित रकम की बरामदगी को दोषसिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता।

Chhattisgarh HC ने क्यों किया बरी?

हाई कोर्ट ने पाया कि मामले में शिकायतकर्ता ही कथित रिश्वत की मांग और स्वीकार किए जाने के संबंध में प्रमुख गवाह था। लेकिन अदालत में राजवाड़े ने अभियोजन के दावे का समर्थन नहीं किया।

राजवाड़े ने कोर्ट में कहा कि चौधरी ने उनसे रिश्वत की मांग नहीं की थी। उन्होंने यह भी बताया कि डॉ. प्रताप ने स्कूल की मान्यता के लिए बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट खाता जरूरी बताया था और इसी उद्देश्य से उन्होंने डॉ. प्रताप को ₹9,000 दिए थे।

राजवाड़े ने पुलिस दस्तावेजों और पंचनामों से जुड़े अपने हस्ताक्षरों के बारे में भी कहा कि एक रेस्ट हाउस में उनसे हस्ताक्षर कराए गए थे और दस्तावेजों की सामग्री उन्हें पढ़कर नहीं बताई गई थी।

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कानूनी आधार क्या रहा?

Chhattisgarh HC ने कहा कि रिश्वत से जुड़े अपराध में अवैध gratification की मांग साबित होना मूलभूत आवश्यकता है। अदालत के अनुसार यदि अभियोजन मांग को उचित संदेह से परे साबित नहीं कर पाता, तो केवल कथित रिश्वत की रकम की बरामदगी से दोषसिद्धि नहीं हो सकती।

कोर्ट ने यह भी माना कि अभियोजन के अन्य गवाह कथित मांग के सबसे महत्वपूर्ण पहलू को साबित नहीं कर सके। कथित इलेक्ट्रॉनिक बातचीत की evidentiary foundation पर भी सवाल दर्ज किए गए थे। फैसले में बताया गया कि रिकॉर्डिंग के संबंध में आवश्यक प्रमाणपत्र, आरोपी की आवाज का नमूना और फोरेंसिक जांच जैसी महत्वपूर्ण कड़ियां उपलब्ध नहीं थीं।

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2017 का आदेश रद्द

इन परिस्थितियों में हाई कोर्ट ने सूरजपुर की विशेष अदालत द्वारा 30 मार्च 2017 को पारित दोषसिद्धि और सजा के आदेश को रद्द कर दिया। इसके परिणामस्वरूप मुरली प्रसाद चौधरी को मामले में बरी कर दिया गया।

Chhattisgarh HC का यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि भ्रष्टाचार के आपराधिक मामले में आरोपों की कानूनी कसौटी पर ठोस साक्ष्यों से पुष्टि आवश्यक है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कथित रिश्वत की रकम बरामद होना अपने आप में पर्याप्त नहीं है, यदि अवैध मांग का आवश्यक प्रमाण सामने नहीं आता। इस मामले में गवाहों के बयानों और साक्ष्यों का मूल्यांकन करने के बाद हाई कोर्ट ने 2017 की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया।

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