Minor Rape Survivor Pregnancy मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि दुष्कर्म की शिकार उस महिला को, जो अपराध के समय नाबालिग थी, केवल इसलिए अवांछित गर्भ धारण करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता क्योंकि गर्भावस्था कानूनी 24 सप्ताह की सीमा पार कर चुकी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में पीड़िता को गर्भ जारी रखने के लिए विवश करना उसके यौन उत्पीड़न से जुड़े मानसिक आघात को और गहरा करेगा।
Minor Rape Survivor Pregnancy: क्या है पूरा मामला?
यह मामला एक दुष्कर्म पीड़िता की याचिका से जुड़ा है, जिसने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में गर्भपात की अनुमति मांगी थी।
याचिका में कहा गया कि जब पीड़िता नाबालिग थी, तब उसके साथ यौन शोषण किया गया। इसी अपराध के परिणामस्वरूप वह गर्भवती हुई। मामला प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज (POCSO) Act के तहत दंडनीय अपराधों से संबंधित है।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसी नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर करना न्यायसंगत नहीं होगा।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि ऐसी पीड़िता को केवल इसलिए गर्भ धारण करने के लिए बाध्य किया जाता है क्योंकि गर्भावस्था 24 सप्ताह से अधिक हो चुकी है, तो यह उसके साथ हुए यौन अपराध से उत्पन्न मानसिक और भावनात्मक पीड़ा को और बढ़ाएगा।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने 24 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति प्रदान की।
Minor Rape Survivor Pregnancy और MTP कानून
भारत में Medical Termination of Pregnancy (MTP) Act के तहत सामान्य परिस्थितियों में निश्चित समय-सीमा के भीतर गर्भपात की अनुमति दी जाती है।
हालांकि, कई मामलों में उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना है कि यदि गर्भावस्था दुष्कर्म का परिणाम हो, पीड़िता नाबालिग हो या उसके शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ने की आशंका हो, तो संवैधानिक अधिकारों के तहत अदालत विशेष परिस्थितियों में 24 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दे सकती है।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला भी इसी संवैधानिक दृष्टिकोण को आगे बढ़ाता है।
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फैसले का कानूनी महत्व
इस निर्णय में अदालत ने पीड़िता की गरिमा, मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है, जहां दुष्कर्म पीड़िताएं कानूनी समय-सीमा पार होने के बाद भी न्यायालय से राहत मांगती हैं।
यह आदेश इस सिद्धांत को भी मजबूत करता है कि न्याय केवल कानून की समय-सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि पीड़ित के मौलिक अधिकारों और सम्मान की रक्षा भी उसका उद्देश्य है।
पीड़िताओं के अधिकारों पर जोर
इस फैसले से यह संदेश भी जाता है कि अदालतें यौन अपराधों की शिकार महिलाओं और बच्चियों के मानसिक, शारीरिक और संवैधानिक अधिकारों को गंभीरता से देख रही हैं।
ऐसे मामलों में न्यायालय प्रत्येक मामले के तथ्यों, मेडिकल रिपोर्ट और पीड़िता की इच्छा को ध्यान में रखते हुए निर्णय ले सकता है।
समाज के लिए क्या है संदेश?
दुष्कर्म से जुड़े मामलों में पीड़िता के पुनर्वास और मानसिक स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता देना आवश्यक है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अवांछित गर्भावस्था को जबरन जारी रखने से पीड़िता को लंबे समय तक मानसिक आघात का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में अदालतों के संवेदनशील दृष्टिकोण से पीड़िताओं को न्याय मिलने की उम्मीद बढ़ती है।
Minor Rape Survivor Pregnancy मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला महिलाओं और विशेष रूप से नाबालिग दुष्कर्म पीड़िताओं के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल कानूनी समय-सीमा पार होने के आधार पर किसी पीड़िता को अवांछित गर्भ धारण करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। यह निर्णय न्याय, गरिमा और मानवाधिकारों के संरक्षण की भावना को और मजबूत करता है।
