Fake Snakebite Compensation Scam को लेकर छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में जांच लगातार तेज होती जा रही है। कथित ₹17.24 करोड़ के फर्जी सर्पदंश मुआवजा घोटाले में पुलिस की कार्रवाई के बाद राजस्व विभाग में असंतोष बढ़ गया है। मामले में गिरफ्तार तीन तहसील रीडरों को निलंबित किए जाने के विरोध में जिलेभर के राजस्व कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी, जिससे तहसील कार्यालयों का कामकाज प्रभावित हुआ।
पुलिस का दावा है कि यह एक संगठित गिरोह था, जिसने बीमारी, आत्महत्या और अन्य कारणों से हुई मौतों को फर्जी दस्तावेजों के जरिए सर्पदंश से हुई मौत बताकर राजस्व पुस्तक परिपत्र (RBC) 6-4 योजना के तहत ₹4 लाख का मुआवजा हासिल किया।
Fake Snakebite Compensation Scam में तीन तहसील रीडर निलंबित
जांच के दौरान गिरफ्तार किए गए तीन तहसील रीडर नरेंद्र कौशिक, गरीबराम बिंझवार और हरिशंकर राठौर को उनकी गिरफ्तारी के बाद निलंबित कर दिया गया है।
सूत्रों के अनुसार पुलिस जल्द ही राजस्व विभाग के आठ अन्य कर्मचारियों के बयान दर्ज कर सकती है। इसी आशंका के चलते विभागीय कर्मचारियों में नाराजगी बढ़ी और विभिन्न कर्मचारी संगठनों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया।
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राजस्व कर्मचारियों की हड़ताल से प्रभावित हुआ कामकाज
Fake Snakebite Compensation Scam की जांच के विरोध में छत्तीसगढ़ राज्य राजस्व लिपिक संघ, पटवारी संघ और अधिकारी-कर्मचारी महासंघ के सदस्यों ने कार्य बहिष्कार किया।
हड़ताल के कारण तहसील कार्यालयों में नामांतरण, बंटवारा, सीमांकन और अन्य राजस्व मामलों की सुनवाई प्रभावित हुई। हालांकि तहसीलदार न्यायालय पहुंचे, लेकिन रीडरों की अनुपस्थिति के कारण कई मामलों की सुनवाई नहीं हो सकी।
बाद में कर्मचारी संगठनों के प्रतिनिधिमंडल ने बिलासपुर कलेक्टर और पुलिस महानिरीक्षक (IG) से मुलाकात की। कलेक्टर द्वारा निष्पक्ष विभागीय जांच का आश्वासन दिए जाने के बाद प्रस्तावित तीन दिवसीय हड़ताल वापस लेने की घोषणा की गई, हालांकि पहले से घोषित एक दिन का कार्य बहिष्कार जारी रहा।
Fake Snakebite Compensation Scam कैसे किया गया?
पुलिस जांच के अनुसार, कथित गिरोह सबसे पहले हाल ही में हुई मौतों की जानकारी RTI आवेदन और अन्य माध्यमों से जुटाता था।
इसके बाद फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट, पंचनामा और राजस्व अभिलेख तैयार कर यह दर्शाया जाता था कि मौत सर्पदंश से हुई है। इन दस्तावेजों के आधार पर RBC 6-4 योजना के तहत ₹4 लाख का मुआवजा स्वीकृत कराया जाता था।
जांच एजेंसियों के अनुसार, लाभार्थियों को केवल ₹20,000 से ₹50,000 तक दिए जाते थे, जबकि शेष राशि कथित रूप से गिरोह के सदस्यों के बीच बांट ली जाती थी।
कर्मचारी संगठनों ने क्या कहा?
कर्मचारी संगठनों का कहना है कि तहसील रीडरों की भूमिका केवल आवेदन और दस्तावेजों को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने तथा केस फाइल का संधारण करने तक सीमित होती है।
उनका तर्क है कि मुआवजा स्वीकृत करने का अंतिम अधिकार न्यायिक प्राधिकारी के रूप में कार्यरत तहसीलदार के पास होता है। साथ ही पटवारियों के पास पोस्टमार्टम रिपोर्ट या पुलिस पंचनामा की सत्यता जांचने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
संगठनों ने यह भी आरोप लगाया कि कई मामलों में फर्जी हस्ताक्षर और नकली सरकारी मुहरों का उपयोग किया गया, जबकि संबंधित दस्तावेज कभी तहसील कार्यालय पहुंचे ही नहीं।
अब तक दो दर्जन से अधिक गिरफ्तारियां, कई अधिकारी जांच के दायरे में
Fake Snakebite Compensation Scam की जांच में अब तक दो दर्जन से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है।
गिरफ्तार आरोपियों में डॉक्टर, पुलिसकर्मी, राजस्व कर्मचारी, वकील, तहसीलदार का चालक, होमगार्ड जवान और अन्य लोग शामिल हैं।
इसके अलावा कई तहसीलदारों की भूमिका की भी जांच की जा रही है। पुलिस ने सात अधिकारियों को नोटिस जारी किए हैं और उनके द्वारा स्वीकृत मामलों की जांच की जा रही है।
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Fake Snakebite Compensation Scam छत्तीसगढ़ के हाल के सबसे चर्चित कथित वित्तीय घोटालों में से एक बनकर सामने आया है। पुलिस की जांच लगातार आगे बढ़ रही है और कई विभागों की भूमिका की पड़ताल की जा रही है। वहीं कर्मचारी संगठन निष्पक्ष विभागीय जांच की मांग कर रहे हैं। मामले की अंतिम सच्चाई जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी, लेकिन फिलहाल Fake Snakebite Compensation Scam ने प्रशासनिक व्यवस्था और मुआवजा वितरण प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
