Marriage Refusal: शादी से इंकार पर कृषि अधिकारी को उम्रकैद

Marriage Refusal से जुड़े एक बड़े मामले में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की विशेष अदालत ने बालोद निवासी कृषि विस्तार अधिकारी देवनारायण साहू को उम्रकैद की सजा सुनाई है। आरोपी पर कॉलेज की सहपाठी को शादी का झांसा देकर लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाने और बाद में जाति के नाम पर शादी से इंकार करने का आरोप साबित हुआ।

कोर्ट ने आरोपी को SC/ST एक्ट समेत कई गंभीर धाराओं में दोषी माना है। यह फैसला 2 मई को विशेष न्यायाधीश पंकज कुमार सिन्हा की अदालत ने सुनाया।


Marriage Refusal केस क्या है?

यह मामला बिलासपुर जिले की रहने वाली एक युवती से जुड़ा है। पीड़िता और आरोपी देवनारायण साहू जगदलपुर के एग्रीकल्चर कॉलेज में साथ पढ़ते थे। पढ़ाई के दौरान दोनों के बीच दोस्ती हुई, जो बाद में प्रेम संबंध में बदल गई।

सरकारी वकील उमाशंकर वर्मा के अनुसार, बाद में दोनों रायपुर में प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए कोचिंग करने लगे। इसी दौरान आरोपी ने युवती को शादी का भरोसा दिया।

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कॉलेज फ्रेंडशिप से शुरू हुआ रिश्ता

पीड़िता ने अदालत को बताया कि शुरुआत में उसने रिलेशनशिप से मना कर दिया था। उसका कहना था कि दोनों अलग-अलग जाति से थे और परिवार शादी के लिए तैयार नहीं होगा।

हालांकि आरोपी ने युवती को भरोसा दिलाया कि सरकारी नौकरी लगने के बाद वह उससे शादी करेगा। इसी भरोसे के कारण दोनों का रिश्ता आगे बढ़ा।


शादी का झांसा देकर बनाए संबंध

कोर्ट रिकॉर्ड के मुताबिक फरवरी 2021 में आरोपी ने युवती को रायपुर के धरमपुरा स्थित किराए के मकान में बुलाया। वहां उसने शादी का वादा करते हुए युवती के साथ पहली बार शारीरिक संबंध बनाए।

पीड़िता ने कोर्ट में कहा कि 2023 और 2024 के दौरान भी आरोपी लगातार शादी का झांसा देकर संबंध बनाता रहा।

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Marriage Refusal के पीछे नौकरी लगने के बाद बदला रवैया

साल 2024 में देवनारायण साहू की नियुक्ति ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी के पद पर हुई। नौकरी लगने के बाद उसका व्यवहार पूरी तरह बदल गया।

पीड़िता के अनुसार आरोपी उसे “नीची जाति की सतनामी लड़की” कहकर अपमानित करने लगा। इसके बावजूद नवंबर 2025 में उसने युवती को मानपुर बुलाया और फिर शादी का झांसा देकर दुष्कर्म किया।


रायपुर बुलाकर कहा- सतनामी लड़की से शादी नहीं होगी

पीड़िता ने अदालत में बताया कि 4 दिसंबर 2025 को आरोपी ने उसे रायपुर बुलाया। वहां उसने साफ शब्दों में कहा कि वह उससे शादी नहीं करेगा क्योंकि वह सतनामी समाज से है।

आरोपी ने यह भी कहा कि उसके परिवार में सतनामी समाज की लड़की से शादी नहीं होती और वह किसी दूसरी लड़की से विवाह करना चाहता है।


कोर्ट में मां और भाई ने भी किया समर्थन

मामले की सुनवाई के दौरान पीड़िता की मां और भाई ने भी अदालत में बयान दर्ज कराया। दोनों ने बताया कि युवती ने उन्हें आरोपी द्वारा शादी का झांसा देकर संबंध बनाने और बाद में जाति के आधार पर शादी से इंकार करने की जानकारी दी थी।

परिजनों के बयान को अदालत ने महत्वपूर्ण साक्ष्य माना।


मेडिकल रिपोर्ट में क्या सामने आया?

पीड़िता का मेडिकल परीक्षण करने वाली डॉक्टर ने अदालत में बताया कि युवती का हाइमन फटा हुआ था। मेडिकल रिपोर्ट में लंबे समय तक शारीरिक संबंध होने की पुष्टि हुई।

डॉक्टर ने यह भी कहा कि जांच के दौरान पीड़िता ने आरोपी द्वारा शादी का झांसा देकर लगातार संबंध बनाने की जानकारी दी थी।


अदालत ने क्या कहा?

विशेष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी शुरू से पीड़िता की जाति जानता था। इसके बावजूद उसने शादी का झूठा वादा कर युवती का शोषण किया।

कोर्ट ने इसे गंभीर अपराध मानते हुए आरोपी को कठोर सजा सुनाई। अदालत ने कहा कि जातिगत आधार पर अपमान और धोखे से शारीरिक शोषण समाज में गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है।


SC/ST एक्ट के तहत सख्त सजा

रायपुर की विशेष अदालत ने आरोपी को कई धाराओं में दोषी ठहराया है।

अदालत द्वारा सुनाई गई सजा

  • BNS धारा 64(2)(M) के तहत 10 साल कठोर कारावास
  • BNS धारा 69 के तहत 10 साल कठोर कारावास
  • SC/ST एक्ट की धारा 3(2)(5) के तहत उम्रकैद
  • 6 हजार रुपए का जुर्माना

कोर्ट ने कहा कि सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी।

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Marriage Refusal मामले ने उठाए कई सवाल

यह मामला केवल शादी से इंकार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें जातिगत भेदभाव, विश्वासघात और महिला शोषण जैसे गंभीर मुद्दे भी सामने आए हैं।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से ऐसे मामलों में सख्त संदेश जाएगा, जहां शादी का झूठा वादा कर महिलाओं का शोषण किया जाता है।


Marriage Refusal केस में रायपुर कोर्ट का यह फैसला छत्तीसगढ़ में महिला सुरक्षा और सामाजिक न्याय के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने साफ किया कि शादी का झूठा वादा कर किसी महिला का शोषण करना और बाद में जाति के आधार पर शादी से इंकार करना गंभीर अपराध है।

इस फैसले से ऐसे मामलों में पीड़ित महिलाओं को न्याय मिलने की उम्मीद और मजबूत हुई है।

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