Hindu Marriage Act से जुड़ा एक अहम फैसला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सुनाया है, जिसने विवाह और तलाक से जुड़े कानून की व्याख्या को नया दृष्टिकोण दिया है।
हाईकोर्ट ने एक ऐसे मामले में परिवार न्यायालय के फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें केवल इसलिए आपसी सहमति से तलाक की याचिका खारिज कर दी गई थी क्योंकि पति अनुसूचित जनजाति से था।
न्यायालय ने कहा कि यदि पति-पत्नी ने हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया है और उसी परंपरा का पालन करते हैं, तो उन्हें हिंदू विवाह अधिनियम के तहत उपलब्ध कानूनी अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
Hindu Marriage Act पर हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय
Hindu Marriage Act से जुड़े इस मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की खंडपीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा की पीठ ने कहा कि अधिनियम की धारा 2(2) को केवल संरक्षण के रूप में देखा जाना चाहिए। इसे ऐसा अवरोध नहीं बनाया जा सकता, जिससे किसी व्यक्ति को कानूनी राहत से वंचित किया जाए।
मामले में पति मुनिराज मंडावी अनुसूचित जनजाति से हैं, जबकि पत्नी गुड़िया नागेश अनुसूचित जाति से हैं। दोनों का विवाह 15 अप्रैल 2009 को हिंदू रीति-रिवाजों और सप्तपदी के साथ हुआ था।
दंपत्ति ने अदालत में बताया कि वे लंबे समय से अलग रह रहे हैं और आपसी सहमति से तलाक चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वे अपनी समुदाय की परंपराओं के बजाय हिंदू परंपराओं का पालन करते हैं।
इसके बावजूद परिवार न्यायालय ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि अनुसूचित जनजाति के सदस्य पर यह अधिनियम लागू नहीं होता।
हाईकोर्ट ने इस दृष्टिकोण को गलत ठहराया और कहा कि यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से हिंदू रीति-रिवाजों को अपनाता है, तो उसे अधिनियम के तहत उपलब्ध अधिकारों का उपयोग करने से रोका नहीं जा सकता।
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मामला कैसे पहुंचा हाईकोर्ट
यह मामला वर्ष 2025 में बस्तर जिले के जगदलपुर स्थित परिवार न्यायालय के आदेश से शुरू हुआ था।
परिवार न्यायालय ने 12 अगस्त 2025 को आपसी सहमति से तलाक की याचिका को खारिज कर दिया था। अदालत ने कहा था कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 2(2) के अनुसार यह अधिनियम अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर लागू नहीं होता, जब तक कि केंद्र सरकार कोई अधिसूचना जारी न करे।
इस फैसले के खिलाफ दंपत्ति ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।
मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज परांजपे ने अमीकस क्यूरी के रूप में अदालत की सहायता की। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध मामले “लबिश्वर मांझी बनाम प्राण मांझी” का हवाला दिया।
इस फैसले में कहा गया था कि यदि कोई आदिवासी व्यक्ति हिंदू परंपराओं को अपनाता है, तो उसे हिंदू कानूनों के दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता।
अधिक जानकारी के लिए देखें:
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Key Facts: Hindu Marriage Act Case
- हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय का फैसला रद्द किया।
- पति अनुसूचित जनजाति और पत्नी अनुसूचित जाति से हैं।
- विवाह हिंदू रीति-रिवाज और सप्तपदी के साथ हुआ था।
- दंपत्ति 2014 से अलग रह रहे हैं।
- मामला अब पुनः परिवार न्यायालय को सुनवाई के लिए भेजा गया।
कानूनी प्रतिक्रिया
Hindu Marriage Act पर हाईकोर्ट का यह फैसला कानूनी दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय स्पष्ट करता है कि कानून का उद्देश्य अधिकारों की रक्षा करना है, न कि उन्हें सीमित करना।
इस फैसले से ऐसे कई मामलों को राहत मिल सकती है, जहां अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि के लोग हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह करते हैं।
साथ ही यह निर्णय आदिवासी समुदाय के लोगों के अधिकारों और उनकी सांस्कृतिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाने का प्रयास भी माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में समान मामलों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।
Hindu Marriage Act से जुड़ा यह फैसला न्यायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण संदेश देता है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून का उद्देश्य किसी को न्याय से वंचित करना नहीं है। यदि पति-पत्नी स्वयं हिंदू परंपराओं को अपनाते हैं, तो उन्हें अधिनियम के तहत उपलब्ध कानूनी अधिकार मिलेंगे।
इस निर्णय से स्पष्ट होता है कि Hindu Marriage Act की धारा 2(2) को कठोर प्रतिबंध के रूप में नहीं बल्कि संरक्षण के रूप में समझा जाना चाहिए।
