Supreme Court Child Malnutrition मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आदिवासी बहुल इलाकों में बच्चों की कुपोषण और रोकथाम योग्य बीमारियों से हो रही मौतों पर गंभीर चिंता जताई है। शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026 को अदालत ने इस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और संबंधित राज्यों को नोटिस जारी किया। याचिका में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के कुछ आदिवासी क्षेत्रों में बच्चों की खराब स्वास्थ्य स्थिति, चिकित्सा सुविधाओं की कमी और पोषण योजनाओं के क्रियान्वयन में कथित खामियों को उठाया गया है।
यह मामला अजब लाल लिल्हारे बनाम भारत संघ एवं अन्य (Ajab Lal Lilhare vs Union of India and Ors.) के नाम से सामने आया है। याचिका में विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) के बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुंच सुनिश्चित करने की मांग की गई है।
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Supreme Court Child Malnutrition मामले में अदालत का सख्त रुख
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं, ने मामले को बेहद गंभीर बताया। अदालत के समक्ष बच्चों की मौतों और आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कथित कमी से संबंधित दलीलें रखी गईं।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता वरुण ठाकुर ने दलील दी कि कुछ गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्रों में कुपोषण के कारण बच्चों की मौतें हो रही हैं। उन्होंने कहा कि अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के सामने पहले भी समस्याएं उठाई गई थीं, लेकिन याचिका के अनुसार, अपेक्षित प्रशासनिक कार्रवाई नहीं हुई।
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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और संबंधित राज्यों को नोटिस जारी कर मामले में उनका पक्ष जानने की प्रक्रिया शुरू की है। नोटिस जारी होना अपने आप में याचिका में लगाए गए आरोपों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं है।
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्रों पर चिंता
जनहित याचिका में आदिवासी आबादी वाले उन क्षेत्रों की स्थिति पर ध्यान आकर्षित किया गया है, जहां बच्चों को पोषण और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं पर्याप्त रूप से नहीं मिल पाने का आरोप है।
याचिकाकर्ता के मुताबिक, विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों के बच्चों को गंभीर तीव्र कुपोषण (Severe Acute Malnutrition—SAM) और खसरा-रूबेला जैसी बीमारियों के संयुक्त प्रभाव का सामना करना पड़ रहा है। याचिका में दावा किया गया है कि इन परिस्थितियों में कई बच्चों की जान गई है।
आदिवासी बस्तियों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच की समस्या भी प्रमुखता से उठाई गई। याचिका के अनुसार, कुछ गांव प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से कई किलोमीटर दूर स्थित हैं और वहां आपातकालीन रेफरल सेवाएं या मोबाइल चिकित्सा इकाइयां पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं हैं।
ऐसी परिस्थितियों में समय पर जांच, टीकाकरण और उपचार तक पहुंच प्रभावित होने की आशंका रहती है। हालांकि, प्रभावित क्षेत्रों में मौतों की संख्या और आरोपों की पुष्टि के लिए आधिकारिक आंकड़ों तथा संबंधित सरकारी जवाबों की जांच जरूरी होगी।
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स्वास्थ्य सेवाओं और आंगनबाड़ी व्यवस्था पर गंभीर सवाल
याचिका में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की कई कथित कमियों का उल्लेख किया गया है। इनमें चिकित्सा अधिकारियों की कमी, टीकाकरण अभियान का प्रभावी ढंग से लागू नहीं होना और आंगनबाड़ी केंद्रों से पोषण सामग्री तथा घर ले जाने वाले राशन की आपूर्ति रुकने के आरोप शामिल हैं।
याचिकाकर्ता का कहना है कि कुपोषण से प्रभावित बच्चों को समय पर पौष्टिक आहार और चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना जरूरी है। विशेष रूप से दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्यकर्मियों, दवाओं, टीकों और पोषण सामग्री की नियमित उपलब्धता बच्चों की जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में कुछ परिवारों को अप्रमाणित उपचार देने वाले लोगों पर निर्भर होना पड़ता है। इन आरोपों पर संबंधित सरकारों का जवाब और आधिकारिक जांच आगे की कार्यवाही में महत्वपूर्ण होंगे।
DMF फंड के इस्तेमाल की जांच की मांग
Supreme Court Child Malnutrition मामले में जिला खनिज न्यास (District Mineral Foundation—DMF) के धन के उपयोग का मुद्दा भी उठाया गया है।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि खनन प्रभावित आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य, पेयजल और पोषण संबंधी जरूरतों के लिए निर्धारित धन का या तो उचित उपयोग नहीं हुआ या उसका पूरा इस्तेमाल नहीं किया गया।
DMF का उद्देश्य खनन प्रभावित क्षेत्रों और वहां रहने वाले लोगों के हित में विकास कार्यों को सहायता देना है। याचिका में मांग की गई है कि इन निधियों के उपयोग और कथित अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच कर जवाबदेही तय की जाए।
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याचिका में सरकार से क्या मांग की गई?
याचिकाकर्ता अजब लाल लिल्हारे ने बच्चों की मौतों और स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति को संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 तथा राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों के अनुच्छेद 39(f) और 47 से जुड़ा विषय बताया है।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से कई निर्देश देने का अनुरोध किया गया है:
- गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्रों को महामारी रोग अधिनियम, 1897 के तहत महामारी की आशंका वाले क्षेत्र घोषित करने पर विचार किया जाए।
- प्रभावित परिवारों को स्वच्छ पेयजल, आपातकालीन पोषण सामग्री और आवश्यक राहत तत्काल उपलब्ध कराई जाए।
- धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान सहित आदिवासी कल्याण योजनाओं का प्रभावी और व्यापक क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए।
- बच्चों की मौतों के मामलों में जवाबदेही तय करने के लिए स्वतंत्र व्यवस्था बनाई जाए।
- मृत बच्चों के परिवारों को कानून के अनुसार मुआवजा देने के लिए निर्देश जारी किए जाएं।
फिलहाल ये याचिकाकर्ता की मांगें हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी मांगों को स्वीकार कर लिया है, ऐसा निष्कर्ष निकालना अभी उचित नहीं होगा।
Supreme Court Child Malnutrition मामला आदिवासी क्षेत्रों में बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन से जुड़े गंभीर सवाल उठाता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र और संबंधित राज्यों को नोटिस जारी किए जाने के बाद अब उनके जवाब महत्वपूर्ण होंगे। आगे की न्यायिक कार्यवाही से यह स्पष्ट हो सकेगा कि प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमियों, पोषण सामग्री की आपूर्ति और DMF फंड के उपयोग से जुड़े आरोपों पर क्या कदम उठाए जाते हैं। बच्चों को समय पर पोषण, टीकाकरण और चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।
