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Hasdeo Coal Mining को पर्यावरण मंजूरी, हसदेव अरण्य में 4.48 लाख पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव

Hasdeo Coal Mining परियोजना को केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से पर्यावरणीय मंजूरी (Environmental Clearance) मिल गई है। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले स्थित हसदेव अरण्य (Hasdeo Arand) के Kente Extension Integrated Coal Block में प्रस्तावित इस परियोजना के तहत प्रतिवर्ष लगभग 90 लाख टन (9 मिलियन टन) कोयले का उत्पादन किया जाएगा।

परियोजना को 24 जून 2026 को पर्यावरणीय मंजूरी मिली, जबकि इससे पहले 9 जून 2026 को इसे वन स्वीकृति (In-Principle Forest Clearance) भी प्रदान की गई थी। यह हसदेव अरण्य में मंजूरी पाने वाली तीसरी बड़ी कोयला खनन परियोजना है।

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Hasdeo Coal Mining परियोजना क्या है?

Hasdeo Coal Mining के तहत सरगुजा जिले में लगभग 1,760 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले Kente Extension Integrated Coal Block का विकास किया जाएगा।

यह कोयला ब्लॉक वर्ष 2015 में Rajasthan Rajya Vidyut Utpadan Limited (RRVUNL) को आवंटित किया गया था। परियोजना में Adani Group खान डेवलपर एवं ऑपरेटर की भूमिका निभा रहा है। यहां से निकाला जाने वाला कोयला राजस्थान के छबड़ा और सूरतगढ़ ताप विद्युत संयंत्रों तक पहुंचाया जाएगा।

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Hasdeo Coal Mining से 4.48 लाख पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव

इस परियोजना का सबसे चर्चित पहलू बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र का उपयोग है।

आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार—

  • लगभग 1,742.6 हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन होगा।
  • करीब 4.48 लाख पेड़ों की चरणबद्ध कटाई प्रस्तावित है।
  • पहले पांच वर्षों में लगभग 98,000 पेड़ काटे जाएंगे।
  • छठे से दसवें वर्ष के बीच लगभग 60,000 अतिरिक्त पेड़ों की कटाई की जाएगी।
  • राज्य सरकार को 67,414 छोटे पेड़ों (60 सेमी से कम घेर वाले) के प्रतिरोपण (Translocation) का निर्देश दिया गया है।
  • पेड़ों की कटाई केवल परियोजना की आवश्यकता के अनुसार चरणबद्ध तरीके से होगी।

Hasdeo Coal Mining का वन्यजीव और जैव विविधता पर असर

Hasdeo Coal Mining को लेकर पर्यावरण विशेषज्ञों ने पहले भी चिंता जताई है।

वर्ष 2021 में Wildlife Institute of India (WII) द्वारा किए गए जैव विविधता अध्ययन में सिफारिश की गई थी कि हसदेव अरण्य में पहले से संचालित Parsa East Kente Basan (PEKB) खदान के अलावा नई खनन गतिविधियों से बचा जाना चाहिए, क्योंकि इससे जैव विविधता पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

हसदेव अरण्य लगभग 1,502 वर्ग किलोमीटर में फैला मध्य भारत का सबसे बड़ा अविभाजित वन क्षेत्र माना जाता है। यहां घने साल और सागौन के जंगल हैं तथा हाथी, तेंदुआ, बाघ सहित कई दुर्लभ वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास और महत्वपूर्ण वन्यजीव गलियारा मौजूद है।

भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) ने भी अपनी रिपोर्ट में सतही जल प्रबंधन, वन संरक्षण और जैव विविधता सुरक्षा के लिए कड़े पर्यावरणीय उपाय लागू करने की सिफारिश की थी।

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स्थानीय आदिवासी समुदाय और विपक्ष का विरोध

Hasdeo Coal Mining परियोजना का स्थानीय आदिवासी समुदायों और कांग्रेस पार्टी ने विरोध किया है।

विरोध करने वालों का कहना है कि बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई से पर्यावरण, वन्यजीवों और स्थानीय लोगों की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। उनका तर्क है कि हसदेव अरण्य केवल वन क्षेत्र नहीं बल्कि हजारों आदिवासी परिवारों की सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान भी है।

हालांकि परियोजना को सभी आवश्यक वैधानिक स्वीकृतियां मिलने के बाद आगे बढ़ाया जा रहा है।


56 परिवार होंगे प्रभावित, पुनर्वास की तैयारी

परियोजना से सरगुजा जिले की उदयपुर तहसील के केंते, बसान, चकेरी और परोगिया गांवों के 56 परिवार प्रभावित होंगे।

सरकारी दस्तावेजों के अनुसार इन परिवारों का पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन राज्य सरकार द्वारा स्वीकृत राहत एवं पुनर्वास योजना के तहत किया जाएगा।


Hasdeo Coal Mining परियोजना छत्तीसगढ़ के ऊर्जा और औद्योगिक विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि इससे प्रतिवर्ष 9 मिलियन टन कोयले का उत्पादन होने की संभावना है। वहीं दूसरी ओर, 4.48 लाख पेड़ों की प्रस्तावित कटाई, जैव विविधता पर संभावित प्रभाव और स्थानीय समुदायों की चिंताओं के कारण यह परियोजना पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन को लेकर राष्ट्रीय बहस का विषय बनी हुई है। आने वाले समय में Hasdeo Coal Mining परियोजना का सफल क्रियान्वयन इस बात पर निर्भर करेगा कि पर्यावरणीय शर्तों और पुनर्वास योजनाओं का कितना प्रभावी ढंग से पालन किया जाता है।

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