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छत्तीसगढ़ में Cyber Fraud: 50 दिन में 2 करोड़ लोगों तक पहुंचा संदेश, फिर भी ठगी जारी

छत्तीसगढ़ में Cyber Fraud रोकने के लिए पुलिस ने 15 अगस्त से 2 अक्टूबर 2026 तक 50 दिनों का जागरूकता अभियान चलाया। पुलिस के मुताबिक, इस दौरान प्रदेशभर में करीब 2 करोड़ लोगों तक साइबर सुरक्षा का संदेश पहुंचाया गया। इसके बावजूद ऑनलाइन ठगी के मामले सामने आते रहे। अभियान के दौरान प्रदेश में साइबर क्राइम पोर्टल पर कुल 5,220 शिकायतें दर्ज हुईं।

रायपुर में ही 955 से अधिक शिकायतें दर्ज की गईं। इनमें डिजिटल अरेस्ट, APK फाइल के जरिए ठगी और अन्य ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामले शामिल हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि जागरूकता बढ़ने के बावजूद साइबर अपराध से निपटने के लिए लगातार सतर्कता और प्रभावी कार्रवाई की जरूरत है।

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1. छत्तीसगढ़ में Cyber Fraud की 5,220 शिकायतें

पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, 50 दिन के अभियान के दौरान प्रदेशभर से साइबर ठगी की 5,220 शिकायतें पोर्टल पर पहुंचीं। इनमें करीब 20 प्रतिशत मामलों में एफआईआर दर्ज की गई। बाकी शिकायतों पर जांच या आगे की कार्रवाई की स्थिति अलग-अलग हो सकती है।

रायपुर में लगभग 21 प्रतिशत शिकायतों पर केस दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई है। इससे स्पष्ट होता है कि शिकायत दर्ज होने और आपराधिक मामले में एफआईआर दर्ज होने के बीच अंतर है।

रायपुर पुलिस कमिश्नरेट क्षेत्र में 4.12 लाख लोगों और ग्रामीण क्षेत्र में 50 हजार से अधिक लोगों को जागरूक किया गया। स्कूल-कॉलेज, बैंक, महिला समूह, वरिष्ठ नागरिक और युवाओं को अभियान से जोड़ा गया।

रिपोर्ट के मुताबिक, रायपुर में हर साल साइबर ठगी की चार हजार से अधिक शिकायतें आती हैं, जबकि इनमें केवल 100 से 120 मामलों में एफआईआर दर्ज होने की जानकारी दी गई है। इन आंकड़ों के संदर्भ में शिकायतों की प्रकृति, जांच की स्थिति और एफआईआर दर्ज करने के आधार को समझना भी जरूरी है।

2. रायपुर में डिजिटल अरेस्ट और APK फाइल से ठगी

डिजिटल अरेस्ट के नाम पर बुजुर्ग महिला से 7 लाख की ठगी

नर्मदापारा की 62 वर्षीय रीता खन्ना को ठग ने महाराष्ट्र का एनआईए अधिकारी विक्रम सिंह बनकर संपर्क किया। आरोपी ने उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में फंसाने की धमकी दी और पांच दिनों तक वीडियो कॉल पर रखा। इस दौरान उनसे 7 लाख रुपये ठग लिए गए।

डिजिटल अरेस्ट के ऐसे मामलों में अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई, एनआईए या किसी अन्य जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं। वे गिरफ्तारी या कानूनी कार्रवाई का भय दिखाकर पैसे ट्रांसफर करने का दबाव बनाते हैं।

फर्जी अधिकारियों ने कारोबारी दंपती को बनाया निशाना

उरकुरा के 64 वर्षीय कारोबारी देवसिंह साहू और उनकी पत्नी को भी ठगों ने निशाना बनाया। आरोपियों ने खुद को सीबीआई और आईपीएस अधिकारी बताकर उन्हें 6.80 करोड़ रुपये की मनी लॉन्ड्रिंग में फंसाने का डर दिखाया।

बताई गई जानकारी के अनुसार, 44 दिनों के दौरान उनसे 8.50 लाख रुपये ठगे गए। रकम जुटाने के लिए परिवार को जेवर तक बेचने पड़े। यह मामला बताता है कि लंबे समय तक डर और दबाव बनाए रखकर पीड़ितों को आर्थिक नुकसान पहुंचाया जा सकता है।

APK फाइल से खातों से निकाले 8.15 लाख रुपये

साइबर ठगी का दूसरा तरीका मोबाइल पर APK फाइल भेजना है। एक कारोबारी को नेवता और एक रिटायर बैंककर्मी को पेंशन कार्ड के नाम पर ऐसी फाइल भेजी गई। इसके बाद दोनों के खातों से कुल 8.15 लाख रुपये निकाल लिए गए।

अनजान नंबर से आई APK फाइल इंस्टॉल करने पर मोबाइल की सुरक्षा और निजी जानकारी खतरे में पड़ सकती है। इसलिए किसी भी अनजान लिंक या फाइल को खोलने से पहले उसके स्रोत की पुष्टि करना जरूरी है।

3. Cyber Fraud जागरूकता अभियान में किस पर रहा फोकस?

पुलिस ने अलग-अलग वर्गों की जरूरतों के अनुसार जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए। इसका उद्देश्य लोगों को ऑनलाइन धोखाधड़ी के तरीकों और उनसे बचने के उपायों की जानकारी देना था।

  • स्कूल-कॉलेज: डिजिटल सतर्कता और बुनियादी साइबर सुरक्षा।
  • बैंक और वित्तीय संस्थान: वित्तीय धोखाधड़ी तथा यूपीआई सुरक्षा।
  • वरिष्ठ नागरिक: डिजिटल अरेस्ट और फर्जी अधिकारी बनकर आने वाली कॉल से बचाव।
  • महिला समूह: स्मार्टफोन की गोपनीयता और सुरक्षित ब्राउजिंग।
  • युवा: नौकरी के नाम पर ठगी और फिशिंग से सुरक्षा।
  • आम नागरिक: डेटा गोपनीयता और सोशल मीडिया सुरक्षा।
  • गांव और निकाय: साइबर अपराध के प्रति जागरूकता और सामूहिक सतर्कता।

इन कार्यक्रमों का असर तभी व्यापक होगा, जब लोग सीखी गई सावधानियों को रोजमर्रा के डिजिटल लेन-देन में अपनाएंगे।

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4. साइबर विशेषज्ञ ने कार्रवाई पर उठाए सवाल

साइबर क्राइम एक्सपर्ट मुकेश चौधरी के मुताबिक, केवल बैंक खाते उपलब्ध कराने वालों पर कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है। ऐसा करने से साइबर ठगी के पीछे मौजूद मुख्य आरोपियों और मास्टरमाइंड तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है।

डिजिटल अरेस्ट के मामलों में फर्जी नोटिस, जांच एजेंसियों का नाम और गिरफ्तारी का डर इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे मामलों की जांच में पैसों के लेन-देन, डिजिटल साक्ष्यों और विदेशी नेटवर्क की पड़ताल महत्वपूर्ण है।

विशेषज्ञ ने एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय, आईटी कानून की समीक्षा और नियमित जन-जागरूकता की जरूरत पर भी जोर दिया। साइबर अपराधियों के बदलते तरीकों को देखते हुए जांच और रोकथाम की रणनीति को लगातार बेहतर बनाना जरूरी है।

5. Cyber Fraud से बचने के तीन जरूरी उपाय

साइबर ठगी से बचाव के लिए जानकारी, जागरूकता और सतर्कता सबसे अहम हैं। लालच, डर, जल्दबाजी और बिना सत्यापन के भरोसा करना लोगों को ठगों के जाल में फंसा सकता है।

1. जानकारी: किसी भी कॉल पर आंख बंद करके भरोसा न करें

कोई व्यक्ति खुद को पुलिस, सीबीआई, एनआईए या बैंक अधिकारी बताकर धमकाए, तो घबराकर पैसे ट्रांसफर न करें। उसकी पहचान की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करें। याद रखें, केवल वीडियो कॉल या वर्दी देखकर किसी की पहचान प्रमाणित नहीं होती।

2. जागरूकता: अनजान APK फाइल इंस्टॉल न करें

पेंशन, बैंक अपडेट, शादी के निमंत्रण, नौकरी या सरकारी योजना के नाम पर भेजी गई अनजान APK फाइल डाउनलोड करने से बचें। बैंकिंग जानकारी, ओटीपी, पासवर्ड और स्क्रीन शेयर करने की अनुमति किसी अनजान व्यक्ति को न दें।

3. सतर्कता: ठगी होने पर तुरंत शिकायत करें

अगर खाते से संदिग्ध लेन-देन हो जाए, तो तुरंत अपने बैंक से संपर्क करें और भारत के साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 पर शिकायत करें। आधिकारिक पोर्टल https://cybercrime.gov.in पर भी शिकायत दर्ज की जा सकती है। जल्दी कार्रवाई करने से रकम रोकने या वापस मिलने की संभावना बेहतर हो सकती है, हालांकि इसकी गारंटी नहीं है।

छत्तीसगढ़ में 50 दिनों के साइबर जागरूकता अभियान के दौरान करीब 2 करोड़ लोगों तक संदेश पहुंचने के बावजूद 5,220 शिकायतें दर्ज होना बताता है कि Cyber Fraud के खिलाफ लड़ाई अभी जारी है। डिजिटल अरेस्ट, फर्जी अधिकारी बनकर धमकाना और APK फाइल के जरिए ठगी जैसे तरीकों से बचने के लिए लोगों को जागरूक रहने के साथ तकनीकी सावधानियां भी अपनानी होंगी। पुलिस, बैंक और जांच एजेंसियों के समन्वय तथा समय पर शिकायत से साइबर अपराध पर अंकुश लगाने में मदद मिल सकती है।

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