Chhattisgarh Vaidya Certification के तहत राज्य के छह जिलों में 312 वैद्यों का प्रमाणीकरण किया गया है। छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड द्वारा 25 सितंबर से 30 सितंबर 2026 तक अलग-अलग जिलों में यह प्रमाणीकरण प्रक्रिया आयोजित की गई।
इस अभियान का उद्देश्य स्थानीय और आदिवासी स्वास्थ्य परंपराओं से जुड़े वैद्यों की उपचार संबंधी दक्षता का परीक्षण कर उनका प्रमाणीकरण करना है। प्रक्रिया में वैद्यों के उपचार ज्ञान, औषधीय पौधों की पहचान और मरीजों को दी जाने वाली औषधि की जानकारी को परखा गया।
यह पहल छत्तीसगढ़ में प्रचलित पारंपरिक स्वास्थ्य परंपराओं से जुड़े ज्ञान को व्यवस्थित तरीके से प्रमाणित करने की दिशा में की जा रही है।
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Chhattisgarh Vaidya Certification की प्रक्रिया
छत्तीसगढ़ शासन के वन विभाग के अंतर्गत कार्यरत बोर्ड ने वैद्यों के प्रमाणीकरण के लिए Quality Council of India (QCI) से अधिकृत संस्था Center for Trade Testing and Certification of Skilled Workers (CTTC) के माध्यम से परीक्षण कराया।
प्रमाणीकरण प्रक्रिया को दो चरणों में रखा गया है। इसमें वैद्य के सैद्धांतिक ज्ञान के साथ-साथ उनके वास्तविक उपचार कार्य और मरीजों से जुड़े अनुभव को भी परीक्षण का हिस्सा बनाया गया।
इससे केवल मौखिक जानकारी के आधार पर प्रमाणीकरण करने के बजाय उपचार की व्यावहारिक क्षमता को भी जांचने का प्रयास किया गया।
पांच उपचार विधाओं में हुआ परीक्षण
Chhattisgarh Vaidya Certification के दौरान वैद्यों की पांच प्रकार की उपचार विधाओं से संबंधित दक्षता का परीक्षण किया गया। इनमें सामान्य बीमारी, पीलिया, आर्थराइटिस, बोन सेटिंग और जहरीले बाइट का उपचार शामिल है।
परीक्षण के दौरान वैद्यों से उनके उपचार के तरीकों और इस्तेमाल की जाने वाली औषधियों से संबंधित जानकारी ली गई। ताजी औषधीय वनस्पतियों और कच्चे औषधीय वन उत्पादों की पहचान भी कराई गई।
इसके अलावा औषधि तैयार करने की विधि तथा मरीजों को दी जाने वाली औषधि की मात्रा से संबंधित जानकारी का भी परीक्षण किया गया।
दो चरणों में वैद्यों की जांच
प्रमाणीकरण का पहला चरण परीक्षण केंद्र पर आयोजित किया गया। इसमें आवेदन फॉर्म की जांच के साथ वैद्यों का मौखिक परीक्षण किया गया।
इसके बाद ताजी औषधीय पौध सामग्री और कच्चे औषधीय उत्पादों की पहचान, औषधि निर्माण की विधि तथा मरीजों को दी जाने वाली मात्रा से संबंधित जानकारी को परखा गया।
प्रमाणीकरण का दूसरा चरण अधिक व्यावहारिक था। इसमें परीक्षण टीम वैद्यों के घर पहुंची और उनके उपचार करने की प्रक्रिया का सजीव परीक्षण किया गया।
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साथ ही उपचार लेने वाले मरीजों से फीडबैक भी लिया गया। इस प्रक्रिया का उद्देश्य वैद्य की वास्तविक उपचार पद्धति और उसके व्यावहारिक अनुभव का आकलन करना था।
छह जिलों में 312 वैद्य प्रमाणित
25 से 30 सितंबर के बीच आयोजित प्रमाणीकरण प्रक्रिया में छह जिलों के कुल 312 वैद्यों को प्रमाणित किया गया।
जिलेवार आंकड़ों के अनुसार, कोंडागांव में 60, नारायणपुर में 23, कांकेर में 60 और धमतरी में 135 वैद्यों का प्रमाणीकरण हुआ।
वहीं गरियाबंद और महासमुंद में मिलाकर कुल 34 वैद्यों को प्रमाणित किया गया। इस तरह छह जिलों में प्रमाणीकरण की कुल संख्या 312 रही।
मार्च 2027 तक 1 हजार वैद्यों का लक्ष्य
छत्तीसगढ़ शासन और संबंधित बोर्ड ने पारंपरिक स्वास्थ्य परंपरा से जुड़े और अधिक वैद्यों को प्रमाणित करने का लक्ष्य तय किया है।
सरकार के अनुसार, मार्च 2027 तक 1 हजार वैद्यों के प्रमाणीकरण का लक्ष्य पूरा करने के लिए प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है।
आने वाले महीनों में अन्य जिलों में भी वैद्यों के परीक्षण और प्रमाणीकरण की प्रक्रिया आयोजित की जा सकती है। इसका उद्देश्य राज्य में स्थानीय स्वास्थ्य परंपराओं से जुड़े वैद्यों की पहचान और उनकी उपचार संबंधी दक्षता के प्रमाणीकरण को आगे बढ़ाना है।
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Chhattisgarh Vaidya Certification अभियान के तहत छह जिलों के 312 वैद्यों का प्रमाणीकरण राज्य की स्थानीय और आदिवासी स्वास्थ्य परंपराओं से जुड़े महत्वपूर्ण कदम के रूप में सामने आया है। दो चरणों की प्रक्रिया में मौखिक ज्ञान से लेकर औषधीय पौधों की पहचान और वास्तविक उपचार पद्धति तक का परीक्षण किया गया। अब छत्तीसगढ़ शासन और बोर्ड का लक्ष्य मार्च 2027 तक 1 हजार वैद्यों का प्रमाणीकरण पूरा करना है।
