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Chhattisgarh Mining: 100 साल के सफर में दंतेवाड़ा का गुमियापाल बना नई बहस का केंद्र

Chhattisgarh Mining के इतिहास में वर्ष 2026 एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। वर्ष 1926 में तत्कालीन कोरिया रियासत के झगराखंड कोलियरी से खनन की शुरुआत हुई थी। अब सौ वर्ष पूरे होने के बीच दंतेवाड़ा जिले के गुमियापाल गांव में फिर से खनन गतिविधियां शुरू होने के साथ रोजगार, विकास, पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों को लेकर नई बहस छिड़ गई है। माओवादी प्रभाव कम होने के बाद क्षेत्र में खनन गतिविधियों को गति मिली है, लेकिन ग्रामीणों और विशेषज्ञों का कहना है कि स्थानीय हितों की सुरक्षा के लिए मजबूत समझौते की जरूरत है।

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Chhattisgarh Mining के 100 साल: संघर्ष और विकास का सफर

छत्तीसगढ़ में खनन की शुरुआत वर्ष 1926 में झगराखंड कोलियरी से हुई थी।

पिछले 100 वर्षों में खनिज संपदा ने राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी, लेकिन इसके साथ भूमि अधिग्रहण, विस्थापन, पर्यावरणीय प्रभाव और आदिवासी अधिकारों को लेकर कई विवाद भी सामने आए। विशेष रूप से बस्तर क्षेत्र लंबे समय तक इन मुद्दों का केंद्र रहा।

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गुमियापाल में फिर शुरू हुआ खनन

दंतेवाड़ा जिले का गुमियापाल गांव कुछ समय पहले तक माओवादी प्रभाव वाले क्षेत्रों में शामिल था।

वर्ष 2017 में आरती स्पंज (Aarti Sponge) को गुमियापाल पंचायत के अंतर्गत तुलारमेटा पहाड़ियों की 31.55 हेक्टेयर भूमि पर खनन पट्टा मिला था। हालांकि, माओवादी विरोध के कारण कंपनी खनन शुरू नहीं कर सकी।

माओवादी प्रभाव कम होने के बाद अब कंपनी ने स्थानीय ग्रामीणों के साथ संवाद के बाद खनन कार्य शुरू कर दिया है।

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Chhattisgarh Mining: ग्रामीणों और कंपनी के बीच हुआ MoU

गुमियापाल के मल्ला मोइटर ग्राम विकास समिति ने कंपनी के साथ हुए समझौता ज्ञापन (MoU) को जिला कलेक्टर के समक्ष प्रस्तुत किया।

समझौते के अनुसार, कंपनी अपनी कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) राशि का 10 प्रतिशत ग्राम समिति को उपलब्ध कराएगी।

इसके साथ ही खनन कार्यों की निगरानी के लिए एक ग्राम समिति का भी गठन किया गया है।


MoU में किन बातों की कमी बताई जा रही है?

विशेषज्ञों और स्थानीय जानकारों का मानना है कि मौजूदा MoU में कई महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल नहीं हैं।

मुख्य चिंताएं इस प्रकार हैं—

  • रॉयल्टी में ग्रामीणों की हिस्सेदारी का स्पष्ट प्रावधान नहीं।
  • उत्पादन आधारित लाभ साझा करने की व्यवस्था का अभाव।
  • स्थानीय युवाओं को रोजगार की गारंटी नहीं।
  • कौशल विकास (Skill Development) पर स्पष्ट योजना नहीं।
  • ग्राम समिति की सिफारिशों को लागू करने की बाध्यता तय नहीं।

विशेषज्ञों का सुझाव है कि इन प्रावधानों को जोड़कर स्थायी ग्राम विकास निधि (Village Development Fund) बनाई जा सकती है।


रोजगार की उम्मीद, लेकिन दीर्घकालिक हितों पर चिंता

फिलहाल गांव के कई लोगों का कहना है कि खनन शुरू होने से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़े हैं।

इससे आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में मौसमी पलायन करने वाले कई ग्रामीणों को अपने गांव के पास ही काम मिलने की संभावना बनी है।

हालांकि, सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि केवल रोजगार पर्याप्त नहीं है। पर्यावरण संरक्षण, जल स्रोतों की सुरक्षा, स्थानीय अधिकार और भविष्य की आर्थिक भागीदारी को भी समान महत्व मिलना चाहिए।

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प्रशासन से मजबूत समझौते की उम्मीद

स्थानीय स्तर पर यह अपेक्षा जताई जा रही है कि जिला प्रशासन कंपनी और ग्रामीणों के बीच हुए समझौते को और मजबूत बनाने में सहयोग करेगा।

यदि समझौते में रॉयल्टी, स्थानीय रोजगार, कौशल विकास और पर्यावरण संरक्षण जैसे प्रावधान शामिल किए जाते हैं, तो यह मॉडल अन्य खनन क्षेत्रों के लिए भी उदाहरण बन सकता है।


Chhattisgarh Mining के 100 वर्षों का सफर विकास और चुनौतियों दोनों का गवाह रहा है। दंतेवाड़ा के गुमियापाल में खनन शुरू होने से स्थानीय रोजगार की उम्मीद जरूर बढ़ी है, लेकिन दीर्घकालिक विकास के लिए ग्रामीणों के अधिकारों, पर्यावरण संरक्षण और लाभों की पारदर्शी साझेदारी सुनिश्चित करना आवश्यक होगा। मजबूत और संतुलित समझौता ही खनन और स्थानीय विकास के बीच बेहतर संतुलन स्थापित कर सकता है।

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