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Chhattisgarh High Court School Prayer: सरकारी स्कूलों में हिंदू प्रार्थना पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Chhattisgarh High Court School Prayer मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि सरकारी स्कूलों में किसी भी छात्र को किसी विशेष धार्मिक प्रार्थना का पाठ करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालत का यह रुख संविधान में दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता और अंतरात्मा की स्वतंत्रता के अधिकार को मजबूत करने वाला माना जा रहा है।

यह मामला राज्य सरकार के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें सरकारी स्कूलों की प्रार्थना सभा और मध्याह्न भोजन से पहले तथा छुट्टी के समय कुछ वैदिक और हिंदू मंत्रों के पाठ का निर्देश दिया गया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी।

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Chhattisgarh High Court School Prayer मामले में क्या था विवाद?

विवाद की शुरुआत स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा 12 जून 2026 को जारी एक सर्कुलर से हुई थी। इस निर्देश के अनुसार सरकारी स्कूलों में सुबह की प्रार्थना सभा में दीप मंत्र, सरस्वती वंदना और गुरु मंत्र का पाठ कराया जाना था।

इसके अलावा दोपहर के भोजन से पहले भोजन मंत्र और छुट्टी के समय गायत्री मंत्र एवं शांति मंत्र पढ़ाने का भी प्रावधान रखा गया था। इन निर्देशों को लेकर विभिन्न सामाजिक संगठनों और अल्पसंख्यक समुदायों ने आपत्ति जताई।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि सरकारी स्कूल धर्मनिरपेक्ष संस्थान हैं और किसी विशेष धर्म की प्रार्थना अनिवार्य कराना संविधान की भावना के विपरीत है।


Chhattisgarh High Court School Prayer पर सरकार का पक्ष

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि संबंधित आदेश को अभी पूरी तरह लागू नहीं किया गया है।

सरकार ने यह भी कहा कि इस पहल का उद्देश्य छात्रों में अनुशासन, नैतिक मूल्य, भारतीय संस्कृति और राष्ट्रप्रेम की भावना विकसित करना है। सरकार के अनुसार यह किसी धर्म विशेष को बढ़ावा देने का प्रयास नहीं बल्कि सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने की पहल थी।

हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी छात्र को उसकी इच्छा के विरुद्ध धार्मिक प्रार्थना के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

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याचिकाकर्ताओं ने क्या तर्क दिए?

याचिका पूर्व छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड अध्यक्ष अब्दुल सलाम रिजवी, पूर्व अल्पसंख्यक विभाग अध्यक्ष महेंद्र छाबड़ा तथा सामाजिक कार्यकर्ता शफीक अहमद की ओर से दायर की गई थी।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि सरकारी स्कूलों में केवल एक धर्म से जुड़े मंत्रों को अनिवार्य करना संविधान के अनुच्छेद 25 और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के खिलाफ है।

उन्होंने यह भी कहा कि आदेश में उन छात्रों के लिए कोई विकल्प (Opt-out) नहीं दिया गया था जो धार्मिक कारणों से इन प्रार्थनाओं में शामिल नहीं होना चाहते।


Chhattisgarh High Court School Prayer आदेश में अदालत की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि किसी भी छात्र को हिंदू प्रार्थना या किसी अन्य धार्मिक अनुष्ठान में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि भविष्य में किसी छात्र पर जबरन धार्मिक प्रार्थना पढ़ने का दबाव बनाया जाता है तो प्रभावित पक्ष दोबारा न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।

इस टिप्पणी को छात्रों की धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


फैसले का सरकारी स्कूलों पर क्या असर होगा?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश भविष्य में सरकारी स्कूलों में धार्मिक गतिविधियों से जुड़े मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है।

यदि किसी सरकारी संस्थान में किसी धर्म विशेष की प्रार्थना को अनिवार्य बनाया जाता है तो इस फैसले का हवाला दिया जा सकता है।

हालांकि अदालत ने राज्य सरकार के मूल सर्कुलर को निरस्त नहीं किया, लेकिन छात्रों को मजबूर न किए जाने की स्पष्ट व्यवस्था को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी आईं सामने

इस मुद्दे पर कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने पहले ही सरकार के आदेश का विरोध किया था। वहीं कुछ सामाजिक संगठनों ने भी इसे संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के विपरीत बताया।

दूसरी ओर सरकार का कहना है कि उसका उद्देश्य भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों को शिक्षा के साथ जोड़ना है।


Chhattisgarh High Court School Prayer मामले में हाईकोर्ट की टिप्पणी संविधान में निहित धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के सिद्धांत को मजबूती देती है। अदालत ने साफ किया है कि सरकारी स्कूलों में किसी भी छात्र को किसी विशेष धर्म की प्रार्थना करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। आने वाले समय में यदि इस तरह के निर्देश लागू किए जाते हैं तो यह फैसला महत्वपूर्ण कानूनी आधार बन सकता है।

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