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Chhattisgarh High Court का बड़ा फैसला

Chhattisgarh High Court ने सूचना के अधिकार यानी RTI Act, 2005 के तहत लोक सूचना अधिकारी (PIO) पर लगाई गई ₹25,000 की पेनल्टी को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि RTI Act की धारा 20 के तहत दंड लगाने के लिए केवल सूचना उपलब्ध नहीं कराना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह स्पष्ट रूप से स्थापित होना चाहिए कि सूचना जानबूझकर और mala fide तरीके से रोकी गई थी।

यह फैसला जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने सुनाया। कोर्ट ने माना कि संबंधित मामले में लोक सूचना अधिकारी की ओर से सूचना रोकने के पीछे कोई mala fide या जानबूझकर किया गया कृत्य साबित नहीं हुआ।

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Chhattisgarh High Court में क्या था पूरा मामला?

मामला ग्राम पंचायत पचहेड़ा से जुड़ा था। RTI आवेदक ने वित्तीय वर्ष 2014-15 से 2020-21 तक की अवधि से संबंधित कुछ सूचनाएं मांगी थीं।

सूचना नहीं मिलने का आरोप लगाते हुए आवेदक ने पहले प्रथम अपील दायर की और बाद में छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग का भी रुख किया। राज्य सूचना आयोग ने माना कि सूचना उचित कारण के बिना रोकी गई और इसके बाद संबंधित PIO पर RTI Act की धारा 20(1) के तहत ₹25,000 की पेनल्टी लगा दी गई।

इसके खिलाफ PIO ने Chhattisgarh High Court में रिट याचिका दाखिल की। याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क था कि पेनल्टी लगाने के आदेश में सूचना रोकने के लिए किसी mala fide या जानबूझकर किए गए कृत्य की स्पष्ट finding दर्ज नहीं की गई थी।

RTI Act की धारा 20 पर Chhattisgarh High Court की टिप्पणी

कोर्ट ने RTI Act की धारा 20 के प्रावधानों को महत्वपूर्ण माना। अदालत के अनुसार, PIO पर पेनल्टी लगाने के लिए यह स्पष्ट निष्कर्ष होना जरूरी है कि संबंधित अधिकारी ने सूचना को जानबूझकर या mala fide तरीके से रोका था।

कोर्ट ने कहा कि यदि आदेश में ऐसी स्पष्ट finding और उसके समर्थन में ठोस कारण दर्ज नहीं हैं, तो धारा 20 के तहत पेनल्टी कायम नहीं रखी जा सकती।

RTI Act के तहत धारा 20 में PIO पर दंड लगाने के साथ-साथ कुछ परिस्थितियों में अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश का भी प्रावधान है। इसलिए ऐसी कार्रवाई करते समय वैधानिक शर्तों का पालन जरूरी है।

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₹25,000 की पेनल्टी क्यों हुई रद्द?

Chhattisgarh High Court ने मामले के रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद पाया कि संबंधित PIO के खिलाफ mala fide या deliberate failure का पर्याप्त आधार नहीं था।

अदालत ने स्पष्ट किया कि महज यह तथ्य कि किसी आवेदक को मांगी गई सूचना नहीं मिली या सूचना उपलब्ध कराने में समस्या हुई, अपने आप में धारा 20 के तहत अधिकतम पेनल्टी लगाने का आधार नहीं बन जाता।

कोर्ट ने कहा कि पेनल्टी जैसे दंडात्मक प्रावधान को लागू करने के लिए आवश्यक वैधानिक परिस्थितियों और अधिकारी की मंशा पर स्पष्ट निष्कर्ष होना चाहिए। इसी आधार पर अदालत ने 7 नवंबर 2023 के राज्य सूचना आयोग के आदेश को रद्द कर दिया।

PIO और RTI आवेदकों के लिए फैसले का मतलब

यह फैसला लोक सूचना अधिकारियों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि RTI मामलों में पेनल्टी लगाने की प्रक्रिया केवल सूचना में कमी या देरी के आधार पर स्वतः लागू नहीं की जा सकती। संबंधित प्राधिकारी को कानून में निर्धारित परिस्थितियों की स्पष्ट जांच करनी होगी।

वहीं, RTI आवेदकों के अधिकार भी इस फैसले से प्रभावित नहीं होते। सूचना का अधिकार कानून नागरिकों को सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण माध्यम देता है। लेकिन PIO के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई के लिए कानून में निर्धारित शर्तों का पालन भी उतना ही जरूरी है।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट इससे पहले भी RTI Act की धारा 20 के संदर्भ में यह रेखांकित कर चुका है कि पेनल्टी लगाने से पहले वैधानिक प्रक्रिया और आवश्यक निष्कर्षों का पालन होना चाहिए। जुलाई 2026 में अदालत ने एक अन्य मामले में कहा था कि First Appellate Authority को कुछ आवश्यक वैधानिक शर्तें पूरी किए बिना deemed PIO मानकर धारा 20(1) के तहत दंडित नहीं किया जा सकता।

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फैसले का व्यापक कानूनी असर

इस फैसले से RTI Act के तहत जवाबदेही और दंडात्मक कार्रवाई के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी संदेश जाता है। PIO की जिम्मेदारी सूचना उपलब्ध कराने की है, लेकिन किसी अधिकारी पर व्यक्तिगत दंड लगाने से पहले यह देखना जरूरी है कि कानून में निर्धारित आधार वास्तव में मौजूद हैं या नहीं।

Chhattisgarh High Court का यह फैसला भविष्य में उन मामलों में भी संदर्भ के रूप में देखा जा सकता है, जहां राज्य सूचना आयोग द्वारा धारा 20 के तहत PIO पर पेनल्टी लगाने का आदेश चुनौती दिया जाता है।

Chhattisgarh High Court ने RTI Act की धारा 20 के तहत ₹25,000 की पेनल्टी रद्द करते हुए साफ किया है कि PIO पर दंड लगाने के लिए सूचना को जानबूझकर और mala fide तरीके से रोकने की स्पष्ट और ठोस finding जरूरी है। यह फैसला RTI व्यवस्था में पारदर्शिता के साथ-साथ प्राकृतिक न्याय और वैधानिक प्रक्रिया के महत्व को भी रेखांकित करता है।

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