Chhattisgarh High Court का ऐतिहासिक फैसला: Family Court को नहीं मिलेगा दिव्यांग का Guardian बनाने का अधिकार — जानें 3 अहम बातें

Chhattisgarh High Court ने एक ऐतिहासिक और दूरगामी फैसले में स्पष्ट किया है कि Family Court को मानसिक दिव्यांगता से पीड़ित व्यक्ति का संरक्षक (Guardian) नियुक्त करने का कोई अधिकार नहीं है।

रायपुर स्थित Chhattisgarh High Court की खंडपीठ ने यह निर्णय National Trust for Welfare of Persons with Autism, Cerebral Palsy, Mental Retardation and Multiple Disabilities Act, 1999 की व्याख्या करते हुए दिया।

यह फैसला न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे भारत में दिव्यांग व्यक्तियों के अभिभावकत्व से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण नज़ीर बनने की क्षमता रखता है।


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क्या था यह मामला? एक सौतेली माँ की 3 साल की कानूनी लड़ाई

मनेंद्रगढ़ की महिला का दर्द और न्याय की तलाश

यह मामला मनेंद्रगढ़ निवासी एक महिला का है, जिन्होंने 2012 में उस व्यक्ति से विवाह किया था जिसकी पहली पत्नी का निधन हो चुका था। उस पहली पत्नी से एक बेटी थी — जो मानसिक दिव्यांगता से पीड़ित है और अब 26 वर्ष की हो चुकी है।

वर्षों तक उस बच्ची की देखभाल करने वाली इस महिला ने 2022 में Family Court में बेटी का कानूनी संरक्षक बनने की अर्जी दी। यह मांग इसलिए और ज़रूरी हो गई क्योंकि जैविक पिता द्वारा बेटी को ले जाने का कथित प्रयास हुआ, जिसने महिला को औपचारिक अभिभावकत्व की मांग करने पर मजबूर किया।

हालांकि, Family Court ने याचिका इस आधार पर खारिज कर दी कि 1999 के दिव्यांगता कानून के तहत उसके पास ऐसा आदेश देने का अधिकार नहीं है। इसके बाद महिला ने Chhattisgarh High Court का दरवाज़ा खटखटाया।


Chhattisgarh High Court ने क्यों खारिज की Family Court की शक्ति?

विशेष कानून बनाम सामान्य कानून — Chhattisgarh High Court का स्पष्ट संदेश

Chhattisgarh High Court की खंडपीठ — जिसमें न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल और न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत शामिल थे — ने स्पष्ट किया कि 1999 का राष्ट्रीय न्यास अधिनियम एक विशेष कानून है।

अदालत ने कहा कि यह विशेष कानून, सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) जैसे सामान्य कानूनों पर हावी होता है। जहाँ विशेष कानून मौजूद हो, वहाँ सामान्य कानूनों के तहत काम करने वाली अदालतें — जैसे Family Court — अपना अधिकार क्षेत्र नहीं स्थापित कर सकतीं।

यह सिद्धांत भारतीय न्यायशास्त्र में “Generalia Specialibus Non Derogant” के नाम से जाना जाता है — यानी विशेष कानून, सामान्य कानून को मात देता है।


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National Trust Act 1999 — क्या कहता है यह विशेष कानून?

धारा 13(1) — जो बन गई इस पूरे मामले की धुरी

National Trust for Welfare of Persons with Autism, Cerebral Palsy, Mental Retardation and Multiple Disabilities Act, 1999 की धारा 13(1) इस मामले में केंद्रीय भूमिका में रही।

इस धारा के तहत दिव्यांग व्यक्तियों के लिए Guardian नियुक्त करने का अधिकार Local Level Committee (LLC) को दिया गया है — न कि Family Court या Civil Court को।

अदालत ने स्पष्ट किया कि 1999 से पहले दिव्यांग व्यक्तियों के अभिभावकत्व के मामले व्यक्तिगत कानूनों और परंपराओं के अधीन थे। लेकिन 1999 का यह कानून अब एक व्यापक और संपूर्ण ढाँचा प्रदान करता है — एक Self-Contained Code — जो इस क्षेत्र में सभी अन्य कानूनों से ऊपर है।


Amicus Curiae की दलीलें — जिन्होंने बदल दी बहस की दिशा

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए Chhattisgarh High Court ने वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज परांजपे और अधिवक्ता राहुल तमस्कर को Amicus Curiae (न्यायमित्र) नियुक्त किया।

वरिष्ठ अधिवक्ता परांजपे ने तर्क दिया कि 1999 Act की धारा 13(1) में Family Court को दिव्यांग व्यक्तियों के लिए Guardian नियुक्त करने की शक्ति स्पष्ट रूप से नहीं दी गई है। उन्होंने मद्रास उच्च न्यायालय के G. Nithyanandam बनाम D. Saritha मामले का हवाला दिया, जो इसी बात को पुष्ट करता है।

अधिवक्ता तमस्कर ने आगे यह तर्क दिया कि “Special Law must prevail over General Law” — यानी जहाँ विशेष कानून मौजूद हो, वहाँ सामान्य कानून लागू नहीं होगा। अदालत ने दोनों तर्कों को स्वीकार करते हुए अपना निर्णय दिया।


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Chhattisgarh High Court का निर्देश: Local Level Committee ही करेगी फैसला

Koriya (Baikunthpur) की LLC को मिला ज़िम्मा

Chhattisgarh High Court ने याचिका को अधिकार क्षेत्र के अभाव में खारिज करते हुए भी उस महिला को राहत दी। अदालत ने उन्हें कोरिया (बैकुंठपुर) स्थित Local Level Committee (LLC) के पास जाने की स्वतंत्रता दी।

यह Local Level Committee 19 जनवरी 2026 को गठित की गई थी। अदालत ने निर्देश दिया कि इस समिति को उस महिला की आवेदन को 1999 Act के नियमों के तहत प्राथमिकता से निपटाना होगा।

यह निर्देश इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह साफ होता है कि अदालत ने सिर्फ याचिका खारिज नहीं की — बल्कि उस महिला को सही रास्ता भी दिखाया।


इस फैसले का व्यापक असर — पूरे भारत के लिए नज़ीर

यह फैसला सिर्फ मनेंद्रगढ़ की एक महिला या कोरिया ज़िले तक सीमित नहीं है। Chhattisgarh High Court का यह निर्णय देशभर में उन सैकड़ों परिवारों के लिए मार्गदर्शक बनेगा जो अपने दिव्यांग परिजन के लिए कानूनी संरक्षक बनने की कोशिश में हैं।

इस फैसले ने एक बार फिर यह रेखांकित किया है कि भारत में Disability Rights के मामले में Civil Court और Family Court की सीमाएं तय हैं। 1999 Act के तहत स्थापित LLC ही इन मामलों की सक्षम प्राधिकरण है।

मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को आधार बनाते हुए Chhattisgarh High Court ने एक राष्ट्रीय स्तर की कानूनी एकरूपता स्थापित करने में भी योगदान दिया है।


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दिव्यांग व्यक्तियों के परिजन अब क्या करें?

अगर आप या आपके किसी परिजन को दिव्यांग सदस्य के लिए कानूनी संरक्षक बनना है, तो Chhattisgarh High Court के इस फैसले के बाद प्रक्रिया स्पष्ट है:

पहला कदम: Family Court या Civil Court में न जाएं — वहाँ अब यह अधिकार नहीं।

दूसरा कदम: अपने ज़िले की Local Level Committee (LLC) से संपर्क करें, जो National Trust Act 1999 के तहत गठित है।

तीसरा कदम: LLC को आवेदन दें और 1999 Act की धारा 13(1) के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन करें।

यह रास्ता न सिर्फ कानूनन सही है, बल्कि Chhattisgarh High Court के इस आदेश के बाद अब यही एकमात्र वैध मार्ग भी है।


Chhattisgarh High Court का यह फैसला दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा में एक मील का पत्थर है। न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल और न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत की खंडपीठ ने जो स्पष्टता दी है — कि Family Court इस मामले में असक्षम है और 1999 Act ही सर्वोच्च है — वह लाखों दिव्यांग परिवारों को सही दिशा देगी। Chhattisgarh High Court ने न सिर्फ एक याचिका का निपटारा किया, बल्कि एक ऐसी नज़ीर स्थापित की जो पूरे देश में न्यायिक स्थिरता और दिव्यांग कल्याण के लिए काम करेगी। मनेंद्रगढ़ की उस महिला की तीन साल की कानूनी यात्रा भले खत्म न हुई हो, लेकिन Chhattisgarh High Court ने उन्हें सही रास्ता ज़रूर दिखा दिया।

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