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Chhattisgarh Elephant Conflict की गंभीर तस्वीर

Chhattisgarh Elephant Conflict छत्तीसगढ़ के लिए लगातार गंभीर होती चुनौती बन गया है। करीब छह दशक तक राज्य से गायब रहे हाथियों की वर्ष 1988 में सरगुजा क्षेत्र के रास्ते वापसी हुई थी। इसके बाद धीरे-धीरे उनका दायरा बढ़ता गया और अब राज्य के 16 जिलों में करीब 400 हाथियों की मौजूदगी बताई जा रही है।

हाथियों का विचरण अब केवल जंगलों तक सीमित नहीं है। वे जंगल से लगे इलाकों के अलावा राजधानी रायपुर और बिलासपुर के आसपास तक पहुंच रहे हैं। इसके चलते ग्रामीण आबादी और हाथियों के बीच टकराव की घटनाएं बढ़ी हैं।

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0 साल बाद छत्तीसगढ़ लौटे हाथी

वन अधिकारियों और विशेषज्ञों के अनुसार 20वीं सदी की शुरुआत तक छत्तीसगढ़ में पाए जाने वाले स्थानीय हाथी विलुप्त हो चुके थे। इसके बाद लंबे समय तक राज्य में हाथियों की स्थायी मौजूदगी नहीं रही।

वर्ष 1988 में अविभाजित बिहार के पलामू और सिंहभूम क्षेत्र में खनन गतिविधियां बढ़ने के बाद हाथियों का एक दल अविभाजित मध्यप्रदेश के सरगुजा क्षेत्र में पहुंचा। शुरुआती दल वापस चला गया, लेकिन इसके बाद हाथियों की आवाजाही का सिलसिला शुरू हो गया।

वर्ष 1995 के बाद हाथियों का छत्तीसगढ़ आना नियमित हो गया। वे सरगुजा और जशपुर के रास्ते झारखंड और ओडिशा के बीच आवाजाही करने लगे।

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Chhattisgarh Elephant Conflict का पुराना रास्ता

जशपुर को आज भी छत्तीसगढ़ में हाथियों का प्रवेश द्वार माना जाता है। सरगुजा, जशपुर और रायगढ़ के जंगल हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्ग यानी कॉरिडोर बन गए।

समय के साथ हाथी आसपास के दूसरे जिलों में भी फैलने लगे। जंगलों में मानवीय गतिविधियां बढ़ने, खेती और बसाहट के विस्तार तथा विकास परियोजनाओं के कारण हाथियों के पारंपरिक रास्तों पर दबाव बढ़ा।

Chhattisgarh Elephant Conflict में 972 लोगों की मौत

राज्य निर्माण के बाद वर्ष 2001 से 2026 तक हाथियों के हमलों में 972 लोगों की मौत होने की जानकारी सामने आई है। इसी अवधि में अलग-अलग कारणों से 262 हाथियों की भी मौत हुई।

इनमें 62 हाथियों की मौत करंट लगने से हुई। बिजली के तारों और लाइनों से जुड़ी घटनाएं हाथियों के संरक्षण के लिए बड़ी चिंता बनी हुई हैं।

वर्ष 1988 से अब तक हाथियों के हमलों में करीब 1,100 लोगों की मौत होने का अनुमान है। राज्य सरकार इस अवधि में प्रभावित परिवारों को 20 करोड़ रुपये से अधिक का मुआवजा भी दे चुकी है।

देश के स्तर पर भी स्थिति चिंताजनक है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार भारत में हर साल हाथियों के हमलों में करीब 500 लोगों की मौत होती है। छत्तीसगढ़, ओडिशा, असम और पश्चिम बंगाल इस समस्या से अधिक प्रभावित राज्यों में शामिल हैं।

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नौ हाथी कॉरिडोर किए गए चिह्नित

छत्तीसगढ़ में हाथियों की आवाजाही के लिए नौ कॉरिडोर चिह्नित किए गए हैं। ये ऐसे पारंपरिक रास्ते हैं जिनसे हाथी एक जंगल से दूसरे जंगल तक लंबी दूरी तय करते हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक हाथी लंबी दूरी तय करने वाला वन्यजीव है और उसका विचरण क्षेत्र सैकड़ों किलोमीटर तक हो सकता है। इसलिए उसके पारंपरिक रास्तों को समझना और सुरक्षित रखना मानव-हाथी संघर्ष कम करने में महत्वपूर्ण है।

खनन, अन्य विकास परियोजनाओं, बसाहट और खेती के विस्तार से इन रास्तों पर दबाव बढ़ने पर हाथियों और इंसानों के आमने-सामने आने की संभावना बढ़ जाती है।

Chhattisgarh Elephant Conflict और कॉरिडोर की चुनौती

हाथियों के लिए सुरक्षित कॉरिडोर बनाए रखना केवल वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें सड़क, बिजली, खनन और अन्य विकास परियोजनाओं की योजना बनाते समय वन्यजीवों की आवाजाही को ध्यान में रखना भी जरूरी है।

अगर पारंपरिक मार्ग बाधित होते हैं तो हाथी भोजन और पानी की तलाश में मानव बस्तियों की ओर बढ़ सकते हैं। इससे दोनों पक्षों के लिए जोखिम बढ़ जाता है।

विशेषज्ञ बोले- हाथियों को खदेड़ना समाधान नहीं

प्रोजेक्ट एलीफेंट की स्टीयरिंग कमेटी के सदस्य मंसूर खान के अनुसार छत्तीसगढ़ में हाथियों की वापसी के बाद स्थानीय लोगों के पास उनके व्यवहार और उनसे सुरक्षित रहने की पर्याप्त जानकारी नहीं थी।

उन्होंने कहा कि केरल जैसे राज्यों में पीढ़ियों से हाथियों के साथ रहने की समझ विकसित हुई है। छत्तीसगढ़ में भी लोगों को हाथियों के व्यवहार और सुरक्षित दूरी बनाए रखने के तरीकों की जानकारी देना जरूरी है।

विशेषज्ञ के अनुसार हाथियों को हल्ला पार्टी बनाकर खदेड़ना उचित तरीका नहीं है। इसके बजाय हाथियों वाले क्षेत्रों में भीड़ को पहुंचने से रोकना और लोगों की गतिविधियों को नियंत्रित करना अधिक प्रभावी हो सकता है।

जंगल में पानी और चारे की जरूरत

हाथियों के जंगल से बाहर आने की संभावना कम करने के लिए उनके प्राकृतिक आवास में पर्याप्त पानी और भोजन उपलब्ध होना भी महत्वपूर्ण है।

विशेषज्ञों के अनुसार जंगलों में हाथियों की मौजूदगी से दूसरे वन्यजीवों की संख्या और जैव विविधता को भी सकारात्मक असर मिल सकता है। इसलिए संरक्षण की रणनीति में हाथियों के साथ पूरे वन पारिस्थितिकी तंत्र को ध्यान में रखना जरूरी है।

संघर्ष रोकने के लिए सरकार की तैयारी

छत्तीसगढ़ के सरगुजा और बिलासपुर संभाग में हाथियों के लिए अनुकूल वातावरण के कारण स्थायी रहवास विकसित हुआ है। प्रभावित गांवों में हाथी मित्र दल बनाए गए हैं।

लोगों को हाथियों की मौजूदगी की जानकारी देने के लिए रेडियो और ‘गज संकेत’ एप का इस्तेमाल किया जा रहा है। मैसेज, WhatsApp और कॉल के जरिए रियल-टाइम अलर्ट भेजने की व्यवस्था भी की गई है।

करंट से हाथियों की मौत रोकने के लिए बिजली लाइनों के लूज पॉइंट सुधारने का काम किया जा रहा है। साथ ही हाथियों की सुरक्षित आवाजाही के लिए चिह्नित नौ कॉरिडोर पर भी ध्यान दिया जा रहा है।

Chhattisgarh Elephant Conflict केवल मानव सुरक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि वन्यजीव संरक्षण और प्राकृतिक आवास बचाने की चुनौती भी है। 2001 से 2026 के बीच 972 लोगों और 262 हाथियों की मौत का आंकड़ा समस्या की गंभीरता दिखाता है। करीब 400 हाथियों की मौजूदगी के बीच सुरक्षित कॉरिडोर, रियल-टाइम अलर्ट, बिजली लाइनों की निगरानी और स्थानीय लोगों की जागरूकता ही संघर्ष कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं। हाथियों को केवल खदेड़ने के बजाय उनके साथ सुरक्षित सह-अस्तित्व का रास्ता तलाशना जरूरी है।

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