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Bastar Tiranga: नक्सल गढ़ में लहराया तिरंगा, ऐतिहासिक पल

Bastar Tiranga ने छत्तीसगढ़ के बस्तर में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर एक ऐतिहासिक तस्वीर पेश की है। बीजापुर जिले की कर्रेगुट्टालु पहाड़ियों में, जिसे लंबे समय तक नक्सल गतिविधियों का प्रभाव वाला क्षेत्र माना जाता था, आजादी के बाद पहली बार राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराया गया। यह घटनाक्रम क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने और नक्सल प्रभाव के खत्म होने के बाद सामने आया है।

कर्रेगुट्टालु का अर्थ ‘काली पहाड़ियां’ बताया जाता है। कभी इन पहाड़ियों को नक्सली गतिविधियों के लिए जाना जाता था। अब उसी इलाके में तिरंगे का लहराना बस्तर में बदलते माहौल और लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूत होती पहुंच का प्रतीक माना जा रहा है।

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Bastar Tiranga: कर्रेगुट्टालु में बदली तस्वीर

80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कर्रेगुट्टालु पहाड़ियों में तिरंगा फहराने की घटना को सुरक्षा और विकास के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जिस इलाके में कभी नक्सली काले झंडों और हिंसा का प्रभाव दिखाई देता था, वहां अब देश का राष्ट्रीय ध्वज शान से लहरा रहा है।

यह बदलाव सिर्फ एक स्थान पर ध्वजारोहण तक सीमित नहीं है। यह बस्तर के दूरस्थ इलाकों में प्रशासन, सुरक्षा और लोकतांत्रिक गतिविधियों की बढ़ती मौजूदगी का भी संकेत देता है।

छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने इसे बेहद महत्वपूर्ण घटना बताया। उन्होंने कहा कि कर्रेगुट्टालु पहाड़ियों में तिरंगा फहराया जाना इस बात का प्रमाण है कि बस्तर में अब डर का माहौल नहीं रहा।

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नक्सल प्रभाव से बाहर निकलता बस्तर

कर्रेगुट्टालु क्षेत्र में सुरक्षा बलों के अभियान के बाद परिस्थितियों में बड़ा बदलाव आया। सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, क्षेत्र में नक्सल प्रभाव को कमजोर करने के लिए लगातार अभियान चलाए गए।

उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने नक्सल विरोधी अभियानों में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) और छत्तीसगढ़ सशस्त्र बलों के योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि कई जवानों ने छत्तीसगढ़ में नक्सल विरोधी अभियानों के दौरान अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।

Bastar Tiranga इसी संघर्ष के बाद सामने आई नई तस्वीर का प्रतीक बनकर उभरा है।

ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट ने बदली रणनीति

साल 2025 में कर्रेगुट्टालु पहाड़ियों में बड़े नक्सल विरोधी अभियानों में से एक अभियान चलाया गया था। इसे ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट के नाम से जाना गया। इसका उद्देश्य क्षेत्र में नक्सली प्रभाव को समाप्त कर सुरक्षा और प्रशासन की पहुंच मजबूत करना था।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 21 दिनों तक चले अभियान में 31 नक्सलियों के मारे जाने की जानकारी तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मई 2025 में साझा की थी।

इन अभियानों के बाद दूरस्थ इलाकों में सुरक्षा बलों की मौजूदगी और प्रशासनिक गतिविधियों को मजबूत करने पर जोर बढ़ा।

सुरक्षा बलों के साहस को सलाम

छत्तीसगढ़ के मंत्री केदार कश्यप ने भी कर्रेगुट्टालु जैसे दूरस्थ क्षेत्र में तिरंगा फहराए जाने पर खुशी जताई। उन्होंने कहा कि इस इलाके में तीन दिन तक तिरंगा यात्रा चली और ऐसे दुर्गम क्षेत्र में राष्ट्रीय ध्वज का लहराना बेहद संतोषजनक है।

उन्होंने उन जवानों की बहादुरी को भी नमन किया, जिनके प्रयासों से क्षेत्र में यह बदलाव संभव हुआ। सुरक्षा बलों की भूमिका बस्तर में शांति और सामान्य स्थिति बहाल करने के प्रयासों में महत्वपूर्ण रही है।

Bastar Tiranga: विकास और लोकतंत्र का नया संदेश

मंत्री केदार कश्यप ने कहा कि बस्तर में तिरंगे का लहराना सरकार के विकास और लोकतंत्र के प्रति संकल्प को दर्शाता है। उनका कहना है कि नक्सलवाद के प्रभाव से बाहर आने के बाद अब क्षेत्र में विकास कार्यों को तेजी मिलने की उम्मीद है।

दूरस्थ इलाकों में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार और अन्य मूलभूत सुविधाओं की पहुंच बढ़ाना बस्तर के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण होगा। सुरक्षा के साथ विकास की गति तेज होने से स्थानीय लोगों को नए अवसर मिल सकते हैं।

80वें स्वतंत्रता दिवस पर ऐतिहासिक संदेश

भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कर्रेगुट्टालु पहाड़ियों में तिरंगा फहराया जाना अपने आप में एक प्रतीकात्मक संदेश है। यह उस बदलाव को दर्शाता है जिसमें कभी हिंसा और भय से प्रभावित इलाके में अब राष्ट्रीय पर्व खुले तौर पर मनाया जा रहा है।

Bastar Tiranga की यह तस्वीर आने वाले समय में बस्तर की बदलती पहचान से जुड़ी महत्वपूर्ण तस्वीरों में शामिल हो सकती है। हालांकि, स्थायी शांति के लिए सुरक्षा के साथ स्थानीय लोगों की भागीदारी, रोजगार, शिक्षा और विकास को लगातार मजबूत करना भी जरूरी रहेगा।

Bastar Tiranga सिर्फ कर्रेगुट्टालु पहाड़ियों पर फहराया गया राष्ट्रीय ध्वज नहीं, बल्कि बस्तर में बदलती परिस्थितियों का प्रतीक है। नक्सल प्रभाव वाले क्षेत्र में तिरंगे का लहराना सुरक्षा बलों के लंबे संघर्ष, लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहुंच और विकास की नई उम्मीद को सामने लाता है। आने वाले वर्षों में यह बदलाव बस्तर को शांति, विकास और बेहतर अवसरों की दिशा में आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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