Bastar Dussehra 2026 छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत के लिए ऐतिहासिक अवसर बनकर सामने आया है। इस वर्ष नक्सलवाद से प्रभावित रहे करीब 50 गांवों के देवी-देवताओं ने पहली बार बस्तर दशहरा महोत्सव में भाग लिया। सुकमा, बीजापुर और नारायणपुर के अबूझमाड़ क्षेत्र सहित ओडिशा के पड़ोसी इलाकों से भी देवी-देवताओं को जगदलपुर लाया गया।
इस बढ़ी हुई भागीदारी को दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंच बेहतर होने और स्थानीय समुदायों की धार्मिक परंपराओं में सक्रिय सहभागिता से जोड़कर देखा जा रहा है। लंबे समय तक नक्सली प्रभाव के कारण जिन इलाकों से लोगों का आना-जाना मुश्किल था, वहां से देवी-देवताओं का पहुंचना इस साल के आयोजन की प्रमुख विशेषता रहा।
छत्तीसगढ़ की ऐसी ही खबरों के लिए 4thNation WhatsApp चैनल से जुड़ें
Bastar Dussehra 2026 में नक्सल प्रभावित गांवों की ऐतिहासिक भागीदारी
इस वर्ष बस्तर दशहरा में दूरस्थ गांवों से देवी-देवताओं के आगमन ने आयोजन को विशेष पहचान दी। स्थानीय परंपराओं के अनुसार, गांवों के देवी-देवताओं को जगदलपुर लाकर विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल किया जाता है।
पटवारी सत्यनारायण सेठिया ने समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में बताया कि अबूझमाड़ सहित कई क्षेत्रों के देवी-देवता पहली बार इस तरह के आयोजन में पहुंचे। उनके मुताबिक, सुकमा जिले के देवी-देवताओं की भागीदारी भी पहली बार देखने को मिली।
सेठिया ने इसका श्रेय देवी माई के प्रति लोगों की गहरी आस्था और क्षेत्र में नक्सली प्रभाव कम होने के बाद यात्रा सुगम होने को दिया। उन्होंने कहा कि अपने कार्यकाल में उन्होंने इस वर्ष अनुष्ठानों के दौरान सबसे बड़ी भागीदारी देखी।
मावली परघाव में 954 देवी-देवताओं ने लिया हिस्सा
Bastar Dussehra 2026 के दौरान आयोजित मावली परघाव अनुष्ठान में कुल 954 देवी-देवताओं ने भाग लिया। यह आंकड़ा इस साल के आयोजन में विभिन्न क्षेत्रों की भागीदारी के व्यापक स्वरूप को दर्शाता है।
बस्तर दशहरा में मावली परघाव का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। इस अनुष्ठान में देवी-देवताओं की उपस्थिति स्थानीय परंपराओं और समुदायों की आस्था से जुड़ी हुई है।
इस वर्ष दूरस्थ गांवों से देवी-देवताओं के पहुंचने से आयोजन में शामिल होने वाले समुदायों का दायरा बढ़ा। हालांकि, कुल भागीदारी में पिछले वर्षों के मुकाबले कितनी वृद्धि हुई, इसका विस्तृत तुलनात्मक आंकड़ा उपलब्ध जानकारी में नहीं दिया गया है।
भीतर रैनी अनुष्ठान में 461 देवी-देवताओं की भागीदारी
बस्तर दशहरा के एक अन्य महत्वपूर्ण अनुष्ठान भीतर रैनी में 461 देवी-देवताओं ने हिस्सा लिया। मावली परघाव के साथ भीतर रैनी भी इस पारंपरिक उत्सव का प्रमुख हिस्सा है।
अधिकारियों के अनुसार, इन दोनों अनुष्ठानों के अलावा महोत्सव से जुड़े अन्य धार्मिक कार्यक्रमों में भी विभिन्न गांवों के देवी-देवता शामिल हुए।
स्थानीय समुदायों के लिए इन अनुष्ठानों में भाग लेना केवल धार्मिक गतिविधि नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं को बनाए रखने का माध्यम भी है। दूरस्थ क्षेत्रों से प्रतिनिधित्व बढ़ना इस परंपरा की व्यापकता को सामने लाता है।
सुरक्षा और पहुंच में सुधार से बढ़ी भागीदारी
बस्तर के पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा ने बताया कि बीजापुर, सुकमा और नारायणपुर के अबूझमाड़ क्षेत्र के दूरस्थ गांवों से लोग अपने स्थानीय देवी-देवताओं के साथ जगदलपुर पहुंचे।
उन्होंने कहा कि पहले जिन क्षेत्रों से इस तरह की भागीदारी मुश्किल थी, वहां से करीब 50 गांवों के देवी-देवताओं का आना महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, सड़कों और आयोजन स्थलों पर दिखाई देने वाली भीड़ लोगों के उत्साह को दर्शाती है।
गौरतलब है कि उपलब्ध समाचार विवरण में 31 मार्च 2026 को क्षेत्र में नक्सलवाद के उन्मूलन की सूचना का उल्लेख किया गया है। हालांकि, इस दावे की व्यापक आधिकारिक पुष्टि और सुरक्षा स्थिति के अलग-अलग क्षेत्रों में विवरण को संबंधित सरकारी आंकड़ों के आधार पर ही समझना चाहिए।
देश-विदेश से पहुंचे श्रद्धालु और पर्यटक
बस्तर दशहरा छत्तीसगढ़ के प्रमुख सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजनों में शामिल है। पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा के अनुसार, इस वर्ष दूसरे जिलों और राज्यों के साथ विदेशों से भी पर्यटक महोत्सव में पहुंचे।
दूरस्थ गांवों के कई निवासी अपने देवी-देवताओं के साथ जगदलपुर में रुकते हैं और उत्सव के विभिन्न अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। इससे स्थानीय धार्मिक परंपराओं के साथ-साथ बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को देखने और समझने का अवसर मिलता है।
बढ़ती भागीदारी से स्थानीय पर्यटन, पारंपरिक आयोजनों और क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को प्रोत्साहन मिलने की संभावना है।
Bastar Dussehra 2026 ने दिखाई बस्तर की सांस्कृतिक एकजुटता
बस्तर दशहरा की विशेषता इसकी लंबी परंपरा और स्थानीय देवी-देवताओं से जुड़ा सामुदायिक स्वरूप है। इस वर्ष करीब 50 गांवों से पहली बार देवी-देवताओं की भागीदारी ने इस विरासत के व्यापक सामाजिक महत्व को उजागर किया है।
मावली परघाव में 954 और भीतर रैनी में 461 देवी-देवताओं की उपस्थिति आयोजन के बड़े धार्मिक स्वरूप को दर्शाती है। दूरस्थ क्षेत्रों से लोगों का पहुंचना बेहतर संपर्क और सांस्कृतिक सहभागिता के लिए सकारात्मक संकेत है।
निष्कर्ष: Bastar Dussehra 2026 केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि बस्तर की आस्था, परंपरा और सामुदायिक जुड़ाव का महत्वपूर्ण उदाहरण है। नक्सल प्रभावित रहे क्षेत्रों से देवी-देवताओं की भागीदारी इस वर्ष की प्रमुख उपलब्धियों में शामिल रही। भविष्य में बेहतर संपर्क, सुरक्षा और स्थानीय समुदायों की भागीदारी बनाए रखना इस सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाएगा।
