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Supreme Court ने BCI की शक्ति पर क्या कहा?

Supreme Court ने बुधवार, 23 सितंबर 2026 को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की कानून शिक्षा और लॉ कॉलेजों को रेगुलेट करने की शक्ति को लेकर अहम सवाल उठाए। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि वह इस बात की जांच करेगी कि BCI के पास कानून महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों को नियंत्रित करने की वैधानिक शक्ति किस सीमा तक है।

पीठ में प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत के साथ न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे। सुनवाई BCI-PEARL First Trust के कामकाज और उसके माध्यम से कानून कॉलेजों की स्थापना से जुड़ी याचिकाओं पर हुई।

कोर्ट ने BCI की विशेषज्ञता को लेकर भी सवाल किया। पीठ ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि कानून शिक्षा के अकादमिक पहलुओं के लिए कानून के विद्वान और शिक्षाविद अधिक उपयुक्त हो सकते हैं।

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Supreme Court ने BCI के नियमन की सीमा पर उठाया सवाल

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह अंतर रेखांकित किया कि BCI कानून शिक्षा के मानक और सामान्य दिशानिर्देश तय करने की भूमिका निभा सकता है, लेकिन क्या उसे कानून कॉलेजों के संचालन पर व्यापक नियंत्रण का अधिकार है, यह अलग कानूनी प्रश्न है।

Advocates Act, 1961 की धारा 7(1)(h) में BCI को कानूनी शिक्षा को बढ़ावा देने और ऐसी शिक्षा के मानक तय करने का दायित्व दिया गया है। कानून में यह भी कहा गया है कि मानक तय करते समय संबंधित विश्वविद्यालयों और राज्य बार काउंसिलों से परामर्श किया जाना है।

धारा 7(1)(i) BCI को उन विश्वविद्यालयों को मान्यता देने की भूमिका भी देती है, जिनकी कानून की डिग्री अधिवक्ता के रूप में नामांकन के लिए योग्यता बन सकती है।

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BCI के जवाब पर भी कोर्ट की नजर

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाओं पर नोटिस जारी करते हुए BCI से दो सप्ताह में जवाब मांगा है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता गिरीश मित्तल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने BCI के ट्रस्ट से जुड़े कई मुद्दे अदालत के सामने रखे।

रिपोर्ट के अनुसार, भूषण ने कहा कि BCI ने 2016 में एक पुराने ट्रस्ट को समाप्त करने का प्रस्ताव पारित किया था और उसकी धनराशि नए ट्रस्ट को हस्तांतरित की गई। इसके बाद 2020 में Bar Council of India Trust for Promotion of Education, Legal and Professional Reforms and Improvement in Research का गठन किया गया।

PEARL-First Trust और लॉ कॉलेजों का विवाद

याचिका में ट्रस्ट के गठन और उसके दस्तावेजों से जुड़े सवाल भी उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया कि 11 प्रबंध न्यासियों को BCI सदस्य के रूप में उनके कार्यकाल से अलग “मूल और स्थायी न्यासी” बनाया गया।

याचिकाकर्ता पक्ष के अनुसार, बाद में ट्रस्ट ने गोवा और आंध्र प्रदेश में एक-एक कानून कॉलेज स्थापित किए। हालांकि, BCI की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि अब एक प्रस्ताव पारित किया गया है जिसके तहत कोई भी व्यक्ति आजीवन न्यासी नहीं रहेगा और न्यासियों का कार्यकाल BCI सदस्यता के साथ समाप्त होगा।

यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें केवल किसी एक ट्रस्ट का प्रशासनिक विवाद नहीं, बल्कि BCI की कानूनी शिक्षा से जुड़ी वैधानिक भूमिका की सीमा का सवाल भी सामने आया है।

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BCI चेयरमैन के कार्यकाल पर भी सवाल

सुनवाई से जुड़े व्यापक विवाद में BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के कार्यकाल का मुद्दा भी सामने आया है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि उनका पद नवगठित बार निकाय द्वारा पदाधिकारियों के चुनाव तक “प्रोटेम” प्रकृति का है और BCI को नीतिगत फैसले लेने से पहले अटॉर्नी जनरल तथा सॉलिसिटर जनरल से परामर्श करने का निर्देश दिया गया था।

एक अलग याचिका में अधिवक्ता योगमाया एम.जी. ने मिश्रा के लंबे समय तक चेयरमैन बने रहने की वैधता को चुनौती दी है। याचिका में BCI नियमों के तहत चेयरमैन और उपाध्यक्ष के दो साल के कार्यकाल का उल्लेख करते हुए 21 अप्रैल 2025 की राजपत्र अधिसूचना को भी चुनौती दी गई है, जिसमें कार्यकाल 2030 तक दर्ज किए जाने का दावा किया गया है।

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Supreme Court के नोटिस के बाद आगे क्या?

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने BCI को दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसके बाद अदालत यह तय करेगी कि BCI की वैधानिक शक्तियों और कानून शिक्षा के नियमन की सीमा से जुड़े सवालों पर आगे किस तरह सुनवाई की जाए।

इस मामले में Supreme Court का अंतिम निर्णय अभी नहीं आया है। इसलिए फिलहाल BCI की शक्तियों के बारे में अदालत की टिप्पणियों को अंतिम कानूनी निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। आगे की सुनवाई में Advocates Act की संबंधित धाराओं और BCI की वैधानिक भूमिका की व्याख्या महत्वपूर्ण होगी।


Supreme Court की 23 सितंबर की सुनवाई ने BCI की कानूनी शिक्षा संबंधी शक्तियों की सीमा पर महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न सामने रखे हैं। अदालत का अगला रुख BCI-PEARL First Trust, लॉ कॉलेजों के नियमन और Advocates Act के तहत BCI की भूमिका को समझने के लिए अहम होगा।

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