रायपुर/बिलासपुर, 5 नवंबर 2026। Chhattisgarh Gharounda Deaths मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने घरौंदा केंद्रों की व्यवस्थाओं पर गंभीर चिंता जताई है। इन केंद्रों में चार वयस्क महिलाओं और पांच साल के एक बच्चे समेत कुल पांच लोगों की मौत के बाद अदालत ने चिकित्सा सुविधाओं, कर्मचारियों की निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था में सामने आई कमियों पर सवाल उठाए हैं।
3 नवंबर को मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति कृष्णा राम मोहपात्रा और न्यायमूर्ति संतोष शर्मा की खंडपीठ ने कोर्ट कमिश्नर की निरीक्षण रिपोर्ट और तस्वीरों को देखने के बाद केंद्रों की स्थिति को बेहद चिंताजनक बताया। अदालत ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि वहां मौजूद दिव्यांग निवासियों की समस्याएं समझने और उनसे संवाद करने के लिए कोई व्यक्ति उपलब्ध नहीं था।
Chhattisgarh Gharounda Deaths: चार महिलाओं और बच्चे की मौत
कोर्ट कमिश्नर की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2026 में महिला घरौंदा केंद्र में पांच लोगों की मौत हुई। इनमें चार वयस्क महिलाएं और एक पांच साल का बच्चा शामिल हैं।
रिपोर्ट में दर्ज मौतों का विवरण इस प्रकार है:
- शोभा (30 वर्ष): 24 मई को निमोनिया और सेप्टिक शॉक के कारण मौत।
- कुमारी बाई (35 वर्ष): 9 मई को गंभीर आयरन डेफिशिएंसी एनीमिया, दौरे, सोडियम की कमी और एस्पिरेशन न्यूमोनाइटिस से मौत।
- मीना (30 वर्ष): 6 जून को एक्यूट एंटराइटिस, गंभीर डिहाइड्रेशन, पेट की टीबी और श्वसन विफलता के बाद मौत।
- कुसुम (45 वर्ष): 21 सितंबर को मौत। अस्पताल के रिकॉर्ड में एक्स्ट्रापल्मोनरी ट्यूबरकुलोसिस का उल्लेख है।
- कबीर (5 वर्ष): 10 अगस्त को सेप्सिस और रिफ्रैक्टरी शॉक के कारण मौत।
इन मामलों में अस्पताल के इलाज और मृत्यु से संबंधित रिकॉर्ड उपलब्ध थे, लेकिन पुलिस, जिला स्तरीय समिति और वरिष्ठ विभागीय अधिकारियों को तत्काल सूचना देने के निर्धारित दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए।
बच्चे कबीर की मौत में सामने आईं गंभीर विसंगतियां
Chhattisgarh Gharounda Deaths मामले में पांच वर्षीय कबीर की मौत ने विशेष रूप से अदालत का ध्यान खींचा। रिपोर्ट के मुताबिक, कबीर की मां सपना नायक का संबंध महिला घरौंदा केंद्र से बताया गया है।
केंद्र के कर्मचारियों और प्रबंधक ने कोर्ट कमिश्नर को बताया कि बच्चा स्वस्थ था, बिस्तर से गिरने के बाद उसे दौरे पड़े और फिर अस्पताल ले जाया गया।
हालांकि, अस्पताल के दस्तावेजों में न्यूरोसिस्टिसर्कोसिस, पोषण संबंधी एनीमिया और टीबी जैसी गंभीर बीमारियों का उल्लेख मिला। अस्पताल में 3 जुलाई को भर्ती होने के बाद 10 अगस्त को उसकी मौत हुई थी।
रिकॉर्ड में बच्चे की उम्र को लेकर भी अंतर पाया गया। कुछ दस्तावेजों में सात वर्ष और रेडियोलॉजी स्लिप में पांच वर्ष दर्ज था। शुरुआती भर्ती का इतिहास और ब्रेन स्कैन की रिपोर्ट भी उपलब्ध दस्तावेजों में नहीं मिली।
कोर्ट कमिश्नर ने बच्चे की पहले की स्वास्थ्य स्थिति, बिस्तर से गिरने की परिस्थितियों और समय पर इलाज मिलने की जांच के लिए स्वतंत्र चिकित्सा विशेषज्ञों से जांच कराने की सिफारिश की। हालांकि, रिपोर्ट ने किसी व्यक्ति की लापरवाही या दोष को अंतिम रूप से प्रमाणित नहीं किया।
डॉक्टरों की विजिट और नर्सिंग व्यवस्था पर उठे सवाल
निरीक्षण में रायपुर के घरौंदा केंद्रों में चिकित्सा निगरानी की कमी भी सामने आई। निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार योग्य डॉक्टरों को सप्ताह में दो बार केंद्रों का दौरा करना था। वहीं, नर्सिंग या पैरामेडिकल कर्मचारियों की 24 घंटे उपलब्धता जरूरी थी।
लेकिन मेडिकल रजिस्टर में पिछले तीन महीनों के दौरान डॉक्टरों की केवल एक या दो विजिट प्रतिमाह दर्ज मिलीं। चौबीस घंटे नर्सिंग सुविधा और नियमित मनोरोग विशेषज्ञ की जांच के पर्याप्त दस्तावेज भी नहीं मिले।
रिपोर्ट के अनुसार, कुछ मृत महिलाओं में बीमारी के शुरुआती लक्षण कब सामने आए और अस्पताल पहुंचाने से पहले क्या उपचार दिया गया, इसकी जानकारी भी मेडिकल रिकॉर्ड में पर्याप्त रूप से दर्ज नहीं थी।
बिलासपुर केंद्र में बिस्तर से बंधा मिला दिव्यांग
बिलासपुर के घरौंदा केंद्र में निरीक्षण के दौरान एक पुरुष दिव्यांग निवासी को बिस्तर के चारों कोनों से बांधा हुआ पाया गया। उसके एक हाथ को कपड़े से पलंग के पाए से बांधा गया था।
कर्मचारियों ने उसे हाइपर बताते हुए कहा कि वह कुछ भी कर सकता है। प्रबंधक के अनुसार, उसे लगभग आधे घंटे तक बांधकर रखा गया था।
कोर्ट कमिश्नर के हस्तक्षेप के बाद उसे खोला गया। इसके बाद वह शौचालय गया और अन्य निवासियों के साथ भोजन की प्रतीक्षा करने लगा। रिपोर्ट में यह भी आशंका जताई गई कि बंधे रहने के दौरान वह अपनी शौचालय जाने की जरूरत नहीं बता पा रहा था।
उसे शारीरिक रूप से बांधने के लिए किसी डॉक्टर की सलाह या अधिकृत दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया।
भोजन, साफ-सफाई और स्वास्थ्य रिकॉर्ड में भी कमियां
बिलासपुर केंद्रों में भोजन की गुणवत्ता और मात्रा अपर्याप्त पाई गई। शौचालयों की स्वच्छता भी संतोषजनक नहीं थी।
निवासियों को कई मनोरोग संबंधी दवाएं दी जा रही थीं, जबकि भोजन की व्यवस्था ही पर्याप्त नहीं थी। इसके अलावा प्रत्येक निवासी का अलग स्वास्थ्य रिकॉर्ड भी नहीं बनाया गया था।
मेडिकल रजिस्टर में व्यक्तिगत जांच और स्वास्थ्य की प्रगति के बजाय 14 अगस्त और 12 सितंबर की सामान्य प्रविष्टियां दर्ज थीं। सप्ताह में दो डॉक्टर विजिट के नियम के मुकाबले केवल महीने में एक सामान्य समीक्षा का रिकॉर्ड मिला।
Chhattisgarh Gharounda Deaths: हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को विस्तृत जानकारी और जवाब दो सप्ताह के भीतर प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
अदालत ने यह भी कहा कि घरौंदा केंद्रों में लगे सीसीटीवी कैमरों तक कोर्ट कमिश्नरों को पहुंच उपलब्ध कराने की संभावना पर सरकार विचार करे।
इसके अलावा संबंधित जिलों के नोडल अधिकारियों और घरौंदा केंद्रों के प्रभारियों को हर महीने की रिपोर्ट कोर्ट कमिश्नरों के साथ साझा करने का निर्देश दिया गया है। इसका उद्देश्य केंद्रों की नियमित निगरानी सुनिश्चित करना है।
अदालत ने 5 मार्च 2019 को जारी दिशा-निर्देशों के क्लॉज 28 और 30 के तहत निगरानी व्यवस्था को प्रभावी बनाने पर जोर दिया।
Chhattisgarh Gharounda Deaths का मामला केवल पांच लोगों की मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि दिव्यांग निवासियों के इलाज, भोजन, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन से जुड़ा गंभीर सवाल है। अब राज्य सरकार के जवाब और आगे की न्यायिक निगरानी से यह स्पष्ट होगा कि घरौंदा केंद्रों की व्यवस्थाओं में सुधार के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।
