SIR Voter List से जुड़ा एक मामला छत्तीसगढ़ के बिलासपुर और पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद से सामने आया है। द टेलीग्राफ ऑनलाइन की 21 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, मुस्तकीम शेख और उनके छोटे भाई सबीर समेत 23 बंगाली भाषी मुस्लिमों को 4 सितंबर की रात सिरगिट्टी थाना क्षेत्र से हिरासत में लेकर रायपुर के एक डिटेंशन सेंटर ले जाया गया था।
मुस्तकीम 14 दिन बाद 18 अन्य लोगों के साथ बाहर आ गए, लेकिन उनके भाई सबीर, दो चचेरे भाइयों और एक अन्य व्यक्ति के हिरासत में रहने की बात रिपोर्ट में कही गई है। मुस्तकीम के अनुसार, वह लंबे समय से छत्तीसगढ़ में रहकर काम कर रहे हैं।
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SIR Voter List में नाम का अंतर
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल मतदाता सूची में परिवार के सदस्यों के नाम को लेकर उठ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, मुस्तकीम का नाम मतदाता सूची में मौजूद है, जबकि उनके छोटे भाई सबीर का नाम Special Intensive Revision यानी SIR प्रक्रिया के दौरान हट गया था। सबीर के अलावा मुर्शिदाबाद के उनके रिश्तेदार सफीकुल और दो अन्य लोगों के नाम भी हटाए जाने की बात सामने आई है।
मुस्तकीम ने द टेलीग्राफ ऑनलाइन से बातचीत में सवाल उठाया कि अगर वह भारतीय नागरिक हैं और उनका नाम मतदाता सूची में है, तो उनके छोटे भाई की नागरिकता पर सवाल कैसे उठ सकता है। हालांकि, यह उनका व्यक्तिगत बयान है और सबीर की नागरिकता पर अंतिम निर्णय के लिए संबंधित अधिकारियों की जांच और दस्तावेजी सत्यापन जरूरी है।
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23 लोगों को हिरासत में लेने का दावा
रिपोर्ट के मुताबिक, इन लोगों को पहले पुलिस स्टेशन पहुंचकर दस्तावेज उपलब्ध कराने के लिए कहा गया था। बाद में 4 सितंबर को उन्हें उनके ठिकाने से उठाकर रायपुर ले जाया गया।
मुस्तकीम का दावा है कि रायपुर ले जाते समय उन्हें पूछताछ के बाद छोड़ने की बात कही गई थी। उन्होंने यह भी कहा कि हिरासत के दौरान उनसे कोई पूछताछ नहीं हुई और कई दिनों तक बंद रहना उनके लिए बेहद कठिन अनुभव था। इन दावों पर बिलासपुर पुलिस का पक्ष रिपोर्ट में उपलब्ध नहीं हो सका।
18 सितंबर को 19 लोगों को ट्रेन से छत्तीसगढ़ छोड़ने के लिए कहा गया। मुस्तकीम के अनुसार, उनका सामान बिलासपुर में ही रह गया है और दैनिक मजदूरी करने वाले लोगों के लिए दूसरे राज्य में जाकर काम करना जरूरी है।
मुर्शिदाबाद में SIR Voter List का बड़ा आंकड़ा
SIR प्रक्रिया के दौरान मुर्शिदाबाद में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सत्यापन या adjudication की प्रक्रिया में गए। द टेलीग्राफ के अनुसार, 27 फरवरी को ड्राफ्ट रोल प्रकाशित होने के बाद जिले में 11,21,205 मतदाता adjudication के तहत थे।
रिपोर्ट के मुताबिक, SIR से पहले मुर्शिदाबाद में 57,64,085 मतदाता थे। इनमें 2,93,822 नाम absentee, shifted, dead और duplicate यानी ASDD श्रेणी में चिह्नित किए गए थे, जबकि 4,55,137 नाम दिसंबर में हटाए गए थे। बाद में अपीलीय प्रक्रिया के तहत मामलों की सुनवाई जारी रही।
भारत निर्वाचन आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर पश्चिम बंगाल SIR-2026 से संबंधित चुनावी जानकारी और मतदाता सूची से जुड़े संसाधन उपलब्ध हैं।
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सुप्रीम कोर्ट और मतदाता सूची का मामला
SIR को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा है। 27 मई 2026 के फैसले में अदालत ने मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया में संबंधित मतदाता को नोटिस और अपनी बात रखने का अवसर दिए जाने से जुड़े सुरक्षा प्रावधानों पर विस्तार से चर्चा की।
इसलिए SIR Voter List में नाम हटना अपने आप में किसी व्यक्ति की नागरिकता पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। किसी व्यक्ति की नागरिकता और मतदाता सूची में पात्रता अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं, जिनका निर्धारण लागू कानून और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर होता है।
सबीर की रिहाई का इंतजार
मुस्तकीम के मुताबिक, अब परिवार सबीर और बाकी लोगों की रिहाई तथा दस्तावेजों के सत्यापन का इंतजार कर रहा है। रिपोर्ट में राज्यसभा सांसद समीरुल इस्लाम के हवाले से कहा गया है कि उन्होंने छत्तीसगढ़ के अधिकारियों से संपर्क कर सत्यापन प्रक्रिया में मदद की है। उन्होंने यह भी कहा कि रिहाई नहीं होने पर कानूनी रास्ता अपनाया जा सकता है।
मामले में बिलासपुर के पुलिस अधीक्षक राजनेश सिंह से संपर्क करने की कोशिश का भी रिपोर्ट में उल्लेख है, लेकिन उनकी प्रतिक्रिया प्रकाशित नहीं हुई।
SIR Voter List से जुड़ा बिलासपुर का यह मामला मतदाता सूची में नाम, दस्तावेजी सत्यापन और नागरिकता से जुड़े सवालों को सामने लाता है। फिलहाल सबीर और अन्य लोगों की स्थिति पर अंतिम तस्वीर संबंधित अधिकारियों की जांच और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी। उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर किसी व्यक्ति की नागरिकता को केवल मतदाता सूची में नाम होने या न होने से अंतिम रूप से तय करना उचित नहीं है।
