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Chakradhar Samaroh की दूसरी संध्या रही यादगार

Chakradhar Samaroh की दूसरी संध्या रायगढ़ में लोककला, शास्त्रीय संगीत और छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं के नाम रही। कार्यक्रम का शुभारंभ राज्यसभा सांसद देवेंद्र प्रताप सिंह ने दीप प्रज्वलित कर किया। इसके बाद उन्होंने महाराजा चक्रधर सिंह के चित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी।

समारोह में राजस्थान से आए कलाकारों ने अपनी पारंपरिक लोककलाओं से मंच को जीवंत कर दिया। वहीं पंडवानी की प्रस्तुति ने छत्तीसगढ़ की लोकपरंपरा और महाभारत के मार्मिक प्रसंग को प्रभावशाली अंदाज में दर्शकों के सामने रखा।

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Chakradhar Samaroh में राजस्थान की लोककला का रंग

दूसरी संध्या में राजस्थान के बाड़मेर से आए स्टार्क सोसाइटी के कलाकारों ने कालबेलिया, घूमर/झूमर सहित कई लोकनृत्यों की प्रस्तुति दी। पारंपरिक लोकधुनों पर कलाकारों की शानदार प्रस्तुति ने दर्शकों को राजस्थान की लोकसंस्कृति से रूबरू कराया।

कालबेलिया नृत्य की लयबद्ध पदचाल और घूमती हुई गतियों ने खास आकर्षण पैदा किया। कलाकारों की ऊर्जा और तालमेल पर दर्शकों ने देर तक तालियां बजाकर उनका उत्साह बढ़ाया।

‘निबूड़ा’ और ‘दमादम मस्त कलंदर’ ने बांधा समां

राजस्थानी लोकधुनों के साथ कई लोकप्रिय गीतों पर कलाकारों ने प्रस्तुति दी। ‘निबूड़ा’, ‘अली बोलो’ और ‘दमादम मस्त कलंदर’ जैसे गीतों ने समारोह के माहौल को और खुशनुमा बना दिया।

भवाई लोकनृत्य की प्रस्तुति को भी दर्शकों की खूब सराहना मिली। मंच पर नृत्य, संगीत और पारंपरिक वाद्ययंत्रों का ऐसा संगम देखने को मिला, जिसने सांस्कृतिक संध्या को खास बना दिया।

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Chakradhar Samaroh में तबला-सारंगी की जुगलबंदी

राजस्थान के लोकनृत्यों के बाद शाम तबले और सारंगी के सुरों से और भी खास हो गई। मंच पर निशित गंगानी ने तबले पर अपनी कला का प्रदर्शन किया, जबकि मुदस्सिर खान ने सारंगी के भावपूर्ण सुरों से उनका साथ दिया।

दोनों कलाकारों की प्रस्तुति में सुर, ताल और लय का सुंदर मेल देखने-सुनने को मिला। वादन के दौरान दर्शक संगीत में डूबे नजर आए और तालियों से कलाकारों का उत्साह बढ़ाया।

कलाकारों की शानदार संगत

राजस्थानी दल के साथ गायक आसिन खान ने गायन किया। हारमोनियम पर लतीफ खान और साइये खां, ढोलक पर भुट्टा खान, खड़ताल पर देवू खान और सारंगी पर हुसैन खान ने संगत दी।

कामायचा पर ग्रुप लीडर दीन मोहम्मद ने साथ दिया। नृत्य प्रस्तुतियों में हीरा, तनु, पूजा और प्रिया ने अपनी कला का प्रदर्शन किया।

पंडवानी में जीवंत हुआ द्रौपदी चीरहरण

कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोककला पंडवानी रही। रेलवे सुरक्षा बल, राजनांदगांव में इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत तरुणा साहू ने महाभारत के मार्मिक प्रसंग ‘द्रौपदी चीरहरण’ को पंडवानी शैली में प्रस्तुत किया।

सुर, ताल और भावपूर्ण अभिव्यक्ति के माध्यम से उन्होंने प्रसंग को मंच पर जीवंत कर दिया। प्रस्तुति के दौरान दर्शक भाव-विभोर नजर आए और कलाकार का उत्साह तालियों से बढ़ाया।

तरुणा साहू का पंडवानी से पुराना जुड़ाव

तरुणा साहू का पंडवानी से जुड़ाव वर्ष 1994 से बताया गया है। जवाहर नवोदय विद्यालय में पढ़ाई के दौरान उन्हें पंडवानी की महान कलाकार पद्म विभूषण तीजन बाई के सान्निध्य में इस लोककला को सीखने का अवसर मिला।

तीजन बाई के साथ उन्होंने दिल्ली, भोपाल और उज्जैन के कालिदास समारोह सहित देश के कई प्रतिष्ठित मंचों पर पंडवानी की प्रस्तुति दी। उनकी कला-साधना को वर्ष 2005 में लोक एवं पारंपरिक कला के क्षेत्र में राष्ट्रीय छात्रवृत्ति से भी सम्मानित किया गया।

Chakradhar Samaroh में कला-साधना का सम्मान

तरुणा साहू ने वर्ष 2024 में अयोध्या महोत्सव में भी पंडवानी की प्रस्तुति दी। इसी दौरान उन्हें आइकॉनिक ऑनरेरी डॉक्टरेट अवॉर्ड और शक्ति सम्मान-2024 से सम्मानित किए जाने की जानकारी दी गई।

उनकी प्रस्तुति ने यह दिखाया कि पंडवानी जैसी पारंपरिक लोककला आज भी नई पीढ़ी और दर्शकों के बीच अपनी मजबूत पहचान बनाए हुए है।

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लोककला और संगीत का शानदार संगम

चक्रधर समारोह की दूसरी संध्या में राजस्थान की लोकसंस्कृति और छत्तीसगढ़ की पंडवानी के साथ तबला-सारंगी जैसे वाद्य संगीत का सुंदर मेल देखने को मिला। अलग-अलग लोक एवं संगीत परंपराओं की प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम को विविधतापूर्ण बनाया।

महाराजा चक्रधर सिंह की कला और संगीत के प्रति समर्पण की विरासत से जुड़े इस समारोह में देश की अलग-अलग सांस्कृतिक परंपराओं को मंच मिलना इसकी खासियत रही।

Chakradhar Samaroh की दूसरी संध्या रायगढ़ में लोककला और संगीत की विविधता का शानदार उदाहरण बनी। राजस्थान के कालबेलिया, घूमर और भवाई से लेकर तबला-सारंगी की जुगलबंदी और तरुणा साहू की पंडवानी तक, कार्यक्रम में दर्शकों को कई रंग देखने को मिले। ऐसी प्रस्तुतियां देश की समृद्ध लोक एवं सांस्कृतिक विरासत को मंच देने के साथ उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

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