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Hasdeo Arand Coal Mine: हसदेव अरण्य में केंटे एक्सटेंशन को मिली पर्यावरण मंजूरी, पर्यावरण और आदिवासी हितों पर फिर छिड़ी बहस

Hasdeo Arand Coal Mine से जुड़ी एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने छत्तीसगढ़ के हसदेव-अरण्य क्षेत्र स्थित केंटे एक्सटेंशन इंटीग्रेटेड कोल ब्लॉक को पर्यावरणीय मंजूरी (Environmental Clearance) प्रदान कर दी है। यह मंजूरी 24 जून 2026 को जारी की गई। परियोजना के तहत प्रतिवर्ष 90 लाख टन (9 मिलियन टन) कोयला उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है।

इस मंजूरी के बाद एक बार फिर हसदेव अरण्य में खनन, पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी अधिकारों को लेकर बहस तेज हो गई है।

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Hasdeo Arand Coal Mine परियोजना को कैसे मिली मंजूरी?

Hasdeo Arand Coal Mine के तहत प्रस्तावित केंटे एक्सटेंशन परियोजना को पहले 9 जून 2026 को सैद्धांतिक वन स्वीकृति (In-Principle Forest Clearance) मिली थी। इसके बाद 24 जून को पर्यावरण मंत्रालय ने अंतिम पर्यावरणीय मंजूरी जारी कर दी।

इससे पहले मंत्रालय की कोयला खनन विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (Expert Appraisal Committee) ने जनवरी 2025 में इस परियोजना की सिफारिश की थी। अंतिम मंजूरी वन स्वीकृति मिलने के बाद ही जारी की गई।

यह हसदेव-अरण्य क्षेत्र की तीसरी बड़ी कोयला परियोजना है। इससे पहले पर्सा और पर्सा ईस्ट केंटे बसन (PEKB) खदानें पहले से संचालित हैं।

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क्या है केंटे एक्सटेंशन परियोजना?

सूरजपुर नहीं बल्कि सरगुजा जिले में स्थित 1,760 हेक्टेयर क्षेत्रफल वाला केंटे एक्सटेंशन इंटीग्रेटेड कोल ब्लॉक वर्ष 2015 में राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (RVUNL) को आवंटित किया गया था।

इस परियोजना में अडानी समूह (Mine Developer and Operator) खदान का विकास और संचालन करेगा। यहां से निकाला गया कोयला राजस्थान के छाबड़ा और सूरतगढ़ ताप विद्युत संयंत्रों को भेजा जाएगा।


Hasdeo Arand Coal Mine: क्यों महत्वपूर्ण है हसदेव-अरण्य?

Hasdeo Arand Coal Mine जिस क्षेत्र में प्रस्तावित है, वह हसदेव-अरण्य के घने जंगलों का हिस्सा है। इस वन क्षेत्र को अक्सर मध्य भारत के “ग्रीन लंग्स” (Green Lungs) के रूप में जाना जाता है।

यहां लगभग—

  • 640 से अधिक वनस्पति प्रजातियां
  • वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची-1 में शामिल 9 प्रमुख वन्यजीव प्रजातियां
  • 40 से 50 हाथियों का प्राकृतिक आवास एवं आवागमन मार्ग
  • तेंदुए, बाघ सहित कई अन्य स्तनधारी जीव

पाए जाते हैं। यही क्षेत्र हसदेव नदी का जलग्रहण क्षेत्र भी है, जो आगे चलकर महानदी में मिलती है।

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जैव विविधता पर क्या पड़ सकता है असर?

साल 2021 में भारतीय वन्यजीव संस्थान (Wildlife Institute of India – WII) द्वारा किए गए जैव विविधता अध्ययन में कहा गया था कि पर्सा ईस्ट केंटे बसन (PEKB) के अलावा हसदेव-अरण्य क्षेत्र में नए खनन कार्य से बचना चाहिए, क्योंकि इससे जैव विविधता पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

वहीं भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि केंटे एक्सटेंशन परियोजना पर निर्णय लेते समय सतही जल प्रबंधन और जैव विविधता संरक्षण के लिए कड़े पर्यावरणीय सुरक्षा उपाय अपनाना आवश्यक होगा।


1,742 हेक्टेयर वन भूमि और लाखों पेड़ों पर प्रभाव

आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार परियोजना के लिए 1,742.6 हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग किया जाएगा।

इसके तहत लगभग 4.48 लाख पेड़ों को चरणबद्ध तरीके से काटने का प्रस्ताव है। पहले पांच वर्षों में करीब 98 हजार पेड़ काटे जाएंगे, जबकि अगले चरण में लगभग 60 हजार पेड़ हटाए जाएंगे।

साथ ही राज्य सरकार को 67,414 छोटे पेड़ों (60 सेंटीमीटर से कम घेर वाले) के प्रत्यारोपण (Translocation) और चरणबद्ध कटाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।


स्थानीय आदिवासियों और विपक्ष ने जताया विरोध

Hasdeo Arand Coal Mine परियोजना का स्थानीय आदिवासी समुदायों और कांग्रेस ने विरोध किया है।

विरोध करने वालों का कहना है कि बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई से पर्यावरण, वन्यजीव और स्थानीय लोगों की आजीविका प्रभावित होगी।

आधिकारिक जानकारी के अनुसार परियोजना से सरगुजा जिले की उदयपुर तहसील के केंटे, बसन, चकेरी और परोगिया गांवों के 56 परिवार प्रभावित होंगे। इनके पुनर्वास और मुआवजे की प्रक्रिया राज्य सरकार की स्वीकृत पुनर्वास योजना के अनुसार की जाएगी।


सरकार की ओर से क्या कहा गया है?

परियोजना को पर्यावरण और वन स्वीकृति निर्धारित शर्तों के साथ प्रदान की गई है। इसमें चरणबद्ध खनन, पर्यावरण संरक्षण उपाय, जल प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण, पुनर्वास तथा नियमित निगरानी जैसे प्रावधान शामिल हैं।

सरकार का कहना है कि परियोजना के दौरान सभी वैधानिक पर्यावरणीय मानकों और शर्तों का पालन किया जाएगा।


Hasdeo Arand Coal Mine को मिली पर्यावरणीय मंजूरी छत्तीसगढ़ के खनन और ऊर्जा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। एक ओर यह परियोजना ऊर्जा उत्पादन और औद्योगिक जरूरतों को पूरा करने में योगदान दे सकती है, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता और स्थानीय आदिवासी समुदायों पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर गंभीर चिंताएं भी बनी हुई हैं। आने वाले समय में इस परियोजना का क्रियान्वयन पर्यावरणीय शर्तों और पुनर्वास प्रावधानों के पालन पर काफी हद तक निर्भर करेगा।

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