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Bastar Bailadila Tribal Protest: बोधघाट परियोजना के खिलाफ आदिवासियों का उग्र विरोध

Bastar Bailadila Tribal Protest एक बार फिर चर्चा में है। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा लंबे समय से लंबित बोधघाट बहुउद्देश्यीय परियोजना को पुनर्जीवित करने की कोशिशों के बीच बस्तर क्षेत्र में हजारों आदिवासी सड़कों पर उतर आए हैं। प्रभावित गांवों के लोगों ने साफ कहा है कि वे अपनी जमीन, जंगल और धार्मिक स्थलों को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे।

दंतेवाड़ा जिले के बारसूर के पास हितालकुडुम गांव में आयोजित विशाल सभा में 18 ग्राम पंचायतों के हजारों ग्रामीणों ने परियोजना का विरोध किया। प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि उनकी सहमति के बिना परियोजना को आगे बढ़ाया गया तो आंदोलन और तेज होगा।

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Bastar Bailadila Tribal Protest का मुख्य कारण

56 गांवों पर मंडरा रहा विस्थापन का खतरा

आंदोलनकारी ग्रामीणों का दावा है कि बोधघाट परियोजना से दंतेवाड़ा, बीजापुर, बस्तर और नारायणपुर जिलों के 56 से अधिक गांव प्रभावित हो सकते हैं।

उनका आरोप है कि परियोजना के कारण 16,000 हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र जलमग्न हो सकता है और हजारों परिवारों को अपने घर छोड़ने पड़ सकते हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल भूमि अधिग्रहण का मामला नहीं बल्कि उनकी पहचान, संस्कृति और अस्तित्व का प्रश्न है।

“पहले गोली मारो, फिर बांध बनाओ”

सभा में शामिल लोगों ने “पहले गोली मारो, फिर बांध बनाओ” जैसे नारे लगाते हुए परियोजना के प्रति अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया।

कई ग्रामीण अपने पारंपरिक देवी-देवताओं और धार्मिक प्रतीकों को लेकर प्रदर्शन स्थल पहुंचे, जिससे आंदोलन को सांस्कृतिक और धार्मिक स्वरूप भी मिला।

बोधघाट परियोजना क्या है?

इंद्रावती नदी पर प्रस्तावित है परियोजना

बोधघाट बहुउद्देश्यीय परियोजना इंद्रावती नदी पर दंतेवाड़ा जिले के बारसूर क्षेत्र के पास प्रस्तावित है।

इस परियोजना की परिकल्पना वर्ष 1979 में की गई थी। इसका उद्देश्य जलविद्युत उत्पादन और सिंचाई सुविधाओं का विस्तार करना था।

हालांकि बड़े पैमाने पर विस्थापन, पर्यावरणीय प्रभाव और वन क्षेत्र के डूबने की आशंकाओं के कारण यह परियोजना दशकों तक ठंडे बस्ते में रही।

अब सर्वेक्षण कार्य फिर से शुरू होने की खबरों के बाद Bastar Bailadila Tribal Protest ने नया रूप ले लिया है।

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आदिवासियों की प्रमुख आपत्तियां

जंगल, पहाड़ और धार्मिक स्थल डूबने की आशंका

ग्रामीणों का कहना है कि परियोजना के कारण केवल घर और खेती की जमीन ही नहीं डूबेगी, बल्कि जंगल, पहाड़, गुफाएं और उनके पूर्वजों से जुड़े धार्मिक स्थल भी जलमग्न हो जाएंगे।

जनपद सदस्य विद्याधर नाग ने कहा कि लोगों का पुनर्वास किया जा सकता है, लेकिन उनके देवी-देवताओं और सांस्कृतिक विरासत का पुनर्वास कैसे होगा।

आदिवासी समुदाय का मानना है कि उनके धार्मिक स्थल और प्राकृतिक संसाधन उनकी पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं।

50 हजार से अधिक लोगों के प्रभावित होने का दावा

बीजापुर विधायक विक्रम मंडावी ने दावा किया कि परियोजना से 50 हजार से अधिक लोग प्रभावित हो सकते हैं।

उन्होंने कहा कि एक ओर सरकार विकास की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन को खतरे में डाल रही है।

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PESA और FRA कानून का मुद्दा

ग्राम सभाओं की सहमति नहीं लेने का आरोप

Bastar Bailadila Tribal Protest के दौरान बोधघाट संघर्ष समिति और प्रभावित ग्रामीणों ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को ज्ञापन सौंपा।

ज्ञापन में आरोप लगाया गया कि पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (PESA) और वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत आवश्यक ग्राम सभा की सहमति लिए बिना सर्वेक्षण कार्य किया जा रहा है।

ग्रामीणों ने मांग की है कि जब तक पूरी जानकारी साझा नहीं की जाती और लिखित सहमति नहीं ली जाती, तब तक परियोजना से जुड़ी सभी गतिविधियां रोकी जाएं।

संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप

ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी सहमति के बिना आगे की कार्रवाई की जाती है, तो इसे आदिवासी समुदायों को मिले संवैधानिक और कानूनी अधिकारों का उल्लंघन माना जाएगा।

सरकार का पक्ष क्या है?

राज्य सरकार के अधिकारियों का कहना है कि बोधघाट परियोजना क्षेत्र में सिंचाई सुविधाओं को बढ़ा सकती है, जलविद्युत उत्पादन कर सकती है और दीर्घकालिक विकास को गति दे सकती है।

अधिकारियों के अनुसार वर्तमान में केवल परियोजना की व्यवहार्यता का पुनर्मूल्यांकन किया जा रहा है और अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।

सरकार का दावा है कि परियोजना से क्षेत्रीय विकास को नई दिशा मिल सकती है।

आगे क्या हो सकता है?

बोधघाट संघर्ष समिति ने चेतावनी दी है कि यदि स्थानीय सहमति के बिना सर्वेक्षण या अन्य गतिविधियां जारी रहती हैं तो पूरे बस्तर में व्यापक आंदोलन शुरू किया जाएगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस मुद्दे का समाधान केवल संवाद, पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रियाओं के पालन से ही संभव है।

Bastar Bailadila Tribal Protest केवल एक विकास परियोजना का विरोध नहीं है, बल्कि आदिवासी पहचान, सांस्कृतिक विरासत और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। बोधघाट परियोजना को लेकर जहां सरकार विकास और ऊर्जा उत्पादन की बात कर रही है, वहीं प्रभावित ग्रामीण अपने अस्तित्व, जंगल और धार्मिक स्थलों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। आने वाले समय में Bastar Bailadila Tribal Protest छत्तीसगढ़ की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक और विकास संबंधी बहसों में से एक बन सकता है।

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