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Chhattisgarh’s rich agricultural tradition में कोदो-कुटकी का बढ़ता महत्व

Chhattisgarh’s rich agricultural tradition में कोदो और कुटकी का विशेष स्थान रहा है। सदियों से आदिवासी और ग्रामीण समुदायों के भोजन का हिस्सा रहे ये लघु धान्य आज फिर से किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच चर्चा का केंद्र बन गए हैं।

बदलती जलवायु परिस्थितियों, बढ़ती पोषण संबंधी चुनौतियों और टिकाऊ खेती की जरूरत के बीच कोदो-कुटकी जैसी मिलेट फसलें भविष्य की कृषि का मजबूत आधार बनकर उभर रही हैं।


Chhattisgarh’s rich agricultural tradition और मिलेट क्रांति

छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है, लेकिन Chhattisgarh’s rich agricultural tradition केवल धान तक सीमित नहीं है। कोदो, कुटकी और रागी जैसी पारंपरिक मिलेट फसलें भी राज्य की कृषि संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं।

इन फसलों ने वर्षों तक ग्रामीण और आदिवासी परिवारों की पोषण आवश्यकताओं को पूरा किया है। अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती मांग के कारण इनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है।

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कम लागत में अधिक लाभ देने वाली फसलें

कोदो (Paspalum scrobiculatum) और कुटकी (Panicum sumatrense) ऐसी फसलें हैं जिन्हें कम पानी, कम लागत और सीमित संसाधनों में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है।

इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि कम उपजाऊ, पथरीली और ढालू भूमि में भी इनका उत्पादन संभव है। जहां दूसरी फसलें अपेक्षित उत्पादन नहीं दे पातीं, वहां कोदो और कुटकी किसानों के लिए आय का भरोसेमंद स्रोत बन सकती हैं।

छोटे और सीमांत किसानों के लिए वरदान

विशेषज्ञों का मानना है कि ये फसलें छोटे और सीमांत किसानों के लिए आर्थिक सुरक्षा का मजबूत माध्यम हैं। कम लागत में अच्छी उपज मिलने से किसानों का जोखिम भी कम होता है।

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कोदो-कुटकी क्यों बन रही हैं सुपर फूड?

आज दुनिया स्वास्थ्यवर्धक भोजन की ओर लौट रही है। इसी कारण कोदो और कुटकी की मांग लगातार बढ़ रही है।

कोदो में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, आयरन और कैल्शियम भरपूर मात्रा में पाया जाता है। वहीं कुटकी फाइबर, प्रोटीन, फास्फोरस और अन्य आवश्यक खनिजों का अच्छा स्रोत है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इनका नियमित सेवन मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा और एनीमिया जैसी समस्याओं के नियंत्रण में सहायक हो सकता है। यही वजह है कि इन्हें आज “सुपर फूड” के रूप में पहचान मिल रही है।


Chhattisgarh’s rich agricultural tradition को मिल रहा सरकारी समर्थन

राज्य सरकार भी मिलेट फसलों को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। वर्ष 2026 में कोदो का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 3,200 रुपये प्रति क्विंटल तथा कुटकी का 3,350 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है।

इस निर्णय से किसानों को बेहतर मूल्य मिलने की उम्मीद है और इन फसलों की खेती के प्रति उत्साह बढ़ा है।

विभागीय आंकड़ों के अनुसार खरीफ वर्ष 2025 में प्रदेश में कोदो 39.02 हेक्टेयर और कुटकी 38.03 हेक्टेयर क्षेत्र में बोई गई थी। इस दौरान कोदो का उत्पादन 21.46 टन और कुटकी का उत्पादन 25.67 टन दर्ज किया गया।

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने भी किसानों से धान के साथ-साथ कोदो, कुटकी और रागी जैसी फसलों का उत्पादन बढ़ाने की अपील की है।

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Chhattisgarh’s rich agricultural tradition को मजबूत करेगी वैज्ञानिक खेती

कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि आधुनिक तकनीकों के उपयोग से कोदो-कुटकी की उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है।

विशेषज्ञ जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम पखवाड़े तक बुवाई करने, बीजोपचार अपनाने, कतार पद्धति से खेती करने तथा संतुलित उर्वरक प्रबंधन पर जोर देते हैं।

बेहतर उत्पादन के लिए जरूरी उपाय

  • समय पर बुवाई
  • गुणवत्तापूर्ण बीजों का उपयोग
  • खरपतवार नियंत्रण
  • संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन
  • वैज्ञानिक सलाह के अनुसार खेती

इन उपायों से किसानों को बेहतर उत्पादन और अधिक आय प्राप्त हो सकती है।


किसानों के लिए नए बाजार और अवसर

बढ़ती बाजार मांग, मिलेट आधारित उत्पादों का विस्तार और सरकारी प्रोत्साहन योजनाएं कोदो-कुटकी के व्यावसायिक महत्व को लगातार बढ़ा रही हैं।

जो फसलें कभी केवल ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों तक सीमित थीं, वे अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी पहचान बना रही हैं।

मिलेट कुकीज, नूडल्स, आटा, स्नैक्स और हेल्थ फूड उत्पादों की बढ़ती मांग किसानों के लिए नए अवसर पैदा कर रही है।


Chhattisgarh’s rich agricultural tradition केवल अतीत की विरासत नहीं बल्कि भविष्य की कृषि का मजबूत आधार भी है। कोदो और कुटकी जैसी मिलेट फसलें पोषण सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आर्थिक उन्नति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। यदि किसान आधुनिक तकनीकों के साथ इन पारंपरिक फसलों की खेती को बढ़ावा दें और उपभोक्ता इन्हें अपने दैनिक आहार का हिस्सा बनाएं, तो Chhattisgarh’s rich agricultural tradition आने वाले वर्षों में देश की टिकाऊ और लाभकारी कृषि का आदर्श मॉडल बन सकती है।

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