दुर्ग। Khet Bachao Abhiyan 2026 के तहत दुर्ग जिले में किसानों को रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग और प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए जागरूक किया जा रहा है। लगातार रासायनिक खादों के अत्यधिक और असंतुलित उपयोग से मिट्टी की उर्वरता में कमी, मृदा कार्बन का ह्रास, जल प्रदूषण और खेती की बढ़ती लागत जैसी गंभीर समस्याएं सामने आ रही हैं।
इन्हीं चुनौतियों से निपटने के लिए कृषि विभाग द्वारा 1 जून से 30 जून 2026 तक जिलेभर में विशेष अभियान चलाया जा रहा है। अभियान का उद्देश्य किसानों को टिकाऊ कृषि पद्धतियों की ओर प्रेरित करना और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना है।
Khet Bachao Abhiyan 2026 के तहत जागरूकता अभियान
उप कृषि मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के आह्वान पर शुरू किए गए इस अभियान के अंतर्गत जिला, विकासखंड और पंचायत स्तर पर कृषि चौपालों एवं संगोष्ठियों का आयोजन किया जा रहा है।
इन कार्यक्रमों में किसानों, स्थानीय जनप्रतिनिधियों, कृषि वैज्ञानिकों और कृषि विभाग के मैदानी अमले की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है। कृषि विशेषज्ञ किसानों को आधुनिक एवं प्राकृतिक कृषि तकनीकों की जानकारी दे रहे हैं।
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क्यों जरूरी है Khet Bachao Abhiyan 2026
विशेषज्ञों के अनुसार यूरिया और डीएपी जैसे रासायनिक उर्वरकों का लगातार अधिक उपयोग मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है। इससे भूमि की प्राकृतिक उपजाऊ क्षमता धीरे-धीरे कम हो रही है।
कृषि विभाग किसानों को सलाह दे रहा है कि वे मृदा स्वास्थ्य कार्ड की अनुशंसाओं के आधार पर ही खादों का उपयोग करें और रासायनिक उर्वरकों की मात्रा को आवश्यकतानुसार सीमित रखें।
प्राकृतिक खेती अपनाने पर विशेष जोर
अभियान के तहत किसानों को अपनी कम से कम 25 प्रतिशत कृषि भूमि पर प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
प्राकृतिक खेती में गोबर खाद, जैविक कीटनाशक, जैव उर्वरक, हरी खाद तथा पारंपरिक कृषि पद्धतियों के उपयोग पर जोर दिया जा रहा है। इससे न केवल खेती की लागत कम होगी बल्कि मिट्टी की सेहत भी बेहतर बनी रहेगी।
Khet Bachao Abhiyan 2026 में नील-हरित काई और हरी खाद की भूमिका
कृषि विभाग किसानों को नील-हरित काई (Blue Green Algae) के उपयोग के बारे में भी जानकारी दे रहा है। यह एक जैविक खाद है जो प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन उपलब्ध कराती है।
विशेषज्ञों के अनुसार नील-हरित काई के उपयोग से प्रति हेक्टेयर 25 से 30 किलोग्राम रासायनिक नाइट्रोजन की बचत संभव है।
वहीं हरी खाद के रूप में ढैंचा और मूंग का उपयोग करने से प्रति हेक्टेयर लगभग 40 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन भूमि को प्राप्त होती है। इतनी मात्रा प्राप्त करने के लिए सामान्य परिस्थितियों में 90 से 130 किलोग्राम यूरिया की आवश्यकता पड़ती है।
इस प्रकार किसान प्रति हेक्टेयर दो से तीन बोरी यूरिया की बचत कर सकते हैं।
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नैनो यूरिया और नैनो डीएपी को बढ़ावा
Khet Bachao Abhiyan 2026 में आधुनिक तकनीक का उपयोग
अभियान के दौरान नैनो यूरिया और नैनो डीएपी के उपयोग पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है।
तरल स्वरूप में उपलब्ध होने के कारण इनका छिड़काव सीधे पौधों की पत्तियों पर किया जा सकता है। इससे पोषक तत्वों का बेहतर अवशोषण होता है और उर्वरकों की उपयोग क्षमता बढ़ती है।
कृषि विभाग ने वर्ष 2026 में जिले में 18 हजार नैनो यूरिया तथा 30 हजार नैनो डीएपी बोतलों के वितरण का लक्ष्य निर्धारित किया है।
तिलहनी फसलों के रकबे में वृद्धि पर जोर
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन-तिलहन के तहत किसानों को सोयाबीन और तिल जैसी तिलहनी फसलों का रकबा बढ़ाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
इसका उद्देश्य देश को खाद्य तेल उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना है। कृषि विभाग का मानना है कि तिलहनी फसलों का विस्तार किसानों की आय बढ़ाने में भी सहायक होगा।
किसानों से विभाग की विशेष अपील
कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे रासायनिक खादों का अंधाधुंध उपयोग कम करें और प्राकृतिक तथा जैविक खेती की ओर कदम बढ़ाएं।
साथ ही किसानों को ग्राम पंचायतों में आयोजित कृषि चौपालों और संगोष्ठियों में भाग लेने तथा कृषि वैज्ञानिकों और विभागीय अधिकारियों से तकनीकी सलाह प्राप्त करने की सलाह दी गई है।
Khet Bachao Abhiyan 2026 केवल एक जागरूकता अभियान नहीं बल्कि मिट्टी, पर्यावरण और किसानों के भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। प्राकृतिक खेती, नैनो उर्वरकों, जैविक खादों और तिलहनी फसलों को बढ़ावा देकर खेती की लागत कम करने के साथ-साथ मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता को संरक्षित किया जा सकता है। यदि किसान इस अभियान से जुड़कर संतुलित उर्वरक उपयोग और प्राकृतिक खेती को अपनाते हैं, तो कृषि क्षेत्र में दीर्घकालिक सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं।
