Chhattisgarh news में नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ क्षेत्र से एक प्रेरणादायक खबर सामने आई है। वर्षों तक माओवादी प्रभाव में रहे दूरस्थ करकाबेड़ा गांव में अब बच्चों की पढ़ाई शुरू हो गई है।
सरकारी अधिकारियों ने स्थानीय ग्रामीणों के साथ मिलकर कठिन पहाड़ी रास्तों और नदी-नालों को पार करते हुए गांव तक पहुंचकर नया प्राथमिक स्कूल शुरू किया।
यह गांव नारायणपुर जिला मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर दूर स्थित है और यहां अब तक सड़क सुविधा भी उपलब्ध नहीं थी।
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Chhattisgarh News: 5 घंटे पैदल चलकर पहुंचे अधिकारी
ब्लॉक शिक्षा अधिकारी, ब्लॉक रिसोर्स कोऑर्डिनेटर और क्लस्टर कोऑर्डिनेटर की टीम गांव के सरपंच और ग्रामीणों के साथ करकाबेड़ा पहुंची।
टीम ने सुबह जल्दी यात्रा शुरू की। पहले सड़क मार्ग से कच्छापाल और फिर जतवार तक पहुंचे। इसके बाद अधिकारियों को पांच घंटे तक पैदल चलना पड़ा।
कठिन रास्तों से गुजरकर गांव पहुंचे
रास्ते में कई नदी-नाले बिना पुल के पार करने पड़े। जंगलों के संकरे रास्ते और फिसलन भरे इलाकों ने यात्रा को बेहद चुनौतीपूर्ण बना दिया।
ब्लॉक शिक्षा अधिकारी संतू राम नुरेट्टी ने बताया कि गांव पहुंचने के बाद बच्चों को देखकर सारी थकान दूर हो गई।
उन्होंने कहा कि बच्चों के हाथों में किताबें देखकर एक अलग ही संतोष महसूस हुआ।
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माओवादी प्रभाव वाले क्षेत्र में शिक्षा की नई शुरुआत
करकाबेड़ा गांव अबूझमाड़ क्षेत्र में स्थित है, जो लंबे समय तक माओवादियों का गढ़ माना जाता रहा है।
यह इलाका कभी प्रतिबंधित माओवादी संगठन CPI (माओवादी) के शीर्ष नेताओं का मुख्य ठिकाना माना जाता था।
हाल के वर्षों में सुरक्षा बलों के अभियान के बाद क्षेत्र में माओवादी प्रभाव काफी कम हुआ है। इसके बाद सरकार ने सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं पर काम तेज किया है।
माओवादी हिंसा से प्रभावित रहा गांव
नारायणपुर एसपी Robinson Guria के अनुसार करकाबेड़ा के पास स्थित माकुर गांव में पहले माओवादी गतिविधियां सक्रिय थीं।
2024 में यहां मुठभेड़ में पांच माओवादी मारे गए थे। इसके बाद कई कैडर ने आत्मसमर्पण भी किया।
अब नए स्कूल में करकाबेड़ा और माकुर दोनों गांवों के बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं।
Chhattisgarh News: बच्चों को पहली बार मिली शिक्षा
फरवरी में शुरू किए गए इस प्राथमिक स्कूल में शुरुआत में 20 बच्चों को किताबें, स्लेट और पेंसिल वितरित की गईं।
स्थानीय शिक्षिका रूनीता पावे को स्कूल संचालन की जिम्मेदारी दी गई। फिलहाल स्कूल अस्थायी शेड में संचालित हो रहा है।
तीन महीने बाद अब सरकार ने यहां पक्के स्कूल भवन और संपर्क सड़क निर्माण को भी मंजूरी दे दी है।
गांव के बच्चों में बढ़ा उत्साह
ग्रामीणों का कहना है कि पहली बार गांव के बच्चों को अपने ही इलाके में शिक्षा का अवसर मिला है।
पहले बच्चों को पढ़ाई के लिए चार किलोमीटर दूर कोंगाली गांव जाना पड़ता था, लेकिन वहां का स्कूल भी वर्षों पहले बंद हो गया था।
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बंद पड़े स्कूलों को फिर से खोला गया
नारायणपुर कलेक्टर Namrata Jain ने बताया कि जिले में घर-घर सर्वे कर 22,364 परिवारों की जानकारी जुटाई गई।
इस सर्वे में 2,965 ऐसे बच्चों की पहचान हुई जो स्कूल से बाहर थे। इनमें 1,360 बच्चे कभी स्कूल नहीं गए थे, जबकि 1,605 बच्चों ने पढ़ाई बीच में छोड़ दी थी।
10 बंद स्कूल दोबारा शुरू
प्रशासन ने 10 बंद पड़े स्कूलों को फिर से शुरू किया।
इन स्कूलों में मटवाड़ा, गट्टाकाल, नेलंगुर, पदमकोट, टोयामेटा और कोंगाली जैसे गांव शामिल हैं।
इन स्कूलों के दोबारा खुलने से 250 बच्चों की पढ़ाई फिर शुरू हो सकी।
Chhattisgarh News: 24 नए स्कूलों से बदली तस्वीर
प्रशासन ने दूरस्थ क्षेत्रों में 24 नए प्राथमिक स्कूल भी शुरू किए हैं।
कोडेनार, घमंडी, हिंगेनार, गुंडेडकोट और कुंजेवाड़ा जैसे इलाकों में पहली बार स्कूल खोले गए हैं।
अधिकारियों के अनुसार इन स्कूलों के जरिए करीब 500 बच्चों को पहली बार शिक्षा से जोड़ा गया है।
800 से ज्यादा बच्चों को मिला फायदा
पुराने स्कूलों को दोबारा खोलने और नए स्कूल शुरू करने से अब तक 800 से ज्यादा बच्चों को शिक्षा से जोड़ा जा चुका है।
विशेष रूप से आदिवासी और PVTG समुदाय के बच्चों के लिए यह पहल बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
अबूझमाड़ में सड़क और विकास कार्यों पर फोकस
सरकार अब अबूझमाड़ क्षेत्र में सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करने पर जोर दे रही है।
करकाबेड़ा स्कूल तक पहुंचने के लिए संपर्क सड़क निर्माण की मंजूरी इसी दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि विकास कार्यों से क्षेत्र में शांति और स्थिरता को मजबूती मिलेगी।
Chhattisgarh news में अबूझमाड़ के करकाबेड़ा गांव की यह कहानी केवल एक स्कूल खुलने की खबर नहीं है, बल्कि शिक्षा और विकास की नई उम्मीद का प्रतीक है।
5 घंटे पैदल चलकर अधिकारियों द्वारा स्कूल खोलना यह दिखाता है कि अब दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों तक भी शिक्षा पहुंचाने की गंभीर कोशिश की जा रही है।
800 से अधिक बच्चों को शिक्षा से जोड़ने की यह पहल आने वाले समय में पूरे बस्तर और अबूझमाड़ क्षेत्र की तस्वीर बदल सकती है।
