Senior Citizen Eviction Rights को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल को माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 (Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007) के तहत यह अधिकार प्राप्त है कि वह बुजुर्गों की सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने के लिए बेटे या अन्य रिश्तेदार को घर खाली करने का आदेश दे सकता है।
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Senior Citizen Eviction Rights पर हाईकोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने रायगढ़ निवासी रामदयाल साहू की याचिका को खारिज करते हुए मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल और अपीलीय प्राधिकरण के आदेश को बरकरार रखा।
अदालत ने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों के संरक्षण के लिए बनाया गया कानून केवल भरण-पोषण भत्ता दिलाने तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य बुजुर्गों को सुरक्षित, सम्मानजनक और शांतिपूर्ण वातावरण में रहने का अधिकार सुनिश्चित करना भी है।
Senior Citizen Eviction Rights मामले में क्या था विवाद?
मामला रायगढ़ जिले से जुड़ा है। याचिकाकर्ता रामदयाल साहू ने उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें अपनी मां हेमकुंवर के नाम पर प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने मकान को खाली करने का निर्देश दिया गया था।
मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल ने 12 नवंबर 2021 को बुजुर्ग मां को मकान का कब्जा वापस दिलाने का आदेश दिया था। आदेश का पालन नहीं होने पर 15 मई 2024 को फिर से निर्देश जारी किए गए।
इसके बाद रामदयाल साहू ने अपील दायर की, लेकिन 7 अगस्त 2024 को अपीलीय प्राधिकरण ने भी ट्रिब्यूनल के आदेश को सही ठहराया।
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मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल की शक्तियां क्या हैं?
हाईकोर्ट ने कहा कि Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 के तहत गठित मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल का मुख्य उद्देश्य बुजुर्गों के जीवन, सुरक्षा और कल्याण की रक्षा करना है।
यदि किसी वरिष्ठ नागरिक को उसके अपने घर में प्रताड़ना, असुरक्षा या रहने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है, तो ट्रिब्यूनल आवश्यक परिस्थितियों में संबंधित व्यक्ति को घर खाली करने का आदेश दे सकता है।
यह अधिकार कानून द्वारा प्रदान किया गया है और इसका उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों को सम्मानजनक जीवन उपलब्ध कराना है।
भरण-पोषण का भी दिया गया आदेश
अपीलीय प्राधिकरण ने केवल मकान खाली करने का आदेश ही नहीं दिया, बल्कि रामदयाल साहू और उनके दो भाइयों को अपनी मां को 1,500-1,500 रुपये प्रति माह भरण-पोषण देने का भी निर्देश दिया।
इस आदेश को भी याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
Senior Citizen Eviction Rights पर हाईकोर्ट ने याचिका क्यों खारिज की?
याचिकाकर्ता का तर्क था कि संबंधित संपत्ति पैतृक है और उसके बंटवारे का मामला सिविल कोर्ट में लंबित है। इसलिए ट्रिब्यूनल को ऐसा आदेश देने का अधिकार नहीं है।
हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल संपत्ति के स्वामित्व (Ownership) का फैसला नहीं करता, बल्कि केवल वरिष्ठ नागरिक के निवास और सुरक्षा के अधिकार की रक्षा करता है।
इसलिए यदि संपत्ति के स्वामित्व का विवाद सिविल कोर्ट में लंबित है, तब भी ट्रिब्यूनल बुजुर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक आदेश जारी कर सकता है।
फैसले का कानूनी महत्व
यह निर्णय वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे स्पष्ट संदेश गया है कि बुजुर्गों को अपने ही घर में सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण में रहने का अधिकार प्राप्त है।
साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संपत्ति के स्वामित्व या हिस्सेदारी का अंतिम निर्णय केवल सिविल कोर्ट करेगा। ट्रिब्यूनल का आदेश केवल बुजुर्गों की सुरक्षा और कल्याण तक सीमित रहेगा।
यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों में मार्गदर्शक (Precedent) के रूप में भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
Senior Citizen Eviction Rights पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल केवल भरण-पोषण तक सीमित नहीं है, बल्कि बुजुर्गों की सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक होने पर बेटे या रिश्तेदार को घर खाली करने का आदेश भी दे सकता है। यह फैसला वरिष्ठ नागरिकों के संरक्षण से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जाएगा।
