Narayanpur Religious Conversion को लेकर छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में एक संवेदनशील मामला सामने आया है। जिले के खड़कागांव गांव में कथित धर्म परिवर्तन को लेकर ग्रामीणों और एक आदिवासी परिवार के बीच विवाद उत्पन्न हो गया। हालांकि पुलिस और जिला प्रशासन की समय पर पहल से मामला शांतिपूर्ण ढंग से सुलझ गया और परिवार को दोबारा गांव में रहने की अनुमति मिल गई।
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Narayanpur Religious Conversion: ग्राम सभा के फैसले के बाद बढ़ा विवाद
जानकारी के अनुसार, यह घटना मंगलवार को नारायणपुर जिले के खड़कागांव में हुई। ग्रामीणों का आरोप था कि आदिवासी समुदाय के सदस्य मंटू दुग्गा ने ईसाई धर्म अपना लिया था, जबकि उनके पुत्र मोहन दुग्गा कबीर पंथ का पालन कर रहे थे।
ग्रामीणों का कहना था कि परिवार ने गांव की पारंपरिक आदिवासी धार्मिक गतिविधियों और रीति-रिवाजों में भाग लेना बंद कर दिया था। उनका दावा है कि परिवार से कई वर्षों तक अपनी मूल परंपराओं में लौटने का आग्रह किया गया, लेकिन सहमति नहीं बनने पर ग्राम सभा में इस मुद्दे पर चर्चा हुई।
ग्राम सभा के निर्णय के बाद परिवार को गांव से बाहर करने का फैसला लिया गया। ग्रामीणों ने बताया कि परिवार का मकान नहीं तोड़ा गया, लेकिन उनका सामान घर से बाहर निकाल दिया गया।
ग्रामीणों का दावा- किसी प्रकार की व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं
गांव के कुछ लोगों ने कहा कि इस निर्णय के पीछे किसी प्रकार की व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी। उनका कहना था कि गांव में लगभग 12 परिवार अन्य धार्मिक मान्यताओं का पालन कर रहे हैं, लेकिन केवल दुग्गा परिवार को लेकर विवाद इसलिए हुआ क्योंकि वे पारंपरिक सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों से पूरी तरह अलग हो गए थे।
एक अन्य ग्रामीण राजमान कुमेटी ने दावा किया कि परिवार को गांव में रहने के लिए जमीन और आवास उपलब्ध कराया गया था, लेकिन समुदाय की ओर से बार-बार किए गए आग्रह के बावजूद उन्होंने अपनी मूल आदिवासी परंपराओं में वापसी नहीं की।
Narayanpur Religious Conversion: परिवार ने क्या कहा?
मामले में मोहन दुग्गा ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि उन्हें गांव में रहने से इसलिए रोका जा रहा था क्योंकि वे कबीर पंथ का पालन करते हैं।
उन्होंने अपनी बात रखते हुए कहा कि धार्मिक मान्यताओं को लेकर विवाद के कारण परिवार को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
प्रशासन और पुलिस ने तुरंत संभाला मोर्चा
घटना की जानकारी मिलने के बाद पुलिस और जिला प्रशासन की टीम तुरंत खड़कागांव पहुंची। अधिकारियों ने ग्रामीणों और संबंधित परिवार के साथ अलग-अलग तथा संयुक्त रूप से बातचीत कर विवाद का समाधान निकालने का प्रयास किया।
नारायणपुर के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सुशील नायक ने बताया कि प्रशासन की मौजूदगी में दोनों पक्षों के बीच चर्चा हुई।
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Narayanpur Religious Conversion: सहमति के बाद गांव में लौटा परिवार
अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सुशील नायक के अनुसार, बातचीत के दौरान परिवार ने अपनी मूल आदिवासी आस्था और पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करने पर सहमति जताई। इसके बाद ग्रामीणों ने परिवार को पुनः गांव में रहने की अनुमति दे दी।
ग्रामीणों का कहना है कि परिवार ने पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लिया और भविष्य में भी गांव की सामाजिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं का सम्मान करने का आश्वासन दिया।
पुलिस ने बताया कि फिलहाल गांव में स्थिति पूरी तरह शांतिपूर्ण है और किसी प्रकार का तनाव नहीं है।
धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सौहार्द दोनों महत्वपूर्ण
यह मामला धार्मिक आस्था, सामाजिक परंपराओं और सामुदायिक जीवन के बीच संतुलन से जुड़ा संवेदनशील विषय है। भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद के धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता देता है। वहीं स्थानीय समुदाय अपनी पारंपरिक सांस्कृतिक पहचान और रीति-रिवाजों को बनाए रखने पर भी जोर देते हैं।
ऐसे मामलों में संवाद, कानून का पालन और प्रशासन की निष्पक्ष भूमिका सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है।
Narayanpur Religious Conversion से जुड़ा यह मामला प्रशासन की सक्रिय भूमिका के कारण शांतिपूर्ण तरीके से सुलझ गया। पुलिस और जिला प्रशासन की मध्यस्थता के बाद आदिवासी परिवार दोबारा गांव लौट सका और दोनों पक्षों के बीच सहमति बन गई। Narayanpur Religious Conversion की यह घटना एक बार फिर बताती है कि संवेदनशील सामाजिक और धार्मिक विवादों का समाधान कानून, संवाद और आपसी समझ के माध्यम से ही संभव है।
