Chhattisgarh High Court ने एक महिला की अपील स्वीकार करते हुए उसे तलाक की डिक्री दी है। मामला शादी के दौरान कथित उत्पीड़न, शारीरिक मारपीट, एयर-कंडीशनर की मांग और पत्नी की बहनों को भेजे गए आपत्तिजनक WhatsApp संदेशों से जुड़ा था।
24 सितंबर 2026 को सामने आई रिपोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने पाया कि रिकॉर्ड पर मौजूद WhatsApp चैट को पति ने विशेष रूप से चुनौती नहीं दी थी। अदालत ने इन संदेशों को पत्नी के परिवार के प्रति अनुचित और अपमानजनक व्यवहार के संदर्भ में देखा।
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एयर-कंडीशनर और मारपीट के आरोप
महिला के अनुसार, 5 दिसंबर 2021 को उत्तर प्रदेश के बलिया में हिंदू रीति-रिवाजों से उनकी शादी हुई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि शादी के करीब एक महीने बाद पति का व्यवहार बदल गया और उनके साथ कथित रूप से गाली-गलौज तथा मारपीट शुरू हुई।
महिला ने यह भी कहा कि उसने अपनी मां और बड़े भाई को कथित दुर्व्यवहार की जानकारी दी। परिवार की ओर से पति से बातचीत की कोशिश की गई, लेकिन महिला के अनुसार उनके साथ भी कथित रूप से अभद्र व्यवहार किया गया।
अप्रैल 2022 में वह दोबारा ससुराल गईं, लेकिन उनके अनुसार कुछ समय बाद कथित दुर्व्यवहार फिर शुरू हो गया। उन्होंने पति पर धमकी देने और शारीरिक रूप से हमला करने का भी आरोप लगाया।
महिला के आरोपों के मुताबिक, उनकी दो छोटी बहनों ने जब पति के व्यवहार पर आपत्ति जताई, तो इसके बाद पति ने कथित तौर पर महिला और उसकी बहनों के मोबाइल फोन पर आपत्तिजनक WhatsApp संदेश भेजे। महिला ने कहा कि इन संदेशों से वे डर गई थीं।
महिला ने यह भी आरोप लगाया कि पति ने दहेज के तौर पर एयर-कंडीशनर की मांग की और मांग पूरी न होने पर उसके आभूषण बेचने की धमकी दी। बाद में वह वैवाहिक घर छोड़कर अंबिकापुर में रहने लगीं।
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WhatsApp चैट बनी अहम कड़ी
इस मामले में WhatsApp चैट अदालत के सामने महत्वपूर्ण सामग्री के रूप में आई। महिला ने फैमिली कोर्ट के सामने इन संदेशों के स्क्रीनशॉट पेश किए थे।
हालांकि, फैमिली कोर्ट ने इन चैट को यह कहते हुए स्वीकार नहीं किया था कि मोबाइल फोन धारक की पहचान स्थापित करने वाला पर्याप्त साक्ष्य नहीं था और बातचीत भी पूरी नहीं थी।
इसके बाद महिला ने हाईकोर्ट में अपील की। Chhattisgarh High Court ने कहा कि इन संदेशों को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब पति ने उनकी सामग्री को विशेष रूप से नकारा या चुनौती नहीं दी थी।
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Chhattisgarh High Court ने मानसिक क्रूरता पर क्या कहा?
जस्टिस पार्थ प्रतिम साहू और जस्टिस सुषमा सावंत की बेंच ने कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद WhatsApp चैट को पूरे वैवाहिक संदर्भ में देखने पर ऐसा आचरण सामने आता है, जो मानसिक क्रूरता के दायरे में आता है।
अदालत ने विशेष रूप से पति के अपनी पत्नी की बहनों के प्रति कथित अनुचित और अपमानजनक व्यवहार को भी ध्यान में रखा। बेंच के अनुसार, पत्नी के परिवार के सदस्यों के प्रति इस तरह का आचरण पत्नी को गहरी मानसिक पीड़ा पहुंचा सकता है और गंभीर मानसिक क्रूरता का रूप ले सकता है।
फैमिली कोर्ट के फैसले को क्यों पलटा?
फैमिली कोर्ट ने 2 अप्रैल 2024 को महिला की तलाक याचिका खारिज कर दी थी। उस कार्यवाही में पति ने लिखित बयान दाखिल नहीं किया था और समन की तामील के बावजूद अदालत में उपस्थित नहीं हुआ। इसके बाद मामला उसके खिलाफ ex parte चला।
महिला और उसकी मां ने अदालत के सामने साक्ष्य दिए, जबकि पति की ओर से कोई मौखिक या दस्तावेजी साक्ष्य पेश नहीं किया गया। फैमिली कोर्ट ने फिर भी माना कि महिला क्रूरता का आरोप पर्याप्त रूप से साबित नहीं कर पाई।
हाईकोर्ट ने अपील में रिकॉर्ड का दोबारा मूल्यांकन किया और माना कि फैमिली कोर्ट ने उपलब्ध सामग्री को उचित तरीके से नहीं परखा था। इसके बाद उसने 2 अप्रैल 2024 के आदेश को रद्द कर महिला की अपील स्वीकार कर ली।
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पुलिस शिकायत को अतिरिक्त सबूत बनाने से इनकार
अपील लंबित रहने के दौरान महिला ने 25 अगस्त 2026 की एक पुलिस शिकायत को अतिरिक्त साक्ष्य के तौर पर रिकॉर्ड में शामिल करने का अनुरोध किया था।
महिला ने आरोप लगाया कि अपील के दौरान भी पति उसके कार्यस्थल सहित अन्य स्थानों पर आकर कथित रूप से परेशान करता रहा और उससे तलाक के कागजात पर हस्ताक्षर करने को कहता रहा।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस शिकायत को अतिरिक्त साक्ष्य के रूप में रिकॉर्ड पर लेने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि उपलब्ध सामग्री केवल यह दिखाती है कि पुलिस के सामने शिकायत की गई थी। FIR के परिणाम, निजी शिकायत दाखिल होने या मुकदमे के ट्रायल तक पहुंचने की जानकारी रिकॉर्ड पर नहीं थी।
Chhattisgarh High Court के इस फैसले में WhatsApp संदेशों सहित वैवाहिक संबंध से जुड़े पूरे आचरण को संदर्भ के साथ देखा गया। अदालत ने माना कि पत्नी के परिवार के प्रति आपत्तिजनक व्यवहार और रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य परिस्थितियां मानसिक क्रूरता के आकलन में प्रासंगिक थीं। इसी आधार पर फैमिली कोर्ट का पुराना फैसला रद्द करते हुए महिला को तलाक की डिक्री दी गई।
